मतला:
ज़िंदगी ख़्वाब है, मौत उसका हक़ीक़त होना,
रात ढलते ही उजालों का भी रुख़्सत होना।
हर क़दम पर ये इशारा है फ़ना की जानिब,
सांस चलती है तो समझो है क़यामत होना।
हमने देखा है चमकते हुए चेहरों का ज़वाल,
फूल खिलते ही मुक़द्दर में है मुरझत होना।
वक़्त के हाथ में है खेल ये आने-जाने का,
आज मौजूद हैं, कल नाम का ग़ायब होना।
दिल के रिश्ते भी अजब मोड़ पे आ जाते हैं,
ज़िंदगी साथ दे, फिर मौत का राहत होना।
कौन समझेगा भला राज़-ए-हयात-ओ-मौत को,
आना दुनिया में, फिर ख़ामोशी से रुख़्सत होना।
'ज्ञानेश' इस फ़लसफ़े को न समझ पाए कोई,
ज़िंदगी दर्द का दरिया, मौत है साहिल होना।
ग़ज़लकार एवं जनकवि
ज्ञानेश्वर आनन्द ज्ञानेश किरतपुरी