कुछ पल ठहर जाऊँ मैं, खुद से रूबरू होने के लिए,
भागती इस दुनिया में, थोड़ा सुकून बोने के लिए।
न मंज़िल की जल्दी हो, न रास्तों की फिकर,
बस एक शांत कोना हो, और यादों का ज़िक्र।
ठहर जाऊँ कि देख सकूँ, ढलते सूरज की लाली,
महसूस करूँ उस हवा को, जो लगती है खाली-खाली।
ज़िम्मेदारियों की धूप में, बहुत दूर तक आई हूँ,
अब अपनी ही छाँव में, सुस्ताने की बारी है मेरी।
कुछ पल ठहर जाऊँ मैं, फिर से मुस्कराने के लिए,
कल की नई उड़ान को, पंख देने के बहाने के लिए।