कलम की पुकार
मैं लिखते-लिखते थक चुका हूँ,
उँगलियाँ बोझिल, शब्द भी चुप हैं।
कलम मुस्कुराई, धीरे से बोली—
“रुक क्यों गए? अभी तो सफ़र बाकी है।”
“मैं तो सदियों से लिखती आई हूँ,
हर अँधेरे में दीप जलाती रही।
इस आस में—आज नहीं तो कल,
कोई तो नींद से जागेगा सही।”
मैंने कहा—“रात बहुत हो चुकी है,
थकान ने मेरे हौसले तोड़ दिए।”
वो हँस पड़ी, स्याही चमक उठी—
“अँधेरा ही तो है, लिखने के लिए।”
“चल उठ और लिख उन ख़्वाबों के नाम,
जो दिन में सोए, रात में रोते हैं।
तेरे शब्द ही दस्तक देंगे,
जहाँ ज़मीर अब भी सोते हैं।”
मैंने फिर कलम को थाम लिया,
थकान कहीं पीछे छूट गई।
क्योंकि लिखना सिर्फ़ शब्द नहीं,
जागते रहना भी एक जिम्मेदारी हुई।
आर्यमौलिक