Hindi Quote in Poem by kunal kumar

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जंगली फूल
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पुरुष जब अपने से आगे
चलती चीज़ों से डरा तो
डर में
उसने न रोना चुना,
न काँपना, न कोई कंधा
बल्कि
उसने मरा जाना चुना।

लेकिन मरने से पहले
बहुत पहले
एक काम किया—
उसने नियम बनाया।
नियम से ,
परिभाषा निकली।
परिभाषा से
केंद्र।


केंद्र पर वह रहा
बाक़ी घूमते रहे लोग
किसी ग्रह की तरह ।

और यहीं से
व्यवस्था शुरु हुई।

जो पास थे
वे पवित्र हुए
जो दूर थे
वे बाग़ी।

स्त्री दोनों में नहीं थी
वह पहले असुविधा बनी,
फिर सवाल।
और जब सवाल
टिके रहे—
तो उन्हें क्रांति कहा गया।

शायद इसलिए
मैं
जब तुम्हें देखता हूँ—
तो मेरा पुरुष होना
काम नहीं आता।

और
धीरे धीरे केंद्र से उतर कर
मैं स्त्री हो जाता हू।

स्त्री जो उल्ट है डर के
जो उल्ट है ईर्ष्या के
जो उल्ट है असहिष्णुता के।

और इस तरह तुम्हें देखते हुए
मुझमें बची रह जाती है
"संभावना"।
संभावना पर्वत , पहाड़
और केंद्र से इतर
जंगली फूल होने की ।
@ कुणाल कुमार

Hindi Poem by kunal kumar : 112015317
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