अब धीरे धीरे ठंड का मौसम जाएगा।
और जाना भी चाहिए।
शास्वत कुछ भी नहीं है इस संसार में,
समय की गति में रुकना मना है।
लोहड़ी के त्योहार के बाद प्रकृति अपना मिजाज थोडा बदलती है,
जीवन के लिए।
अब सूरज भी धीरे धीरे गर्म होगा,
धरती को कूच गर्माहट झेलनी पड़ेगी,
तभी तो बारिश की ठंडी बूंदों से खेत-खलिहानो में हरियाली वापस जिवंत करेंगी।
थोडा कष्ट झेलना पड़ता है,
सुख का सही आनंद तभी तो पा सकते हैं।
अरे पा तो सकते हैं पर आनंद क्या है उसकी सची व्याख्या 'कष्ट' ही समझता है।
थोड़ा संघर्ष करके कुछ मिले तो प्राप्त करनेवाले,
इंसान को सही उसकी "कद्र" होती है।