"मैं ऐसी ही हूँ"
मैं उम्र के उस पड़ाव पर हूँ
जहाँ दिल का लगना लाज़मी है मुझे।
हक़ीक़त में जीना सीखा ही नहीं
मेरा लगाव जो है, थोड़ा कागज़ी है मुझे।
मैं नहीं चाहती
मेरी उँगलियों में हीरा सजा हो कोई।
उठाकर घास का तिनका,
उम्र भर का वादा पहनाए मुझे
बस इतना काफ़ी है।
महँगे तोहफ़े, बड़ी-बड़ी बातें,
इन सबसे मेरा कोई लगाव नहीं।
अपने हाथों से ख़त लिखकर,
पढ़े कोई मेरे लिए
इससे बड़ी सौगात नहीं कोई।
हाँ, मैं ऐसी ही हूँ
थोड़ा बचपन, थोड़ी ज़िद हूँ।
न दुनिया जैसी, न दुनिया से अलग,
बस अपने जैसी हूँ।
मुझे तारे तोड़कर लाने वाले नहीं चाहिए।
मेरे साथ बैठकर
तारों को देखने वाला चाहिए।
बड़े-बड़े वादे नहीं,
एक छोटा सा भरोसा चाहिए
जहाँ मैं बिन डरे
ख़ुद को रख सकूँ।
तो आना,
अगर आ सको तो
ख़ाली हाथ आना।
बस एक कागज़,
एक कलम,
और साथ रहने का
सच्चा इरादा लाना।
प्राची तंवर …..