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ઢોલ, ઢોલક, ગવાર, બુદ્ધિ વગરનું, શુદ્ર, એટલે ઝીણા જીવ જંતુઓ, નારી, એટલે પ્રકૃતિ. પ્રકૃતિ જડ છે એટલે એને તમે પીડા ના આપો તો ના સુધરે. પ્રકૃતિ સજીવની પણ હોય અને નિર્જીવની પણ હોય. વિચારો કે તમે પથ્થર પર પડો કે પથ્થર તમારા પર પડે લાગશે તો તમને જ઼.દારૂડિયો દારૂ ના મૂકે છેલ્લે દારૂ દારૂડિયા ને મૂકી દે.આગ, પાણી, વાયુ આ પ્રકૃતિ છે આ ત્રણ તત્વ શરીરમા વધે તોય નુકસાન કરે અને ઘટે તોય નુકસાન કરે. વાત, પિત્ત અને કફ સરખું હોવું જોઈએ. જો આદત સારી હોય તો જીવન સુધરે અને ખરાબ હોય તો જીવન બગાડે. માટે જે આપણો આત્મા છે એનું કહ્યું માનવાનું જો મનનું કહ્યું માનશો તો મરશો. લી, "આર્ય "

aryvardhanshihbchauhan.477925

कविता पार्ट 1
औरत के लिए


शायरी किताबों पर ही अच्छी लगती है
औरत के लिए
मर्द यह करते हैं मर्द वह करते हैं औरत के लिए
फिर औरत क्यों रोती है

रियल लाइफ में देखो
हर कविता बेकार लगती है
औरत के लिए

कोई चांद नहीं कोई शान नहीं
ना सुनहरा जहां
ना कोई सितारा ना खुद का कोई सूरज
बस खाली आसमान


लोग कहते हैं बंजर है
धरती यहां की
जहां औरत रहती है
बस खुद की



तुमने कहा
औरत के लिए मर्द क्या-क्या नहीं करते
पर हर औरत इतनी खुश नसीब नही होती
की कविता से बाहर
उस औरत की जिंदगी कोई मर्द आ कर
उसकी जिंदगी सवार दे


सच यह है कि औरत को मर्द नहीं चाहिए
बस चाहिए एक साथी जो उसके साथ चलते रहे
सच यह है कि
औरत को मर्दों से कुछ नहीं चाहिए
ना धन दौलत ना ना चांद सितारे
ना हीरा मोती
बस औरत को चाहिए उसे समझने वाला एक इंसान

उसे एक ऐसा इंसान चाहिए
जो औरत को कहे
तु औरत नहीं एक इंसान है
और आजादी पर जितना मेरा हक है
उतना ही तुम्हारा भी



औरत इसलिए नहीं खुश होती की
दुनिया की हर कविता
उसे पर लिखी जा रही है


औरत इसलिए रोती है
क्योंकि उस कविता में
औरत पूरी तरह से खुद की नहीं है
कभी कोई कविता औरत को पूरी तरह से शामिल किया ही नहीं है


औरत को कविता से बाहर वह मर्द चाहिए
जो औरत को उसे अपना कर दे
और कहे जी ले
अपनी जिंदगी मैं हूं ना
तेरे साथ

abhinisha

पन्द्रह अगस्त सन सैतालिस, को ये भारत आजाद हुआ,
सूरज निकला अँधेर छँटा, जोरों से जिन्दाबाद हुआ।।

पूरी धरती पर जालिम ने, अपना परचम लहराया था,
दुनियाँ के कोने – कोने में, अपना झण्डा फहराया था,
ये सूरज नहीं डूबता था, जिसके शासित भू-भागों में,
जिसने इस पूरी धरती को, बाँटा था कितने भागों में,
वो जालिम अत्याचारी जो, लोगों पर हुक्म चलाता था
गोरी चमड़ी का दानव था, जग में अंग्रेज कहाता था ।।

