इश्क़ की आख़िरी दुआ
लोग कहते हैं कि मोहब्बत इंसान को पूरा कर देती है,
पर किसी ने ये नहीं बताया कि वही मोहब्बत एक दिन अधूरा भी कर देती है।
जिसे अपनी हर दुआ में माँगा था,
उसी को एक दिन अपनी दुआओं से रुख़्सत करना पड़ा।
मैंने तुम्हें सिर्फ़ चाहा नहीं था,
अपनी हर साँस में बसाया था,
तुम मेरी आदत भी थे,
और मेरी सबसे खूबसूरत इबादत भी।
जब तुम साथ थे तो हर मौसम बहार लगता था,
बारिश भी दुआ लगती थी, धूप भी प्यार लगती थी,
फिर एक दिन तुम चले गए,
और वही दुनिया मुझे वीरान नज़र आने लगी।
तुम्हारे जाने के बाद मैंने मुस्कुराना तो सीख लिया,
मगर दिल से हँसना कभी नहीं आया,
चेहरे पर सुकून का नक़ाब पहन लिया,
लेकिन अंदर का शोर कभी ख़ामोश नहीं हुआ।
कभी-कभी सोचता हूँ,
अगर तुम लौट भी आओ तो क्या पहले जैसा सब हो पाएगा?
शायद नहीं...
क्योंकि टूटे हुए दिल जुड़ तो जाते हैं, मगर पहले जैसे नहीं रहते।
अब मेरी दुआ सिर्फ़ इतनी है,
जहाँ भी रहो, हमेशा मुस्कुराते रहो,
अगर मेरी मोहब्बत सच्ची थी,
तो मेरी दुआएँ तुम्हें हर दर्द से बचाती रहेंगी।
और मैं...
मैं तुम्हारी यादों के साथ जीना सीख लूँगा,
क्योंकि कुछ मोहब्बतें मुकम्मल होकर नहीं,
अधूरी रहकर हमेशा के लिए अमर हो जाती हैं।