खयालात।
लिखते हैं हम भी खयालात के शब्द कभी,
जज़्बातों की जब कदर हो जाती है कभी।
खामोशियों के शहर में गूँजते हैं सवालात,
दिल की दीवारों पे दस्तक दे जाती है कभी।
वो लम्हे जो गुज़रे थे अनकहे किसी मोड़ पर,
याद बनकर आँखों में उतर आते हैं कभी।
हमने भी सीखा है दर्द को मुस्कुराना यहाँ,
वरना अश्क भी बगावत कर जाते हैं कभी।
इश्क़ की राहों में हर पल इक इम्तिहान है,
जो हार गए वही तो खुद को पाते हैं कभी।
लफ़्ज़ों की स्याही से तक़दीर लिखने चले हम,
पर हालात ही क़लम को मरोड़ जाते हैं कभी।
प्रसंग कहता है, ख्वाबों को सच समझो कभी,
वरना हक़ीक़त भी धोखा दे जाती है कभी।
- "प्रसंग"
प्रणयराज रणवीर