तुम लिखते रहो, मैं पढ़ता रहूँ
तुम लिखते रहो, मैं पढ़ता रहूँ,
हर शब्द में छुपा एक एहसास पकड़ता रहूँ।
तुम्हारी कलम जब भी ख़ामोशियाँ तोड़े,
मैं उन ख़ामोशियों की आवाज़ बनता रहूँ।
मैं लिखता रहूँ, तुम पढ़ते रहो,
मेरे जज़्बातों का मतलब समझते रहो।
जो कह न सका मैं आँखों से कभी,
तुम अक्षरों में उसे महसूस करते रहो।
तुम्हारे लिखे हर लफ़्ज़ में मैं मिल जाऊँ,
मेरे लिखे हर सच में तुम झलक जाओ।
ना मिलना हो तो भी क्या ग़म है यहाँ,
हम लिखने-पढ़ने में ही रोज़ मिल जाएँ।
तुम लिखते रहो, मैं पढ़ता रहूँ,
वक़्त की धूप में भी साया करता रहूँ।
मैं लिखता रहूँ, तुम पढ़ते रहो,
यही रिश्ता रहे—कलम और दिल का रहे।
आर्यमौलिक