"ख़ुद को लिखूँगी" ✨
अगर लिख पाऊँ कुछ, तो मैं ख़ुद को लिखूँगी,
ख़ुद के सपने, अरमान, ख़्वाहिशें लिखूँगी…
थक गई हूँ औरों के ख़ातिर जीते-जीते,
अब सुकून भरी एक साँस ख़ुद को लिखूँगी…
लिखूँगी वो अँधेरी रातें, जिनमें रोई थी मैं,
और अब ख़ुद के लिए एक सुबह सूरज सी लिखूँगी…
अगर लिख पाऊँ कुछ, तो मैं ख़ुद को लिखूँगी।
लिखूँगी वो बंधन की बेड़ियाँ जो ज़माने ने लगाईं,
और ख़ुद के उड़ने को एक आसमान खुला सा लिखूँगी…
लिखूँगी वो खोया हुआ वजूद मेरा,
और अब ख़ुद की एक नई पहचान लिखूँगी…
अगर लिख पाऊँ कुछ, तो मैं ख़ुद को लिखूँगी…
प्राची तंवर …….