धीरे-धीरे गाँव खत्म हो रहे हैं
धीरे-धीरे गाँव खत्म हो रहे हैं
गाँव अब शहर बनते जा रहे हैं,
नीम के पेड़ की छाँव कहीं खो गई
खो गया वो मटके का पानी
एसी और फ्रिज ने अपनी
जगह बना ली
चौपाल अब खाली है
खुला आँगन भी हो गया गायब
नकल करते-करते शहर की
वो सुकून वाला गाँव,
अब शहर हो गया है
वो अपनापन, वो भोलापन
जो यादों में बसता था गाँव
अब नहीं देता दिखाई
अब नहीं मिलती गाँव में चारपाई
वो कच्ची सड़क वो ताजी हवा
वो अमिया के झूले वो गुड़ का स्वाद
अब कोई आवाज न दे सुनाई
बदल गई सब चाची ताई
कैसी तरक्की कैसी आधुनिकता
ये गाँव चली आई
धीरे-धीरे गाँव, शहर बनते जा रहे हैं
और फिर सुकून गाँव का ढूंढने
कृत्रिम गाँव बसाए जा रहे हैं
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डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली