पुरुष को अपनी शैशवावस्था का बोध तब होता है जब उस पर माँ भगवती कृपा करती हैं। इसके बाद ही वह जगत की स्त्रियों में विद्यमान शक्ति की अनुभूति करके उनके समक्ष मस्तक झुका सकता है। वास्तविक ब्रह्मचर्य यही है। शरीर के स्तर पर जो लंगोट करके शक्तिसंचय कर रहे होते हैं, लुट ही जाते एकदिन।