नदी के किनारे
नदी के किनारे बैठी,
शीतल जल के दर्पण में
खुद को निहारा करती थी।
आते-जाते लोगों से,
दुनिया की सारी चकाचौंध से,
वह अक्सर किनारा करती थी।
दर्पण में झाँकते हुए
वह उन जुल्फ़ों को देखा करती,
जिन्हें कभी किसी ने
अपने हाथों से संवारा नहीं था।
उन नम, थकी आँखों को,
जिन्हें कभी काजल ने भी
अपना घर नहीं माना था।
पास पड़े एक सूखे पत्ते को
उसने धीरे से उठाया,
और नदी की नमी से मिलाया।
अब वह पत्ता वैसा कठोर न था,
उसमें कुछ कोमलता लौट आई थी
थोड़ा-सा टूटा,
थोड़ा-सा नम,
मगर पहले जैसा नहीं।
धीरे-धीरे सूरज ढल रहा था,
मानो रोशनी और अँधेरा
एक-दूसरे से गले मिल रहे हों।
और वह सोचने लगी
क्या वह सचमुच
सिर्फ़ एक दर्पण था?
या फिर कोई दिल,
जो बरसों की वीरानी के बाद
एक नई रोशनी की प्रतीक्षा में
चुपचाप जल रहा था।
क्योंकि कभी-कभी,
दर्पण चेहरा नहीं दिखाते
वे हमारी अधूरी कहानियाँ दिखाते हैं।