वक्त के ज़ख्म।
बदलते वक्त ने मुझे नया मुकाम दे दिया,
मैंने जो चाहा नहीं था वही ज़ख्म दे दिया।
सुकून की ख़ातिर बस दिल ठहर गया कहीं,
किस्मत ने हर अरमान को धुआँ दे दिया।
रिश्तों की भीड़ में अजनबी सा खड़ा रहा,
चेहरों के बदलते रंगों ने इम्तिहां दे दिया।
जिसको अपना समझा, वो बेवफ़ा निकला,
उसने ही दिल की बात को सरेआम दे दिया।
वफ़ा की राह पर चला तो ठोकरें मिलीं,
दौर-ए-जहाँ ने हर कदम पे फ़साना दे दिया।
अब न शिकायत रही, न कोई गिला बचा,
तजुर्बों ने हर दर्द को सलीक़ा दे दिया।
'प्रसंग' तन्हाइयों में अपनी सदा सुनता रहा,
ख़ामोशी ने हर लफ़्ज़ को बयाँ दे दिया।
प्रसंग
प्रणयराज रणवीर