"…ठहरी हुई सी..."
एक आसमान की छत नीली
एक तेरे बालों की छांव
क्या चाहिए पूछो मुझे।
जो भी मिला,
न मिला जो
उससे कहीं ज्यादा ही था।
यू ही सिर रखे
गोद में तेरी देखता रहूं
तुम्हें पढ़ते हुए
मेरी ही किसी किताब का पन्ना
यकीन मानो हर पन्ने में
तुम्हें ही बोया गया है
मतलब तुम मेरी किताब नही
बल्कि खुद को पढ़ रही हो।
कितनी किताबें पढ़ती हो तुम
फुर्सत मिली है
तो और खो जाना इन कागजों में
कोई शिकायत नहीं मेरी
मुझे क्या मैंने तो मुहब्बत की है
तुम्हारे हिस्से की तुम
मुझे जितनी मिली हो
उतनी काफी हो।
गार्डन ईडन में
भी बांध लेते हैं
शब्द तुम्हें अपने जंजाल में
हर अक्षर,मात्रा
लोम - विलोम बस तुम से ही शुरू होते है
मेरा कोई व्याकरण नहीं है
हो तुम
हैं ये पल इसलिए
बस इसीलिए ये प्रवाह ठीक है
जो तुम नहीं
तो हार से भी गहरा कुछ
उतर आता है भीतर
लिखने लगता हू मैं
उतारने लगता हु वाक्यों में तुम्हें ही।
ए....
कभी मुड़कर मत देखना मुझे
क्योंकि गार्डन का श्रापित हिस्सा
हम सब के भीतर सुलगता रहता है
यह ईडन गार्डन भार दिया गया है
मंत्रों से।
क्या कभी तुम किताब से परे
जो दुनिया है उसे देखोगी
मैं लेकर जाऊंगा कभी तुम्हें वहां
पर अब नहीं
अभी तो बहुत देर रुकना है हमें यही
तुम किताब पढ़ोगी
गोद का तेरे सिरहाना
मैं तकता रहूंगा
यू ही
बस यू ही।
पर नहीं रह सकते यहां ज्यादा देर तक
तुम्हें पहले जाना होगा
तब हाथ छूटेगा
या मैं पहले जाऊ
तब भी हाथ छूटेगा।
इसकी मिट्टी पर ईव्ह
के कीमती आंसू गिरे है
अदम करता है उन्हीं के भरोसे खेती यहां।
कोई नहीं रह सकता
इस जगह की तरह
बस जगह ही रह जाती है
एक जगह।
सोहनी ने इसी मिट्टी के घड़ों पर
उकेरे है न जाने कितने चित्र
मैं भी तुम्हें
देखता हु उसी किसी चित्र की तरह।
अब किताब रख दो
यहां के पेड़ काटकर ही तैयार किए है
उसके पन्ने।
प्रेम,
किताब,
गार्डन,
मैं,
और तुम हम सब एक ही
डोर से बंधे हैं।
क्या तुम जा रही हो
ओह...
मैं तो भूल ही गया था
की ईश्क में बस मृत्यु ही मिलती है
मोक्ष नहीं।
तो चली जाना
वहां किताबें नहीं होगी
मैं आऊंगा
और लिखूंगा
फिर से तुम्हें
और तुम तब पढ़ोगी
जन्म और मृत्यु के
बीच बनी ये जगह ही
हमेशा मेरा होड़दार बनी रहेंगी।
इससे ज्यादा मुहब्बत
में ठहरी हुई रकीबियत
कही भी न हो।