जिंदगी, कुछ तो बता...
तू क्या चाहती है मुझसे, ज़रा सा तो इशारा दे,
मुकम्मल ना सही, भटकती कश्ती को कोई किनारा दे।
हर कदम पर नए इम्तिहानों की यह कैसी कतार है?
तेरी खामोशियों में भी छुपता, कौन सा राज़ज़ार है?
जिंदगी कुछ तो बता, आखिर यह कैसी राह है?
जवाबों की तलाश में, हर सांस क्यों एक आह है?
धूप-छांव के खेल में, हम पल-पल ढलते जाते हैं,
गिर-गिर कर संभलते हैं, और आगे बढ़ते जाते हैं।
अगर तू कोई पहेली है, तो सुलझना भी तेरा काम है,
इस बिखरी हुई दास्तान में, छिपा खुशियों का मुकाम है।
तू जितना भी आज़मा ले, हम झुकने वाले नहीं,
थका सकती है तू राहों में, पर हम रुकने वाले नहीं।
दर्द को दवा बनाकर, हम फिर मुस्कुराएंगे...
तू भले चुप रहे, हम ज़िंदादिली का परचम लहराएंगे!
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