बैसाखी की धूप में, अभि सोना झरे खेत,
मेहनत रंग लायी यहाँ, खिल उठे हर चेत।
ढोल नगाड़े गूँजते, यहॉं नाचे गाँव-समाज,
हँसी-खुशी के रंग में, भींगा हर एक आज।
धरती माँ के आँचल में, अन्न भरा अपार,
किसान के मुख पर सजे, संतोषी श्रृंगार।
पसीने की हर एक बूंद, बनती मीठा फल,
मेहनत से ही जग में, मिलता सच्चा बल।
आशा की हर किरण से, जीवन हो उजियार,
बैसाखी का ये पर्व है, खुशियों का त्योहार।