अब इस धरती की बात करें,जो चीखा करती जोरों से,
जो पीड़ित और प्रताणित थी, उन अत्याचारी गोरों से,
अपने लालों के बलिदानों, पर हर दिन हरपल रोती थी,
लेकिन वो बीज वीरता के, आँगन – आँगन में बोती थी,
माटी का पोषण पा पा कर, पौधे प्रवीर कुछ उगते थे,
जो अंग्रेजों के सीनों में, भाले बन बनकर चुभते थे ।।

सौ दो सौ साल लड़े थे जो, बरसों-बरसों बलिदान हुए,
जो पीढ़ी – पीढ़ी जन्म लिए, पीढ़ी – पीढ़ी कुर्बान हुए,
वो बलिदानी वो क्रांतिवीर, सीधे – सीधे अड़ जाते थे,
अपनी हिम्मत के दम पर जो, अंग्रेजों से भिड़ जाते थे,
लक्ष्मी बाई, नाना, तात्या, के जैसे कितने जान दिये,
मंगलपाण्डे या वीरकुंवर,बनके कितने बलिदान दिये ।।

आगे उपजे कुछ भगत सिंह, कुछशेखर थे कुछबिस्मिल थे,
जब आजादी की लपट उठी, तब लाखों योद्धा शामिल थे,
ना जाने कितने भस्म हुए, यज्ञान्दोलन में आहुति बन,
फिर निकल पड़ी जनता सारी, फिर टूट गई सारी जकड़न,
कुछ गाँधी नेहरू कुछ सुभाष, कुछ सावरकर बन कर आए,
कुछतिलक लाजपत कुछपटेल,भारत की जनता को भाए।।

हुँक्कार भरा फिर लोगों ने, फिर एक लक्ष्य को साधा था,
माँ भारति को जंजीरों में, जिसने कस कर के बाँधा था,
उसका अब अंत सुनिश्चित था, जब लोगों ने था ललकारा,
अत्याचारी अंग्रेजों को, दौड़ा – दौड़ा कर था मारा,
जब उग्र हुआ था आन्दोलन, तब गोरे थर – थर काँपे थे,
अब देश छोड़कर जल्दी ही, जाना है, स्थिति भाँपे थे ।।

लेकिन फिर कुछ ने धरती माँ, को दो टुकड़ों में बांट दिया,
नफरत की ऐसी आग जली, खुद ने ही खुद को काट दिया,
झंझावातों के बाद “विजय”, फिर सुबह सुहानी आई थी,
हर ओर खुशी के दीप जले, हर ओर रौशनी छाई थी,
फिर ऊँचे अंबर में अपना, आजाद तिरंगा लहराया,
सदियों सदियों के संघर्षों, का हमने शुभ प्रतिफल पाया ।।

पन्द्रह अगस्त सन सैतालिस, को देश मेरा आजाद हुआ,
सूरज निकला अँधेर छँटा, जोरों से जिन्दाबाद हुआ।।

vijaypshahi

अब ना जाने किस से प्यार करती है

और किसे खोने से डरती है

सच्चे प्यार को वो समझती नहीं

और पूजा महादेव की करती हैं....!!

anisroshan324329

જય શ્રી રાધેકૃષ્ણ 🙏🏻

falgunidostgmailcom

सत्ता के सौदागर”
सिंहासन पर बैठे नागों पर, जनता कब तक फूल चढ़ाए?
जो रक्षक थे इस धरती के, वे ही घर-घर आग लगाए।

वचन बेचते, धर्म बेचते, बेच रहे ईमान वतन का,
सोने की थाली में परोसें, विष हर भूखे निर्धन का।

माथे पर जनसेवा लिखकर, भीतर काला लोभ छिपाए,
हाथ जोड़कर वोट माँगते, फिर जनता को भूल ही जाएँ।

खेतों की हरियाली सूखी, महलों में उत्सव की रातें,
रोटी रोती चौखट-चौखट, हँसती रहती झूठी बातें।

ओ भारत के वीर जवानो!
कब तक यूँ अपमान सहोगे?

