🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__
एक खत ऐसा भी...
तारीख: आज की एक अकेली शाम,
पता: मन का वो कोना, जहाँ कोई
झाँकता नहीं,
सुनो,
उम्मीद है तुम बाहर से ठीक होगे
क्योंकि आजकल हम सबने ठीक
होने का एक बेहतरीन हुनर सीख
लिया है,
आज दिल कुछ भारी था, तो सोचा
तुम्हें वो बातें लिखूँ जो हम महफिलों
में हँसते हुए भी नहीं कह पाते,
तुमने सच ही तो कहा था, यहाँ हर
कोई अपना ज़ख्म छिपाए फिर रहा है,
हम सब एक ऐसे मेले में हैं जहाँ भीड़
तो बहुत है, पर हर इंसान अपनी अधूरी
कहानी का अकेला किरदार है,
हम एक-दूसरे को तसल्ली तो देते हैं पर
सच तो ये है कि हम खुद अपनी थकान
से चूर हैं,
ये जो चेहरे पर मुस्कान हम चिपकाए
रखते हैं न, वो दरअसल एक ढाल है
ताकि कोई हमारी असुरक्षा को देखकर
हमें कमज़ोर न करार दे दे,
हम उस समाज का हिस्सा हैं जहाँ टूटना
मना है और हारना उससे भी बड़ा गुनाह,
कितना अजीब है न,?
हम जानते हैं कि कोई किसी का बोझ
नहीं उठा सकता, फिर भी एक उम्मीद
की डोर पकड़े बैठे हैं,
शायद वो झूठी उम्मीद ही है जो हमें रोज़
सुबह बिस्तर से उठाती है और रात को
थपकियाँ देकर सुला देती है,
हम एक-दूसरे पर तंज कसते हैं अपनी
कुंठाएँ थोपते हैं, सिर्फ इसलिए ताकि
खुद को बेकार होने के एहसास से बचा
सकें,
भीतर एक शोर है जो कभी थमता नहीं
और बाहर एक सन्नाटा है जिसे हम
नॉर्मल कहते हैं,
हम रोज़ हारते हैं, रोज़ टूटते हैं, और
फिर अगले दिन एक नया मुखौटा पहन
कर दुनिया के सामने खड़े हो जाते हैं,
सिर्फ ये दिखाने के लिए कि हम मज़बूत हैं,
पर कभी-कभी सोचता हूँ... कब तक,?
खैर, ये खत बस एक ठहराव था,
उन चंद लम्हों की गुफ्तगू जो शायद
तुम्हारे घाव तो नहीं भरेगी, पर तुम्हें ये
ज़रूर महसूस कराएगी कि इस अंधेरे
में तुम अकेले नहीं हो, हम सब अपनी
अपनी हार को ठीक है कहकर ढो रहे हैं,
अपना ख्याल रखना
तुम्हारा ही एक अक्स,,🥀🔥
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♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦
#LoVeAaShiQ_SinGh ☜
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