सुख महज़ एक छलावा था,जिसमें न जाने कब से मैं सदियों की नींद सो रहा था।जब हक़ीक़त की ठोकर लगी और मैं संभला,तो जाना कि दुःख ही एकमात्र शाश्वत सत्य है।मैं तो बस इसी महा-दुःख का एक अंश हूँ,उसी के बीजों से पनपा एक अदना सा वजूद।आदि से अंत तक,मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ दुःख से ही निर्मित हूं।