अबकी बार मानसून नाराज है
अबकी बार मानसून नाराज है
रोज चकमा देकर चला जाता है
एक झलक दिखाकर
जाने कहाँ गायब हो जाता है
गर्मी भी चिढ़कर सड़ी जा रही है
चिप-चिप बहे पसीना
हवा भी दे दगा कहीं और जा रही है
आँखे थक गई
बादलो को ढूंढते
कब आयेगी बारिश
दिल की धड़कन बढ़ी जा रही है
बारिश करना भूल गए भगवान जी
तभी तो गर्मी बढ़ी जा रही है
कहीं लग रही A-C में आग
कहीं नदियां सूखी जा रही है
लगता है बादल भी खेल रहे हैं
इंसान के साथ लुका-छुपी
जैसे ही आस बने बारिश की
हवा बादल उड़ा ले जा रही है
तरक्की और आधुनिकता की कीमत
ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती जा रही है
कैसे कैसे तपते दिन-रात
नींद सबकी उड़ी जा रही है।
डॉ वंदना शर्मा