जिनकी नसों में स्वार्थ बहा हो,
क्या उनको भगवान कहोगे?

यह धरती राणा की धरती, यह चंद्रगुप्तों की जननी,
यहाँ नहीं बिकता मानव, यहाँ नहीं झुकती है धरणी।

जब-जब सत्ता अंधी होती, जनता बन जाती ज्वाला,
एक चिंगारी ही काफी है, जल जाए अन्याय का जाला।

उठो युवाओं! हुंकार भरो,
अब कलम बने रण का भाला,
सत्य-अग्नि से दग्ध करो तुम
हर भ्रष्टाचारी का जाला।
जिस दिन भूखा किसान उठेगा,
टूटेंगे सोने के सिंहासन,
जनता जब क्रोधित होती है,
डगमग होता हर शासन।

mannugujjar

💌 दिल का notification #06
शीर्षक: रिश्तों मे नाराजगी

रिश्तों मे नाराजगी जायज़ हे,
पर इतनी भी लंबी नहीं के वो लौट के न आए

"रास्तों पर धुंध सी छाई है..."
"माैसम फिर लौट के आया है..."
"वक्त बदला है... तुम भी बदल जाओ..."

"दिल अभी भी तुम्हारा है..."
"चाहो तो लौट के आ जाओ।"

धड़क ते रहिए ❣️
✍🏼जिगर अशोक पंड्या

----------+++----------
कोई हे जो नाराज हे तुमसे तो भेज दीजिए उन्हें, क्या पता एक नोटिफिकेशन से बात बन जाए।

{ 💌अगला नोटिफिकेशन
काँटे}

pandyajigar

तिरंगा,,,,,,,,🌹🌹🙏🌹🌹🇮🇳🇮🇳🇮🇳

drbhattdamayntih1903

“છે એક રંગ આભનો, તો એક રંગ ધરાનો,
કેમ ન કહું કે, છે એક રંગ આપણાં મનનો !”

મનોજ નાવડીયા

manojnavadiya7402

" परवाज़-ए-इश्क़ "

धड़कनों में आज नया एक साज़ होने लगा है,
जब से इस दिल में तेरा आग़ाज़ होने लगा है।
मेरी हर सांस में बस तेरा अंदाज़ होने लगा है,
जब से मुझ पर एक तेरा ही नाज़ होने लगा है।

बिन तेरे मेरा हर एक दिन उदास होने लगा है,
यह दिल अब तेरा करम-नवाज़ होने लगा है।
छुपाए भी नहीं छुपती यह तेरी चाहत अब तो,
तुझे देखने को दिल बेताब आज होने लगा है।

तेरी यादों का हम करें भी तो अब क्या करें?
हर इक नज़ारा भी मुझसे नाराज़ होने लगा है।
तेरी एक झलक देखने को ये दिल है बेकरार,
तेरी जुदाई का हर लम्हा दराज़ होने लगा है।

मिलकर तुझसे मिल गई जैसे पंखों को उड़ान,
मेरे इश्क़ का आसमान में परवाज़ होने लगा है।
भूलकर इस दुनिया को, बस तुझे पा लें हम,
"व्योंम" तेरी बांहों का मोहताज होने लगा है।

✍...© विनोद. मो. सोलंकी " व्योम "
जेटको (GEB) अंजार. मु. रापर.

omjay818

ૐ નમઃ શિવાય 🙏
" શિવ સ્તુતિ "

શિવ શંકર કૈલાસ નિવાસી;
હાથ ત્રિશુળ, ભુજંગ ધારી;
દેવાધિદેવ જય શ્રી મહાદેવ,
ભોલેનાથ સદા મંગલકારી;

