चश्मा
व्यंग्य कविता
एक अनपढ़ ने सुना था
चश्मा लगाकर सब पढ़ सकते हैं
मन में लड्डू फूटा, सोचा
मैं भी पढ़ सकता हूँ
पहुँचा दुकान पर
दिखाने लगा दुकानदार
सभी चश्मे एक से बढ़कर एक
सुन्दर-सुन्दर फ्रेम
बारी-बारी से सब चेक कर चुका
पर वो तो अनपढ़ था
दिख तो सब रहा था
छोटा-मोटा, आड़ा-तिरछा
पर पढ़े कैसे ये ना आता
झुंझलाकर दुकानदार ने पूछा
भाई क्या तुम्हें पढ़ना आता
अनपढ़ बोला, नहीं आता
तभी तो दुकान पर आया
तुमने ही ऐसा बोर्ड लगवाया
मुझे मेरे दोस्त ने बताया
सारे चश्मे बेकार तुम्हारे
क्यूँ झूठा प्रचार फैलाया
सुनकर दुकानदार का
सिर चकराया
गिरा जमीन पर, ना दे कुछ दिखाई
अनपढ़ ने उसकी नाक पर
चश्मा पहनाया और
अपने घर को आया।
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली