औरतों ने सहा बहुत,
पर कहा कभी किसी से नहीं।
अपना घर छोड़कर,
दूसरे घर को अपना बनाया।
जिस घर को दिल से सजाया,
वहीं एक दिन पूछ लिया गया —
“तेरा है क्या यहाँ?”
मुस्कुराकर हर रिश्ता निभाया,
अपने दर्द को चुपचाप छुपाया।
सबकी खुशियों में खुद को भूल गई,
पर अपनी खुशी कभी खुलकर जी नहीं पाई।
सुबह से रात तक जिम्मेदारियों में ढली,
कभी बेटी, कभी बहन, कभी पत्नी बन चली।
हर रूप में खुद को बाँटती रही,
पर अपने हिस्से की पहचान ढूँढती रही।
फिर भी हर टूटन के बाद संभलती है,
हर आँसू के बाद फिर चलती है।
औरत सिर्फ सहती ही नहीं,
वो हर हाल में जिंदगी गढ़ती है।