“मैं आज की नारी हूँ “
न सियासत की जंग मेरी है,
न बँटवारे की कोई गुहार है।
न मैं सिपाही हूँ,
न मैं बाग़ी हूँ।
मैं तो बस…
आज की नारी हूँ।
और दुख इस बात का है,
कि मैं आज में होकर भी
आज में नहीं हूँ।
कहते हैं, ज़माना बदल गया है।
मैं हर बार अपने चारों ओर देखती हूँ।
बदले हैं बस घर के रंग,
दीवारों की पुताई,
और सोच पर चढ़ा हुआ सभ्यता का नया पर्दा।
बंदिशें अब भी उतनी ही पुरानी हैं।
आज भी जब एक लड़की ज़रा-सा सिर उठाकर चलती है,
तो सौ आँखें उसके कदम नहीं, उसकी औक़ात नापने लगती हैं।
उसकी आवाज़ उन्हें ऊँची लगती है,
मगर उस पर उठते हाथ उन्हें कभी भारी नहीं लगते।
कोई नहीं देखता उसकी हथेलियों के छाले,
जो रोटियाँ सेंकते हुए बने।
कोई नहीं देखता उसकी पीठ का दर्द,
जो पूरे घर का बोझ ढोते-ढोते पत्थर हो गया।
हाँ… सबको दिखती है उसके होंठों की लाली।
किसी को नहीं दिखता उसकी मुस्कान का रोज़-रोज़ मरना।
उसे हर मोड़ पर दायरे सिखाए जाते हैं।
धीरे चलो। धीरे बोलो। धीरे हँसो। धीरे जियो।
इतना धीरे…
कि एक दिन वह अपने ही सपनों की आवाज़ सुनना भूल जाए।
कहते हैं, “बेटियाँ घर की इज़्ज़त होती हैं।”
मैं पूछती हूँ, इज़्ज़त होती हैं या इज़्ज़त का बोझ?
जिसे जन्म लेते ही मर्यादा की गठरी बनाकर कंधों पर रख दिया जाता है।
जिस दिन वह पहली साँस लेती है,
उसी दिन उसकी आज़ादी की पहली साँस छीन ली जाती है।
फिर पूरी उम्र उसे समझाया जाता है
कि यह सब उसकी भलाई के लिए है।
किस भलाई की बात करते हो तुम?
उस भलाई की जिसमें एक लड़की अपनी ही हँसी दबाकर जीती है?
या उस भलाई की जिसमें वह हर बार अपने आँसू पोंछकर दूसरों की थाली परोसती है?
मुझे मत बताओ कि औरत देवी है।
देवी बनाकर तुमने उसे इंसान होना ही नहीं दिया।
मुझे मंदिर नहीं चाहिए। मुझे बराबरी चाहिए।
मुझे पूजा नहीं चाहिए। मुझे सुना जाना चाहिए।
मैं थक चुकी हूँ हर रिश्ते में खुद को साबित करते-करते।
हर बार अपनी चुप्पी को संस्कार कहते-कहते।
अब अगर मेरी आवाज़ तुम्हें बग़ावत लगती है,
तो हाँ… मैं बाग़ी हूँ।
अगर अपने हिस्से का आसमान माँगना गुनाह है,
तो मैं गुनहगार हूँ।
अगर अपने शरीर, अपने सपनों, अपने फ़ैसलों पर अपना अधिकार माँगना तुम्हें ज़िद लगता है,
तो यह ज़िद अब मेरी पहचान होगी।
याद रखना…
जिस दिन औरत ने अपने भीतर दबी हुई सदियों की ख़ामोशी को एक साथ आवाज़ दे दी,
उस दिन तुम्हारे बनाए हुए सारे दायरे मिट्टी की लकीरों की तरह पहली बारिश में बह जाएँगे।
मैं किसी क्रांति का चेहरा नहीं बनना चाहती।
मैं बस इतना चाहती हूँ…
कि अगली बार जब कोई बेटी जन्म ले,
तो उसके कानों में पहला शब्द “मत” नहीं, “उड़” हो।
और जिस दिन हर लड़की बिना डर के अपना नाम अपनी आवाज़ में बोल सकेगी,
उसी दिन समझना…
मैं सचमुच आज की नारी बन गई हूँ।
प्राची गुर्जर…..