सरकार पॉलीथिन के उपयोग पर रोक लगाने की बजाय पॉलीथिन बनाने वाली फैक्टरियों पर रोक क्यों नहीं लगती है ?
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क्रूड ऑयल की रिफायनिंग से कई प्रकार के सह उत्पाद एवं केमिकल वेस्ट निकलता है। पॉली एथिलीन (पॉलीथीन) भी इसी तरह का एक केमिकल वेस्ट है। कानूनन तेल कम्पनियों को इन्हें ठिकाने (Dispose) लगाना होता है। पॉलीथीन के इन दानो से प्लास्टिक के कैरी बेग बनते है। और फिर जो बच जाता है उसे तेल कम्पनियां इधर उधर समन्दर वगेरह में बहा कर डिस्पोज कर देती है। इसे डिस्पोज करने से कुछ पैसा वगेरह तो मिलता नहीं, उलटे लागत बढ़ जाती है !! तो तेल कम्पनियां चाहती है कि प्लास्टिक के ये दाने बिकते रहे !!
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सरकारें यदि कैरी बेग बनाने वाली फैक्ट्रियों को बेन कर देगी तो इन दानो की मांग घटेगी और तेल कंपनियों को घाटा होगा। बस यही वजह है !!
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बहरहाल, इस तरह के कई क़ानून है जिन्हें हम सिर्फ इसीलिए ढो रहे है क्योंकि इससे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को घाटा होता है। भारत में पेड मीडिया की प्रायोजक बहुराष्ट्रीय कम्पनियां है। अत: पेड मीडिया में नजर आने वाली कोई भी पार्टी एवं नेता पेड मीडिया के प्रयोजको के खिलाफ नहीं जाना चाहता।
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उदाहरण के लिए कभी टाटा को केमिकल वेस्ट के रूप में निकलने वाला अपना टनों सोडियम क्लोराइड दशको तक समन्दर में बहाना पड़ता था। लेकिन जब उन्होंने आयोडाइज्ड नमक का क़ानून बनवा दिया तो यह झक सफ़ेद Mineral Less शुद्ध NaCl केमिकल आयोडीन नमक के नाम से महंगे में बिकने लगा !! टाटा के पास आयोडीन की माइंसे भी थी। इस क़ानून के आने से आयोडीन की भी मांग बढ़ी और टाटा ने इधर से भी मुनाफा बनाया।
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यह सब 90 के दशक की बातें है, अत: ज्यादातर पाठक इस घटनाक्रम से परिचित नहीं होंगे। फिर उन्होंने खुला नमक बेचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया जिसकी वजह से समुद्री नमक ( जो कि मिनरल्स का सबसे अच्छा स्त्रोत है ) का फुटकर कारोबार बंद हो गया ।
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अब इस चक्कर में करोड़ो लोग Mineral Less नमक खाने के कारण कुपोषण के शिकार हो गए तो इससे राज नेताओं को कोई दिक्कत नहीं है। क्योंकि नेता को चुनाव जीतने के लिए पेड मीडिया का सपोर्ट चाहिए पेड मीडिया इन कम्पनियों के कब्जे में है।
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तेल कम्पनियां हथियार बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बाद दुसरे नंबर की सबसे ताकतवर कम्पनियां है। भारत की सभी राजनैतिक पार्टियो के नेता भी चुनाव जीतने वगेरह के लिए इन पर बुरी तरह से निर्भर करते है। वैसे भी भारत के पास तेल निकालने की तकनीक नहीं है। तो इन कम्पनियों से टकराव लेने का सवाल ही नहीं।
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कुछ 6-7 साल पहले जब मेरे एक परिचित ने बायो प्लास्टिक की मेनुफेक्चरिंग शुरू करने की कोशिश की थी तो मुझे इस विषय के बारे में जानकारी हुयी थी। बायो प्लास्टिक के कैरी बेग जो मैंने देखे थे वे पॉलीथीन के कैरी बेग के समान ही उपयोगी थे, किन्तु उनकी कीमत लगभग 30-40% ज्यादा थी। सरकार यदि इम्पोर्ट ड्यूटी का स्ट्रक्चर पलट दे और इसे प्रोत्साहित करने लगे तो इसका उत्पादन कम कीमत में होने लगेगा, और पॉलीथीन की एक बड़ी खपत को यह बाजार से बाहर कर सकता है।
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इसके अलावा और भी कई तरीके है, प्लास्टिक के कैरी बैग को रिप्लेस करने है। लेकिन नेता वगेरह तेल कम्पनियों से टकराव लेने से बचना चाहते है। इसीलिए सरकारें टोकन के रूप में छोटे छोटे अप्रभावी फैसले लेकर माहौल बनाये रखती है कि हम कोशिश कर रहे है !!
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इसके अलावा तेल कम्पनियां उन एनजीओ वगेरह को भी अनुदान देते रहती है जो पर्यावरण बचाने के नाम पर पॉलीथीन के खिलाफ मुहीम चलाकर जनता का ध्यान भटकाने का काम करते है। मतलब ये पेशेवर ज्ञान बांटने वाले पेड बुद्धिजीवी जनता में "जागरूकता" फैलाते है, और बदले में तेल कम्पनियां इन्हें अनुदान देते रहती है।
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यदि जागरूकता फैलाने वाले ये ज्ञानी गायब हो जायेंगे तो लोगो का ध्यान पॉलीथीन को रोकने के लिए कानून बनाने की और जाएगा और तेल कम्पनियों को घाटा होगा। तो पॉलीथीन को चलन में बनाए रखने का तरीका है कि कार्यकर्ताओं को कानूनों की मांग करने की जगह पर्यावरण पर ज्ञान बांटने और जागरुकता फैलाने में लगाए रखिये !!
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इसका स्थायी समाधान जूरी कोर्ट एवं रिक्त भूमि कर लागू करना है। जूरी कोर्ट के आने से भारत की कम्पनियां जल्दी ही रिफायनरी में काम आने वाले उपकरण बनाने की तकनीक जुटा लेगी और तब हमारे नेता तेल कम्पनियों के खिलाफ जाकर फैसले कर सकते है। ये रास्ता लम्बा है। मतलब जूरी कोर्ट आने के बाद भी कम से कम 6-7 वर्ष और लगेंगे इस तरह की तकनीक जुटाने में। लेकिन तेल निकालने की मशीने बनाने की क्षमता जुटाने के अलावा इन कम्पनियों के पंजे से बाहर आने का अन्य कोई उपाय भी नहीं है !!
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