ગળે રૂદ્રમાળા, અંગ ભભૂત,
શીશે ગંગ વહે, બિજ ચંદ્રધારી;
વાઘ ચમ્મર, મૂંડમાળા ધરતા,
વગાડે ડમરું કરે નંદી સવારી;

નાચે નાચ તાંડવ શ્રી નટરાજા,
મહા મૃત્યુંજય કલ્યાણકારી;
ત્રિનેત્ર, નિલકંઠ, નાગેશ્વરાય,
મહાકાલેશ્વર, ભોલે ભંડારી;

શિવજી, શિવાજી, શ્રી શિવા,
પૂજા કરતી આ દુનિયા સારી;
ધરા સંગ "વ્યોમ" પર પૂજાયા,
ૐ નમઃ શિવાય, શિવ ૐકારી;

✍...© વિનોદ. મો. સોલંકી "વ્યોમ"
જેટકો (જીઈબી) અજાર. મુ. રાપર.

omjay818

સ્વાતંત્ર્ય દિવસ સ્પેશિયલ...

એકલવીર સાપ્તાહિકમાં પ્રકાશિત થયેલ મારો લેખ...

#martyrsofindia #patriotic #jaihind

mothiyavgmail.com3309

गुलाबी पेरूचे पंचामृत

श्रावण महिन्यात अथवा कोणत्याही धार्मिक कार्यक्रमात जेवणात पंचामृताचे फार महत्व असते
कोणत्याही फळाचे पंचामृत करता येते
पानात वाढलेले पंचामृत पानाची शोभा वाढवत असते

साहित्य..
एक मोठा गुलाबी पेरू
दोन मुठभाजलेले शेंगदाणे
मुठभर भाजलेले तीळ
कढीलिंब,बडीशेप
जीरे मोहरी हिंग मेथी
एका लिंबा एवढ्या चिंचेचा कोळ
तेवढाच गुळ
मीठ, तिखट, हळद ,काळा मसाला
दोन सुक्या मिरच्या

कृती
गुलाबी पेरूच्या मध्यम आकाराच्या फोडी करून घेतल्या

सुके खोबरे काप तळून घेतले
एक मूठ दाण्याचे आणि भाजक्या तिळाचे कूट केले
एक मुठ दाणे अखंड ठेवले
जीरे ,मोहरी ,हिंग ,मेथी , सुक्या मिरच्या घालून फोडणी केली
कढीलिंब त्यात खरपुस तळून
पेरूच्या फोडी घातल्या
वेगळे ठेवलेले दाणे आणि तळलेले खोबरे काप घातले
झाकण ठेवून एक वाफ आली की
फोडी बुडतील ईतके पाणी घालून परत झाकण ठेवले
एक उकळी आली की आवडीनुसार तिखट ,मीठ, हळद, काळा मसाला, गूळ, चिंचेचा कोळ , बडीशेप घातली
दाण्याचे आणि तिळाचे कुट घालून एकसारखे करून घेतले
शेवटी एक झाकण ठेवून वाफ आणली
चवीष्ट चमचमीत पेरुचे पंचामृत तयार आहे
पोळी ,पुरी, भात, धिरडी कशासोबत ही मस्त लागते
नुसते सुध्दा टॉक,😋 लागते
तोंडाला चव आणते 😊😊

jayvrishaligmailcom

શ્રાવણ માસ એટલે માત્ર શિવપૂજા નહીં,
પણ શિવ જેવા ગુણોને જીવનમાં ઉતારવાનો અવસર...

ગળી જાય અપમાન જે વિના અદાવત,
કહેવાય એ મહાદેવજીના સાચા ભગત!

ચાલો, આ શ્રાવણમાં મહાદેવ પાસેથી
સમતાથી જીવવાની અને સૌને આશીર્વાદ આપવાની કળા શીખીએ. 🙏🔱: https://dbf.adalaj.org/buhYqkc1

#harharmahadev #omnamahshivay #shiva #DadaBhagwanFoundation

dadabhagwan1150

🍁If the world of dreams
is the most beautiful place,
why should I ever
open my eyes?🍁

shakthisky108659

"…दो महीने का रक़ीब..."

