ख्वाब हमने बहुत देखे,
पढ़-लिखकर बाबू बने।
जोब मिलीं महानगर में,
सीखने को बहुत मिला।
बस हमें दूसरों से क्या वास्ता,
अपना काम और अपना भाग्य।
बढ़ते रहे हम अपने पथ पर,
अकेलापन महसूस नहीं हुआ।
हमने अपनी खुशी के साथ साथ,
परिवार को खुशी में जोड़ दिया।
अकेलापन महसूस करने वालों,
अपने परिवार से प्यार करों।
खुशियां बांटते रहे और जिंदगी बढ़ती गई,
आज सखी, मुने रंग लाग्यो महानगर को,
छोड़ कर हम तो नहीं जियो।
अब गांव कहा तक रह गया है? गांव ख़ाली ख़ाली है,
कमाई के चक्कर में सब महानगर की और दौड़ पड़े।
यहां फुर्सत कहां है हम सबको, अपने आप में खोये है,
जरुरत आन पड़ी तो, दोस्तों की भीड़ उमड़ पड़ी।
बस बाग बगिया खिलता रहा, परिवार खुशहाल हैं,
महानगर की भीड़ में अकेलापन कहां मेहसूस किया?
- कौशिक दवे