कोई गीत
कविता
यह अल्फाज
1
कोई गीत लिखा था
मैंने अपनी अल्फ़ाज़ में
पसंद उन्हें भी होना चाहिए था
मन की जिंदगी मेरी थी
मन की जिंदगी बाकी में मेरी थी
पर जतन उन्का भी होना चाहिए था
2
अपने लिखावट से मैं ने एक नूर निकला
अपने गमों से ताकते हुए
हथेली पे लेकर निहारा तो
अपने तकदीर निकला
3
तकदीर भी बेरुखी था
मैंने अपनी स्याही में से
एक पीर निकला
उस पीर ने मुझे हंसी
और खुद को जवा बताया
मोहब्बत में मोहब्बत के लिए
मेरे दिल का किराया बताए
और मैंने उसे हंसी किताबों का नाम
ना खोल ना पढ़ा
और उस अल्फाज को मैं ना देखा ना सुना
ना ठिकाना पूछा जाना
और मैंने उससे जन्नत जहां बताया
4
तकरीबन 2 घंटे पहले का मुलाकात था
सुबह होकर भी अभी रात था
समा बुझ चुका था
परवाने के दिल भी साफ था
5
और यह कैसा हालत था
ना मिलने वाला था ना दूर जाने वाला
ऐय मेरे रब क्या एसा मेरा कर्म है
तुम्हारा नाम से मुंह में पहला निवाला
तुम्हारा नाम से है आखिरी सांस
6
जब जिंदगी छोड़ ना चाहूं तो
हो तुम्हारी बात
चंद सजदे पर रहे
और बाहों में तुम भरो
तारे मुस्कुराए
और नदिया के किनारे हम मिले
दर्द मुझे दे
ए मेरे रब
मेरे सनम को बेसक ना कोई गम मिले
सलामत रहे वे मेरे धड़कनों के हर एक धुन में
मेरे दुआ है
यह मेरे रब से
मेरे मरने के बाद भी
खुश रहे मेरे सनम जहां में