उदास कर देती है हर रोज ये शाम,
ऐसा लगता है कोई भूल रहा है धीरे धीरे...
बढ़ने लगी हैं दिल की धड़कनें और तन्हाई,
यादों का कारवां गुजर रहा है धीरे धीरे।
जो कभी कहते थे कि बिछड़ेंगे न हम कभी,
अब उनका लहजा बदल रहा है धीरे धीरे।
उम्मीद का दीया जो जलाया था हमने कभी,
वो खामोशी से अब बुझ रहा है धीरे धीरे।
वक्त के इस बेरहम समंदर में न जाने क्यों,
कोई हमसे दूर निकल रहा है धीरे धीरे।