हवाओं ने रुख बदला है,
अब दिल को समझाना कैसा,
जो मुकद्दर में लिखा है,
उससे नज़रें चुराना कैसा?
मंज़िलें दूर सही,
पर सफर में एक मज़ा तो है,
हार के डर से खुद को पिंजरे में बिठाना कैसा?
सितारे गवाह हैं,
ये रात अभी बाकी है,
मेरे जूनून की थोड़ी सी साख अभी बाकी है।
दुनिया कहती है कि मुमकिन नहीं जीत पाना,
मगर मेरे इरादों की पूरी कायनात अभी बाकी है।
Tripti_singh