ये जहां खत्म होने से पहले
मैं जाना चाहता हु वहां
उसी दुनिया के अंतिम छौर पर,

जिस कायनात में
थे पुराने ढर्रे के मंदिर
मुंह से बोले गए जुटे मंत्र

और तुम!

जीर्ण काले पत्थरों के घाट की
किसी पायदान पर बैठी
सामने बहती बेनाम सी नदी।

साथ हर तरफ लगे हुए
चातुर्मास के मेले,

आंगन में रंगोली बनाती तुम
बिखरे रंग सिमटकर उन्हें
अलग-अलग भाषाओं में
बुन देती आई हो हमेशा
जैसे बनाती हो दो दुनियाओं के
बीच कोई बेगाना सेतू।

फिर पूछती हो
रंगोली बनाते
या पत्थर पर बैठे हुए
की तुम कहानीकार हो
तो सुबह की हल्की बारिश में
छिड़क दो अपनी कहानियां,

सोनी महीवाल की
हिर रांझा की
लैला मजनू की
कोई भी कहानी सुना दो
जो हजार बार सुन चुकी हु
तुम्हारे मुंह से
लेकिन कितना भी सुनो कहानियां
कभी पुरानी या जुटी नहीं होती
मंदिरों या मंत्रों की तरह।

जितने भी नाम गिनाए
तुमने हर उस पन्ने पर औरत का नाम
पहले आता है

क्योंकि प्रेम ही औरत होना है
मर्द तो बस कर सकता है इबादत

जैसे अपनी ही लैला में
खोए हुए मजनू ने नमाज पढ़ते
लोगों के दिलों में चिल्लाते हुए डाली थी खलन

हां, यही कारण था
उसे पत्थरों से नवाजा गया

तो तब क्या कहा था उसने
उन नमाजियों को?

अपना हाथ ठूड्डी पर रखते हुए
सिर को हल्का सा झुकाकर
वह मेरी तरफ देखते हुए
व्याकुलता से पूछती है

तो तब मजनू ने क्या कहा था?

और मैं देखता हु
आसमान की तरफ जिसमें असंख्य छेद थे
हल्की बूंदे बारिशी शॉवर की तरह टपक रही थी
पायदान के काले पत्थर चमक रहे थे
शायद इन पत्थरों के ही पूर्वज
मजनू को किसी वास्तविकता की तरह
लगे हो जोर से।

तो मजनू के बदन से खून बहता रहा
उसके देह का हर एक कोना
कर दिया गया था छन्नी
फिर भी बहते हुए सुर्ख लहू में
बस दो ही अक्षर थे

लै... ला... लै... ला...
लै... ला... लै... ला...

चेहरे की हर सिलवट में जरा भी गुस्सा नहीं था
क्यों हो प्रेम का प्रतिशब्द नहीं होता है नफरत
या तिरस्कार...
प्रेम का विलोम होता है अहंकार
उसी अंह के गर्भ में दबा होता है गुस्सा

तो जहां प्रेम हो
वहां अंहकार ही नहीं
तो फिर कैसे आता मजनू को गुस्सा
उन नमाजियों पर

उसने बस उन्हें कहा इतना कि
मैं... मैं... तो अपने माशूक में खोया हुआ था
मुझे आप इबादत में गढ़े हुए दिखाई नहीं दिए
इस चिल्लाया
पर आप भी तो अपने माशूक में खोए हुए थे
फिर आपको मैं कैसे सुनाई दिया?

