मेरी ज़िंदगी की किताब का
वो हिस्सा माँग रहे हो तुम,
जिसके पन्ने कभी
आँसुओं में भीगे,
फिर दर्द में फाड़ दिए गए…
और आखिर में
वक़्त ने उन्हें जला दिया।
अब उस कहानी को दोबारा सुनाने के लिए
मुझे फिर वही दर्द जीना पड़ेगा, कान्हा।
अगर इतना आसान होता
तुम्हें वो अधूरा पन्ना सौंप देना,
तो शायद मैं
हर रात टूटकर रोती नहीं…
हर मुस्कान के पीछे
इतना दर्द छुपाती नहीं।
मैं क्या दूँ तुम्हें…?
वो हिस्सा अब कहीं बचा ही नहीं।
अब तो बस
या तो खुद को फिर से लिखना पड़ेगा,
या अपने ही वजूद को मिटाना पड़ेगा। 💔