“आसमान “
लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं,
तुम्हारी हर दूसरी कविता में आसमान क्यों उतर आता है?
मैं हर बार बस मुस्कुरा देती हूँ।
कैसे बताऊँ,
ज़मीन ने मुझे चलना तो सिखाया,
मगर हर कदम पर रुकने की वजह भी दी।
कभी रिश्तों के नाम पर,
कभी मर्यादा के नाम पर,
कभी इस डर से कि लोग क्या कहेंगे।
मैंने देखा है…
ज़मीन हमेशा पाँव पकड़ती है।
और आसमान… वह कभी हाथ नहीं पकड़ता, बस पुकारता है।
शायद इसलिए मुझे उससे मोहब्बत हो गई।
मैंने बचपन से बादलों में अपने चेहरे ढूँढे हैं।
चिड़ियों की उड़ानों में अपनी अधूरी इच्छाएँ रखी हैं।
पतंग कटती थी, तो दुख मुझे होता था।
क्योंकि धागा उसका नहीं, मेरा टूटता था।
मैंने कभी आसमान को छूने की ज़िद नहीं की।
मैं तो बस इतना चाहती थी कि कोई मेरी उड़ान से डरे नहीं।
लोग कहते हैं, “तुम बहुत ऊँचा सोचती हो।”
उन्हें कौन समझाए, ऊँचाई मेरी मंज़िल नहीं, मेरी साँस है।
जिस दिन मेरे हिस्से का आसमान मुझसे छिन जाएगा,
उस दिन मैं ज़िंदा तो रहूँगी,
मगर वैसी ही… जैसे पिंजरे में बैठी चिड़िया,
जिसके पंख सलामत हैं, पर उड़ान नहीं।
इसलिए मेरी हर कविता में थोड़ा-सा आसमान रहता है।
क्योंकि धरती ने मुझे जन्म दिया है,
पर… जीना मैंने हमेशा आसमान से सीखा है।
प्राची गुर्जर….