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स्वरचित काव्य :- श्री. दशरथ कृष्णा चव्हाण इगतपुरी, जिल्हा:- नाशिक

dasharath123

अलीबाग की अधूरी शाम
Written By: Vikash Viplao

की होती अगर ये फ़िल्म कोई,
या मेरी किसी कहानी का संसार…
तो इस तरह अधूरी ना होती,
ना होती यूँ बेज़ार।

होती तू हीरोइन उसकी,
और मैं उसका दीवाना हीरो…
सात समुंदर पार करके भी
आ जाता मैं तेरे द्वार।

आँखों में भर लेता तुम्हें,
जैसे सदियों से बस इसी मंज़र का था इंतज़ार…
और धीरे से थाम हाथ तेरा,
करता तेरे चाँद जैसे चेहरे का दीदार।

बिठा के तुझे अपनी बुलेट पे,
निकलता मैं भीड़ से दूर उस पार…
जहाँ सड़कें भी धीरे चलतीं,
और हवा भी चखती बस तेरा ख़ुमार।

कभी तू कंधे पे सर रख देती,
कभी ज़ुल्फ़ें उड़ा देता समुंदरी बयार…
और मैं हर मोड़ पे बस ये सोचता,
काश ठहर जाए कहीं ये सफ़र मेरे यार।

अलीबाग के उस सी फोर्ट पे
बैठ जाते लेकर आँखों में ख़याल हज़ार…
हाथ में गरम चाय की प्याली होती,
और होता लहरों की गुमशुदा ख़ामोशी का संसार।

बालों को सँभालते हुए तू
करती कुछ आधी-अधूरी बातें बार-बार…
हर ख़ामोशी तेरी
जैसे कोई नज़्म हो, वैसे पढ़ता मैं उनका सार।

पर ज़िंदगी को शायद
मुकम्मल कहानियों से नहीं है प्यार…
इसलिए तो कुछ सफ़र बस दिल में रहते हैं,
और यादें बन फिरते रहते हैं बेक़रार।

शायद कल भी जब समुंदर देखूँगा,
तो महसूस होगा वही पुराना अँधकार…
जैसे अलीबाग की वो हर अधूरी शाम
उम्र भर करती रहेगी हमारा इंतज़ार।

vikashviplao420482

इश्क के सात रंग
Seven Stages of Love
इश्क़ की एक काव्यात्मक यात्रा—पहली नज़र की दिलकशी से उन्स, इश्क़, अक़ीदत, इबादत और जुनून से गुज़रते हुए मौत यानी फ़ना तक।

Written By: Vikash Viplao

Stage 1 — दिलकशी / आकर्षण
ख़ता तो थी गुस्ताख़ नज़र की…
इल्ज़ाम-ए-उल्फ़त में पर
दिल गोया गुनाहगार हुआ।
देख झलक उस नूरानी चेहरे की
हादसा ये दिलकशी का 'विप्लव'
साथ मेरे सरेबाज़ार हुआ।।

Stage 2 — उन्स / लगाव
ख़बर नहीं, इस ख़ुमारी की वजह का 'साक़ी',
मालूम नहीं, थी हक़ीक़त या बस एक ख़्वाब।
वो पलकों का झुकना, उन अँखियों का तकना,
अब्र-ए-सियाह से वो केशु, लब जैसे थे गुलाब।
बयाँ उन्स का अपनी अब कैसे करे 'विप्लव,
ख़ुश-बाश में उनकी, दिल-फ़रेब बेकरार हुआ।।

Stage 3 — इश्क़
अदाएँ कर गईं उसकी असर कुछ इस क़दर
रुख़ लिया हसरतों ने फ़लक तक पंख फैलाए
अंजान था दिल की ख़्वाहिशों से जो बाद-ए-सबा में
दिल्लगी में महबूब की रहता अब अफ़साने सुनाए
पूछते फिरते हवाओं से उनका ठिकाना ऐ 'विप्लव'
इब्तिदा-ए-इश्क़ में गुम, कुछ यूँ तेरा इंतज़ार हुआ।।

Stage 4 — अक़ीदत / श्रद्धा
कुबूल हमें चाँद भी और उसके दाग़ भी, रज़ा
ख़ुदाई लुटाए बैठे हैं अपनी दिलबर की पनाह में
तशरीह उनसे राब्ता का फिर भी कैसे करें हम
रुसवा ना हो जाए मोहब्बत महफ़िल की निगाह में
रूबरू हो तो जाते गुज़रते उनकी गलियों से 'विप्लव'
मजबूरियों से उनकी हर दफ़ा पर जो ना बेज़ार हुआ।।

Stage 5 — इबादत / आराधना
इतराते रूहानी अँखियों का फ़ितूर चढ़ा कुछ ऐसा
ज़िक्र-ए-यार से ही तो अब इस रूह का क़रार है
शिकवा करूँ भी कैसे उस सितमगर की रंजिश का
रिवायतें इश्क़ की हमसे क्या कुछ कम नागवार है
बेगाना कहे वो मुझको अपना दीवाना भी 'विप्लव'
इबादत में वादा-ए-निबाह का कैसा ये इख़्तियार हुआ।।

Stage 6 — जुनून / दीवानगी
पैवस्त हुआ जबसे वो रग-ए-जाँ में यूँ लहू की तरह
चुभती तन्हाइयाँ, ये वीरानियाँ ही हासिल-ए-जूनून हैं
भाने लगी उसे अब ये वहशत बिस्तर की सिलवटें भी
रात की सियाही से लिखी बेचैन साँसें उसका सुकून है
इत्तिफ़ाक़ देखो उसके वहम कि दिवानगी का 'विप्लव'
कतरा-कतरा वो पिघला, फिर भी रक़िब गुलजार हुआ।।

Stage 7 — मौत / मृत्यु
कसूर उसका ताउम्र नज़्र-ए-इश्क़ में बस इतना सा रहा
साँस जाती रही जिसकी ख़ातिर वो कभी उसका ना रहा
क़सीदे मोहब्बत के ज़माना पढ़ेगा जब क़यामत के रोज़
खुलेंगे जहाँ आशिक़ी के पन्ने, आँख रोएँगी, रूह हँसेगी
लड़ता रहा परवाना ख़ुदा से आसमाँ के पार भी 'विप्लव'
ख़ाक था दरिया-ए-इश्क़ में, पर शमा का ना दीदार हुआ।।

vikashviplao420482

दिल टूटा है, मगर ज़िंदा हूँ अभी
Poet : विकाश विप्लव

तू मिली तो लगा था
जैसे बरसों की आवारा तलाश ख़त्म हुई,
तू गई तो समझ आया
कि कुछ कहानियाँ मुकम्मल होने के लिए नहीं, बस अधूरी छूटने के लिए ही लिखी जाती हैं।

मैंने तुझे चाहा था
किसी जीत की तरह नहीं,
एक घर की तरह...
जहाँ लौटकर उम्र भर का सुकून मिलता है।

तू कहती रही मजबूरियाँ हैं,
मैं कहता रहा रास्ते निकल आएँगे,
तू कल के अंधेरों से डरती रही,
और मैं आज की रौशनी में तेरा हाथ थामे अडिग खड़ा रहा।
अजीब बात है ना...
जिसे खोने के ख़ौफ़ में मैं हर रोज़ जीता था,
वही एक दिन बड़ी सादगी से मुझे खोने का फ़ैसला सुना गई।

अब कोई शिकवा, कोई शिकायत भी नहीं है तुझसे,
बस एक गहरा खालीपन है...
जो हर रात तेरे नाम की सिसकी से शुरू होता है,
और तेरी धुंधली याद पर आकर ख़त्म।

मैं आज भी ठीक उसी मोड़ पर खड़ा हूँ,
जहाँ तू मुझे तन्हा छोड़कर आगे बढ़ गई थी,
फ़र्क सिर्फ़ इतना है...
पहले तेरा बेताबी से इंतज़ार करता था,
अब चुपके से अपने ही दिल को समझाता हूँ।

अगर कभी गुज़रते हुए मेरी याद आ भी जाए,
तो ये ख़याल दिल में मत लाना कि मैं नफ़रत करता हूँ,
मैंने इबादत की तरह मोहब्बत की थी तुमसे...
और सच्ची मोहब्बतें, लाख बिखर जाएँ,
पर कभी नफ़रत करना नहीं सीखतीं।

तुम मेरी ज़िंदगी का सबसे हसीन हादसा, सबसे ख़ूबसूरत ग़लती थीं,
और मैं आज भी उस पावन ग़लती को,
अपने माथे की दुआ की तरह याद करता हूँ।

vikashviplao420482

ज़ीस्त के फ़नकार
नज़्म : विकाश विप्लव

चल पड़ा वो शख़्स अपने नन्हे के सरूर का लुत्फ़ उठाए,
ठिठुरती उस शाम में भी, उस खिलखिलाहट का जश्न मनाए।

सहेज रखे थे उसने जो रुपये अपने लिहाफ़ की ख़ातिर…
ख़र्च कर आया वो उन्हें, बिना शिकन का एहसास दिलाए।

खिलौनों को तकती मेरी उन आँखों को तब मालूमात ना था,
कांपते, सर्द रातें वो काटता रहा, मेरी ख़ुशीयों की क़ीमत चुकाए।

बिना ईंधन के दोपहिए पर वो, चलता रहा मुझे लिए सवार
झाँकते रहते पापोश से अँगूठे, तिस पर भी ना वो सकुचाए।

सहर की पहली किरण से जब निकल रहा वो रिज़्क़ की तलाश में,
तके शरीक-ए-हयात तार-तार पीरहन को, मंद-मंद अश्क बहाए।

खोल गिरह, हाथ रख दी रक़म, जो थी नागहानी की ख़ातिर…
पस-ए-शाम देख लाडले को, सारा माज़रा वो समझ मुस्काए।

दूद की बदहवासी में भी सुलगाती रही जो अपनी अंगीठी,
अपने हिस्से की भी दे रोटी वो इठलाती फिरती ही जाए।

शब के पिछले पहर जब, ख़ाब देख कभी घबराता था,
खींच आंचल में अपने वो माँ, धीमे से दे थपकी सुलाए।

भाँप बैठे ऐ 'विप्लव' को, ना कभी ये तक एहसास हुआ,
मुश्किलें सभी मेरे ज़ीस्त की वो ख़ामोशी से रहे सुलझाए।

vikashviplao420482

मोहन की दीवानी

मैं मोहन की दीवानी हूँ… पर मुझे राधा नहीं बनना।
ना मुझे विरह में जलना है, ना भक्ति में खुद को खोना।

राधा सा प्रेम पवित्र ज़रूर था… जहाँ मिलन से ज़्यादा इंतज़ार था।
मीरा सा प्रेम अमर ज़रूर था… पर मेरा प्रेम थोड़ा ज़िद्दी, थोड़ा स्वार्थी… थोड़ा सिर्फ उसका।

प्रेम बाँटना मुझे कभी आया ही नहीं… मैं उसे पूरा चाहती हूँ, आधा नहीं।
मैं नहीं चाहती वह मुझे कहानियों में सुनाए… बस रहना चाहती हूँ उसके मन के किसी कोने में, जहाँ सिर्फ मेरा अधिकार समाए।

और सच कहूँ तो… उसके दिल में किसी और का ख़याल भी मेरे मन को तोड़ देता है… मेरे प्रेम की हर उड़ान का रुख कहीं और मोड़ देता है।

मुझे तो रुक्मिणी बनना है— उसकी इकलौती ज़िद, उसके चुप का सुकून, उसके नाम का वह एहसास… जिसे वह कभी किसी और में न ढूँढ़ पाए।

उसकी आँखों का वह ठहराव, जो सिर्फ मुझे देखकर आए… उसके मन का वह कोना, जहाँ मेरा नाम चुपके से मुस्कुराए।

मैं उसकी आदत भी बनना चाहती हूँ, और उसकी प्रार्थना भी… ऐसी ख़्वाहिश, जहाँ उसका हर कल सिर्फ मेरे साथ नज़र आए।

इस जन्म अगर वह मोहन है… तो मुझे उसकी बाँसुरी की धुन नहीं बनना… मुझे उसकी धड़कनों की आदत बनना है।

उसकी साँसों में धीरे से घुल जाना है, जैसे शाम समंदर में उतर जाती है।
उसके हर सुकून की वजह बनना है, जैसे मंदिर में चुप सी प्रार्थना रह जाती है।

मैं एहसास बनकर नहीं… उसकी आत्मा की ज़रूरत बनकर रहना चाहती हूँ।
ऐसा कि जब भी वह आँखें बंद करे… तो मुझको ही देखे। और जब वह आँखें खोले… तो हर दुआ में बस मुझे ही पाए।

और अगर प्रेम सच में पूजा है… तो मैं उसके जीवन की आख़िरी प्रार्थना बनना चाहती हूँ।

vikashviplao420482

Radha Krishna

mamtagairathi31gmail.com526381

हिम्मत का असली मतलब यह बिल्कुन नहीं होता कि आपके भीतर कोई डर ही न हो....
"डर तो हर उस एक इन्सान के भीतर होता है जिसके पास एक धड़कता हुआ दिल है!"

Very good afternoon

erdharmendra

"अर्जुन का युग समाप्त हुआ, भक्तों का स्वर्णयुग शुरू हुआ"।

आज का मनुष्य स्वयं को शिक्षित, वैज्ञानिक और तार्किक कहता है। लेकिन विरोधाभास देखिए—प्राचीन काल के मनुष्यों को हम अज्ञानी कहते हैं, जबकि उन्हीं कथाओं में राम, कृष्ण, बुद्ध आदि को तत्काल और सर्वसम्मति से स्वीकार नहीं किया गया। उनके अपने समय में प्रश्न थे, विरोध था, आलोचना थी।

राम को उनकी प्रजा ने प्रश्नों से मुक्त नहीं रखा।

यदि राम केवल "भगवान" होते और समाज उन्हें प्रश्नातीत मानता, तो एक साधारण धोबी की बात भी राजसत्ता तक क्यों पहुँचती? कथा चाहे ऐतिहासिक हो या सांस्कृतिक आख्यान, उसका संकेत बड़ा महत्वपूर्ण है—आदर्श व्यक्ति भी समाज के प्रश्नों से ऊपर नहीं था।

कृष्ण के प्रसंग में भी यही बात है। गीता का पूरा संवाद एक बात बताता है—अर्जुन तुरंत विश्वास करने वाला भक्त नहीं है; वह प्रश्न करता है, तर्क करता है, भ्रम व्यक्त करता है और प्रमाण चाहता है। पहले प्रश्न है, फिर संवाद है, फिर अनुभव है—और उसके बाद निर्णय।

विडंबना आज देखिए।

आज कोई कहता है—

"मैं गुरु हूँ।"

भीड़ कहती है—गुरुदेव की जय!

कोई कहता है—

"मैं अवतार हूँ।"

भीड़ कहती है—साक्षात भगवान!

कोई कहता है—

"मेरे पास दिव्य शक्तियाँ हैं।"

लोग पूछते नहीं—कैसे?

वे पूछते हैं—दर्शन का समय क्या है?

यहीं शायद आज सबसे बड़ा प्रश्न धर्म भक्त गुरु का है: शायद किसी 1% समझ के लिए पर्याप्त है!

जिस युग को हम अंधविश्वास का युग कहते हैं, वहाँ पात्र को स्वयं को सिद्ध करना पड़ता था; और जिस युग को हम विज्ञान का युग कहते हैं, यहाँ दावा ही प्रमाण बन गया है।

लेकिन एक सावधानी भी जरूरी है। राम और कृष्ण को केवल "सामान्य अच्छे इंसान" कहकर पूरी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा को समाप्त कर देना भी उतना ही सरल निष्कर्ष होगा जितना किसी आधुनिक गुरु को बिना प्रश्न भगवान मान लेना। असली प्रश्न यह नहीं कि वे भगवान थे या नहीं; असली प्रश्न है:

क्या किसी व्यक्ति को भगवान घोषित करने से पहले प्रश्न करने का अधिकार बचा है?

शायद मूल सूत्र यह है:

सच्चे ज्ञान का पहला लक्षण श्रद्धा नहीं, प्रश्न है।

अंधविश्वास का पहला लक्षण अज्ञान नहीं, बिना परीक्षा स्वीकार कर लेना है।

और इसलिए यह पाठ"आज का स्वर्णयुग" वाला व्यंग्य बहुत सटीक बैठता है—

आज हम इतने बुद्धिमान हैं कि किसी को भगवान सिद्ध होने की आवश्यकता नहीं। उसे केवल घोषणा करनी है।

कल अर्जुन प्रमाण मांगता था।

आज भक्त प्रमाण देने वाले से नाराज़ हो जाता है।

Vedanta 2.0 शैली में इसे एक सूत्र बनाया जा सकता है:

पुराने मनुष्य ने असाधारण व्यक्ति को पहले मनुष्य की कसौटी पर परखा, फिर संभवतः दिव्यता देखी। आधुनिक मनुष्य पहले दिव्यता घोषित करता है, फिर मनुष्य होने की साधारण कसौटी भी भूल जाता है।

और सबसे तीखा प्रश्न शायद यही है:

यदि आज कृष्ण फिर से जन्म लें और कहें—"मुझसे प्रश्न करो", तो कितने लोग अर्जुन बनेंगे?

