आकाश से गिरती बूंद ने सोचा मै अनजाने पथ पर बढ रही हूँ ,मेरा क्या होगा ? क्या मै तपते रेगिस्तान मे गिरूंगी या किसी विषधर के मुख का ग्रास बनूंगी या किसी धरती मे बोये बीज पर गिरकर उसे पोषित करूंगी , जो भी हो कर्म पथ पर बढना है , इसी सत्संकल्प ने उसे सीपी के मुख मे पहुंचा दिया वह मोती बन गयी । अतः गतिशील रहो सत्संकल्प से कर्म करते रहो तो परिणाम सुन्दर ही होता है