मैं और मेरे अह्सास
मुसाफ़िर
ख़ुदा हाफ़िज़ मत कहना शहर से जाते जाते l
बहुत दर्द होता है तुझे देखते हुए जाते जाते ll
खामोशी से चल दिये बिना कुछ कहे सुने l
थोड़ा सही प्यार और दुलार लुटाते जाते ll
गर कभी आना जाना तो लम्हा भर के लिए l
मिलने की त्रासदी लेना शहर में आते जाते ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह