—दिल का कातिल—
न वो हसीं न अब वो कमाल लगता है,
उसकी हर बात अब सवाल लगता है।
बदल गए हैं वो मौसम की तरह इस कदर,
कि अब तो उनका अपनापन भी जाल लगता है।
ना हंसी मे उनकी वो महक आती है,
और अब ना उनकी खुशी में वो सुकुं शामिल।
वही दे गया ज़ख्म गहरे, जो था हमारी मंज़िल,
जिसे मसीहा समझा दिल का, वो ही इस दिल का कातिल।
-MASHAALLHA