Hindi Quote in Poem by Anup Gajare

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"…दो महीने का रक़ीब..."

ये जहां खत्म होने से पहले
मैं जाना चाहता हु वहां
उसी दुनिया के अंतिम छौर पर,

जिस कायनात में
थे पुराने ढर्रे के मंदिर
मुंह से बोले गए जुटे मंत्र

और तुम!

जीर्ण काले पत्थरों के घाट की
किसी पायदान पर बैठी
सामने बहती बेनाम सी नदी।

साथ हर तरफ लगे हुए
चातुर्मास के मेले,

आंगन में रंगोली बनाती तुम
बिखरे रंग सिमटकर उन्हें
अलग-अलग भाषाओं में
बुन देती आई हो हमेशा
जैसे बनाती हो दो दुनियाओं के
बीच कोई बेगाना सेतू।

फिर पूछती हो
रंगोली बनाते
या पत्थर पर बैठे हुए
की तुम कहानीकार हो
तो सुबह की हल्की बारिश में
छिड़क दो अपनी कहानियां,

सोनी महीवाल की
हिर रांझा की
लैला मजनू की
कोई भी कहानी सुना दो
जो हजार बार सुन चुकी हु
तुम्हारे मुंह से
लेकिन कितना भी सुनो कहानियां
कभी पुरानी या जुटी नहीं होती
मंदिरों या मंत्रों की तरह।

जितने भी नाम गिनाए
तुमने हर उस पन्ने पर औरत का नाम
पहले आता है

क्योंकि प्रेम ही औरत होना है
मर्द तो बस कर सकता है इबादत

जैसे अपनी ही लैला में
खोए हुए मजनू ने नमाज पढ़ते
लोगों के दिलों में चिल्लाते हुए डाली थी खलन

हां, यही कारण था
उसे पत्थरों से नवाजा गया

तो तब क्या कहा था उसने
उन नमाजियों को?

अपना हाथ ठूड्डी पर रखते हुए
सिर को हल्का सा झुकाकर
वह मेरी तरफ देखते हुए
व्याकुलता से पूछती है

तो तब मजनू ने क्या कहा था?

और मैं देखता हु
आसमान की तरफ जिसमें असंख्य छेद थे
हल्की बूंदे बारिशी शॉवर की तरह टपक रही थी
पायदान के काले पत्थर चमक रहे थे
शायद इन पत्थरों के ही पूर्वज
मजनू को किसी वास्तविकता की तरह
लगे हो जोर से।

तो मजनू के बदन से खून बहता रहा
उसके देह का हर एक कोना
कर दिया गया था छन्नी
फिर भी बहते हुए सुर्ख लहू में
बस दो ही अक्षर थे

लै... ला... लै... ला...
लै... ला... लै... ला...

चेहरे की हर सिलवट में जरा भी गुस्सा नहीं था
क्यों हो प्रेम का प्रतिशब्द नहीं होता है नफरत
या तिरस्कार...
प्रेम का विलोम होता है अहंकार
उसी अंह के गर्भ में दबा होता है गुस्सा

तो जहां प्रेम हो
वहां अंहकार ही नहीं
तो फिर कैसे आता मजनू को गुस्सा
उन नमाजियों पर

उसने बस उन्हें कहा इतना कि
मैं... मैं... तो अपने माशूक में खोया हुआ था
मुझे आप इबादत में गढ़े हुए दिखाई नहीं दिए
इस चिल्लाया
पर आप भी तो अपने माशूक में खोए हुए थे
फिर आपको मैं कैसे सुनाई दिया?

कहानी खत्म करते हुए
मैंने उसकी तरफ देखा
उसने मेरे लिए सप्तरंग में डूबा
छाता खोल दिया था

शॉवर से पानी के पत्थर
अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे

फिर उसने पूजा की थाल उठाई
जिसमें रंगोली भी थी
पुराने ढर्रे के मंदिरों के लिए
वह थाल समर्पित थी
साथ अर्पित थे चातुर्मास के ये उसके दो महीने भी

मैं खफा था कि
मुझे पूरे साल में उसके बस दस महीने मिलते है

पूरे दो मास
वह नहीं रहती मेरी कभी
वह सबकुछ भूल जाती है
जो आसमान में छेद करते हुए
शॉवर चालू करता है
ये दो महीने वह बस उसकी होती है

और मैं जलता
या ईर्ष्या नहीं करता हु उससे

इसीलिए ये जहां खत्म होने से पहले
मैं जाना चाहता हु वहां
उसी दुनिया के अंतिम छौर पर,

जहा दो मास मेरे महबूब को
उसके लिए मिले
मेरी कोई खलन ना हो

वह अपनी इबादत में डूबी रहे
और मैं बैठा रहूं तीसरी पायदान मुहब्बत पर ही
उसे पांचवीं पायदान पर बैठे बेनाम सी नदी को देखते हुए

मैं उस सेतु पर चलता जाऊ
जो उसने अपनी रंगोली में पिरोया था।

क्योंकि ये दो महीने
रब ही मेरा रकीब रहेगा

Hindi Poem by Anup Gajare : 112033196
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