कहानी खत्म करते हुए
मैंने उसकी तरफ देखा
उसने मेरे लिए सप्तरंग में डूबा
छाता खोल दिया था

शॉवर से पानी के पत्थर
अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे

फिर उसने पूजा की थाल उठाई
जिसमें रंगोली भी थी
पुराने ढर्रे के मंदिरों के लिए
वह थाल समर्पित थी
साथ अर्पित थे चातुर्मास के ये उसके दो महीने भी

मैं खफा था कि
मुझे पूरे साल में उसके बस दस महीने मिलते है

पूरे दो मास
वह नहीं रहती मेरी कभी
वह सबकुछ भूल जाती है
जो आसमान में छेद करते हुए
शॉवर चालू करता है
ये दो महीने वह बस उसकी होती है

और मैं जलता
या ईर्ष्या नहीं करता हु उससे

इसीलिए ये जहां खत्म होने से पहले
मैं जाना चाहता हु वहां
उसी दुनिया के अंतिम छौर पर,

जहा दो मास मेरे महबूब को
उसके लिए मिले
मेरी कोई खलन ना हो

वह अपनी इबादत में डूबी रहे
और मैं बैठा रहूं तीसरी पायदान मुहब्बत पर ही
उसे पांचवीं पायदान पर बैठे बेनाम सी नदी को देखते हुए

मैं उस सेतु पर चलता जाऊ
जो उसने अपनी रंगोली में पिरोया था।

क्योंकि ये दो महीने
रब ही मेरा रकीब रहेगा

anupgajare819691

तुम्हें दूर से ही देखकर
हम तसल्ली कर लेते हैं
हमारी साँसों का पैमाना
अब भी भरा हुआ है

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

ममता गिरीश त्रिवेदी की कविताएं ✍️

mamtagirishtrivedi740648

சில வலிகள் சிரிக்கும் நிலை
எதிர்காலத்தின் வழித்தடத்தில்
காரணம்.....?


........கடந்த காலம்

ibusamee7gmail.com830355

जो कहते थे के जाएंगे न छोड़ के तुझे हर हाल में,
वही गए हैं छोड़कर मुझे बीच मंझधार में।

क्यों गए दूर इतने, क्या मुझसे ख़ता हो गई थी,
जाते-जाते बता जाते, क्या दूर होना ही एक सज़ा थी।
सुलगती जलती रातें मिला है मुझे उपहार में,
वहीं गए हैं छोड़कर मुझे बीच मंझधार में।

बरसों से जो छुपा था, वो प्यार याद दिला गये,
छण भर की खुशियों के बाद हमें अब रुला गये।
ना जी सकूँ, न मर सकूँ, वो दर्द दिया है प्यार में,
वहीं गए हैं छोड़कर मुझे बीच मंझधार में।

दबाये प्यार सीने में जी रहे थे तो सब ठीक था,
मिलकर बिछड़ने से तो न मिलते तो ही ठीक था।
अब आँसुओं के सहारे जिंदगी चली है राह में,
वहीं गए हैं छोड़कर मुझे बीच मंझधार में।

✍️बेनी सागर

benisagar

तेरे दिल से मैं यह पनाह माँगता हूँ,
दे जा मुझे मोहब्बत, यहीं गुनाह माँगता हूँ।

देख लूँ मैं जी भरकर और करूँ प्यार मैं तुझे,
सामने बैठे रहो मेरे यही दीदार-ए-महताब माँगता हूँ।

डूब जाऊँ इन आँखों में, हो जाऊँ गुम कहीं,
तेरी रोशन दो आँखों से, यहीं शराब माँगता हूँ।

कोमल सी पंखुड़ियाँ मेरे लबों पे आ गिरे,
तेरे सुर्ख होठों से, वो गुलाब माँगता हूँ।

थाम लो मेरा दामन और बन जाओ मेरे हमराज,
पढ़ी जाए दास्ताँ हमारी, वो किताब माँगता हूँ।

✍️बेनी सागर

benisagar

कबीर जी के दोहे,,,, 🌹🌹🙏🌹🌹

drbhattdamayntih1903