कविता
बिल्कुल शगुन नहीं है
चारों तरफ बस खामोशी है
और इस खामोशी में अजीब सी शांति है
पर इस अजीब से शांति में कहीं भी बिल्कुल सगुन नहीं है
अजीब है शांति
जिंदगी है
पर जीने का एहसास नहीं है
सांसे चल रही है
पर क्यों दिल में कोई जज्बात नहीं है
दर्द हो रहा है पर कहां यह भी नहीं पता
आंखें नाम नहीं है
बस खाली है
खामोश ठंडी पड़ी हुई
जिसमें किसी से शिकायत भी नहीं है
ऐसा लग रहा है
कि सब कुछ जानकार उठने के बाद
एक नया सवेरा है
जहां कोई नया सूरज नहीं
जहां कोई उम्मीद नहीं
जहां से कोई और रास्ता शुरू ही नहीं होती
जिसका कोई मंजिल ही नहीं
बस एक ठेहराऊ है
अनंत समय के लिए
अपने अंदर की खालीपन को समेटे हुए
एक इंसान सुबह के उस अंनत अंधेरों में बस खड़ा है
बिना कहीं देखे
बिना किसी पर भरोसा किऐ
बस सारे उपेक्षा को खत्म करके बैठा है
अभी कोई पिक्चर नहीं है
बस में हूं और मेरे अंदर शांति है
अजीब सी जिसमें सगुन बिल्कुल नहीं है
जेसै की कुछ नहीं बदलने वाला
चाहे में कितनी भी कोशिश कर लूं
कोई उम्मीद नहीं है
बस ठेहराऊ है मेरे अंदर अनंत काल के लिए