✧ पत्नी, प्रकृति और गुरु — अंतिम सत्य ✧
ऐसा कोई पुरुष नहीं
जो पत्नी से पूरी तरह संतुष्ट हो।
और ऐसा भी कोई पुरुष नहीं
जो पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाए।
हर पुरुष को पर-स्त्री सुंदर लगती है —
क्योंकि वह कल्पना है।
वैसे ही आज
मुखौटा-धारी गुरुओं से
आशा, स्वप्न, कल्पना और विश्वास जुड़ते हैं —
सत्य नहीं।
जहाँ कल्पना होती है,
वहाँ आकर्षण स्वतः होता है।
किसको अपने ही अस्तित्व,
अपनी आत्मा से लगाव नहीं?
किसको अपनी पत्नी
और अस्तित्व की प्रकृति से लगाव नहीं?
इसलिए
स्व-आत्मा, पत्नी और प्रकृति
एक ही स्थिति हैं —
क्योंकि वे मुक्त (Free) हैं।
जो मुक्त है,
वही सत्य है।
जिसकी कीमत है,
वह जड़ संसार है।
पर-स्त्री और आज की गुरु-संस्थाएँ
कीमत माँगती हैं।
इसलिए वे
कुछ नहीं देकर भी
बहुत कुछ बेच पाती हैं।
पत्नी, आत्मा और प्रकृति
मुफ़्त हैं —
इसलिए मन, अहंकार और बुद्धि
उनका मूल्य नहीं समझ पाते।
मन को
कीमत चाहिए।
अहंकार को
मूल्य चाहिए।
इसलिए
कीमती किताब,
कीमती गुरु,
कीमती व्यवस्था
ज़रूरी हो जाती है।
जहाँ मूल्य है,
वहाँ असत्य है।
जीवन, आनंद, प्रेम और शांति
खरीदे नहीं जाते।
पर आज की मानसिकता
सब कुछ खरीदना चाहती है।
भीतर आत्मा
प्रेम और शांति जीवन माँग रही है,
और मन-अहंकार-बुद्धि
उत्तेजना और साधन।
आज गुरु
भावनात्मक उत्तेजना देता है,
आश्वासन देता है,
विश्वास देता है,
स्वप्न देता है।
वैसे ही पर-स्त्री
भीतर की उत्तेजना देती है।
दोनों
कीमती लगते हैं —
पर जीवनदायी नहीं।
पर-स्त्री और आज का गुरु
एक ही स्थिति हैं —
विपरीत।
दोनों पर
स्वप्न है,
आशा है,
कल्पना है —
पर सत्य नहीं।
क्योंकि यह
मन का लगाव है,
आत्मा का नहीं।
जहाँ सत्य है,
वहीं ईश्वर है।
और सत्य है —
स्वयं,
पत्नी,
और अस्तित्व की प्रकृति।
ये तीनों
पूर्णतः मुक्त हैं।
मनुष्य का अहंकार
एक भ्रम है,
और भ्रम
कभी वास्तविकता से
जुड़ नहीं सकता।
जीवन और ईश्वर
तीन में बसते हैं —
पति, पत्नी प्रकृति और हृदय की आत्मा।
जो बाहर प्रकृति दिखाई देती है,
वही भीतर ईश्वर है।
वेद कहते हैं —
प्रकृति को समझो,
प्रकृति के साथ जियो।
प्रकृति
और तुम्हारा भीतरी केंद्र —
यही दो
पूर्ण ईश्वर हैं।
आज का बुद्धिजीवी,
आज के गुरु,
और आज की धर्म-संस्थाएँ —
अधिकांशतः
स्वप्न और कल्पना हैं।
इनसे
जीवन नहीं,
सिर्फ़ मनोरंजन संभव है।
वेदों में गुरु की जो महिमा है,
वह उस गुरु की महिमा है
जिसके पास सब कुछ था —
विज्ञान,
चिकित्सा,
रक्षा,
खगोल,
राजनीति,
संगीत,
तंत्र,
भविष्य-ज्ञान,
समाज-रक्षा
और आत्म-विद्या।
चारों वेद
एक समग्र व्यवस्था थे —
अलग-अलग संस्थाएँ नहीं।
राम और कृष्ण
गुरु नहीं थे —
गुरु के परिणाम थे।
गुरु के पास
१६ कलाएँ थीं,
इसलिए वह
राम और कृष्ण को
गढ़ सका।
आज
कोई वैसा गुरु नहीं।
आज अधिकांश
पाखंड है।
किसी के पास
चार वेदों की
समग्र उपलब्धि नहीं।
इसलिए
जो आज स्वयं को
ब्रह्मा-विष्णु-महेश कहता है,
वह कलंक है।
मेरे लिए —
मेरी पत्नी
मेरी सहभागिनी है —
ज्ञान, धर्म, शक्ति, सेवा,
प्रेम, आनंद और काम में।
प्रकृति —
हवा, पानी, अग्नि और जीव —
मेरा ईश्वर है।
जो मुझे
जीवन दे,
वेद की कला दे,
चिकित्सा दे,
रक्षा दे,
विज्ञान दे,
राजनीति और भविष्य की समझ दे —
वही गुरु है।
बाकी सब
पर-स्त्री की तरह हैं —
उत्तेजना,
मनोरंजन,
स्वप्न।
मेरे परम स्मरणीय
अतीत के ऋषि मुनि हैं —
देवता नहीं।
ऋषियों के बिना
कोई अवतार संभव नहीं था।
उनकी चेतना
आज भी
हमारे भीतर
तरंग बनकर विद्यमान है।
मेरे वेद,
मेरे उपनिषद,
मेरी गीता —
मेरे अतीत के ऋषिमुनि हैं।
वे बाहर नहीं,
मेरे भीतर
बीज रूप में बैठे हैं।
आज के गुरु
ऋषि नहीं —
मुखौटे हैं।
✧ अंतिम वाक्य ✧
पत्नी और प्रकृति हृदय— सत्य हैं।
आज के गुरु और पर-स्त्री — कल्पना।
जो सत्य में जीता है,
उसे गुरु नहीं चाहिए।
𝐕𝐞𝐝𝐚𝐧𝐭𝐚 𝟐.𝟎 𝐋𝐢𝐟𝐞
= 𝐅𝐫𝐞𝐞 𝐟𝐫𝐨𝐦 𝐰𝐨𝐫𝐝𝐬,
𝐥𝐢𝐛𝐞𝐫𝐚𝐭𝐞𝐝 𝐟𝐫𝐨𝐦 𝐜𝐨𝐧𝐜𝐞𝐩𝐭𝐬,
𝐚𝐧𝐝 𝐢𝐧 𝐝𝐢𝐫𝐞𝐜𝐭 𝐜𝐨𝐧𝐭𝐚𝐜𝐭 𝐰𝐢𝐭𝐡 𝐥𝐢𝐟𝐞.
अज्ञात अज्ञान