आंखें पत्थर बन ही जाए तो अच्छा है
कविता
आंखें पत्थर बन जाए उम्मीद करती हूं
सारे जज्बतें थम जाए ऐ उम्मीद करती हूं
पलके बंद हो जाए ऐ उम्मीद करती हूं
और मैं सो जाऊं उम्मीद करती हूं
सोने के बाद शायद दर्द कम हो जाएंगे
सोने के बाद शायद बेचैनी काम हो जाएंगे
सोने के बाद शायद आराम मिलेंगे
थकावट से चूर हूं
शायद मरघट में जाने के बाद
थमे सासे को नई उम्मीद मिलेंगे
मरघट में परे हड्डियां गाबा है
आखिरी उम्मीद यही है
मौत से कौन डरता है
मौत अंतहीन है तो
मौत अंतहीन भी नहीं
आसान सारे सवालों की जवाब ढूंढना मुश्किल लगता है
मौत के बाद जिंदगी कौन चाहता है
जिंदगी मरघट में जलते मसाले हैं
और इस मसाल को रोज मैंने देखा है
सवेरा होते ही बुझा दिया जाता है
आधी मुर्दा होकर जी रही हूं
जिंदा होने की ख्वाहिश में
पर अब लगता है
थम थम के सांस जो चलते हैं
वह हमेशा के लिए थम ही जाए तो अच्छा है
आंखें पत्थर हो जाए तो अच्छा है
अगर यह कविता आप सबको पसंद आए तो
आगे पढ़ते रहिए
मैं आपके प्रिय लेखक अभी निशा ❤️🦋💯