और यदि कोई साधारण आदमी कह दे—"मैं भगवान हूँ", तो कितने लोग बिना पूछे आरती लेकर खड़े हो जाएंगे?

क्या तुम तुम्हारे गुरु में 1% सत, बचा है क्योंकि तुम्हारे उसी युग के आधार पर खड़ा नहींतो राम कृष्ण को यहां नाम नहीं होता!

Independent Researcher & Philosopher

Vedanta 2.0 ©

ORCID: https://orcid.org/0009-0000-8083-0685

(इंटरनेशनल रजिस्टर्ड – विज्ञान और वेदांत का संश्लेषण)परिचय:

वेदांत 2.0 एक आधुनिक दर्शन है जो प्राचीन उपनिषदों को क्वांट ब्रह्मांड विज्ञान से जोड़ता है

bhutaji

विश्वास रखो, हर अंधेरी रात के बाद नई सुबह आती है

ajit3539

“मौका कभी खास नहीं होता,
हम अपने फैसलों से उसे खास बनाते हैं।” 🌿

ajit3539

“जिस दिन खुद पर जीत हासिल कर ली,
उस दिन दुनिया छोटी लगने लगेगी।”

ajit3539

हवाओं का रुख बदले तो बदल जाए,
हम अपना सफ़र नहीं बदलते।

#photooftheday

ajit3539

life give us message don't blame it

vanshsingh118873

" प्रेम आहे तुझ्यावर"..म्हणालो....
.......तर म्हणतेस..".काहीतरीच.. काय..??"
आणि मान उडवतेस...
पण डोळे तर तुझे ...काही वेगळंच दाखवत असतात..!
............नाही नाही म्हणतेस मानेने..
..पण..हे तुझे...लालचुटुक ओठ तर..
.......काही वेगळेच सांगु पहातायत..!!
.................जवळ येतेस काहीतरी सांगायला..
..तर गालावरचा गुलाबी रंग ...
चहेरा खुलवत असतो.....!!!
...किती नाही....नाही..म्ह्मणलंस,,तरी..
तुला कळतय का" वेडाबाई.."
अग जेव्हा मी गुंतलो ना तुझ्यात.....
तेव्हाच तुलाही घेतलय गुंतवुन माझ्यात..!!

jayvrishaligmailcom

मैं जीती हुं हमेशा कल्पनाओं की दुनिया में
जब भी मैं वहां से बाहर आता हूं
तो चीखना चाहती हूं
चिल्लाना चाहती हूं जोर-जोर चीख चिख कर रो ना चाहती हूं यह का करके आखिर जिंदगी इतना बुरी क्यों है

कल्पना में होती हुं तो शगुन होता है
हकीकत से दूर जीने की वजह होती है
और जब कल्पनाओं से बाहर आ जाती हूं तो
घुटन महसूस होती है


एक पल भी घंटे के बराबर लगते हैं
जैसे समय बीती नहीं रहा समय यहीं अटक सा गया
और अटकी हुई समय में
मैं बस सांसे ले रही हूं
घुट रही हूं अंदर ही अंदर मैं मर रही
और मैं चाहती हूं कि सब खत्म हो जाए


मैं कल्पनाओं को देखकर लिख सकती हूं कि
किसी से मिला तो जिंदगी इतनी बुरी नहीं लगती

और हकीकत यह है कि
जिंदगी में कोई ऐसा नहीं जिसे देखकर लगें की
जिंदगी इतनी बुरी भी नहीं



मैं क्या कर रही हुं मुझे भी नहीं पता
बस लगता है वक्त कट रही हूं
जिंदगी में कोई रुचि नहीं
मर भी जाऊं यह भी इच्छा नहीं
बस इस समय बेवजह की हेल्पलेस इंसान की तरह


कहानी अच्छी है
और हर वक्त कहानियों में भी रहकर थक गया
सच कहूं तो मैं हकीकत में जीना चाहती हूं
पर इस दुनिया में लगता है
मेरे लिए जीने के लिए कुछ भी नहीं है

मैं अभी बस रोना चाहती हूं
चेक चेक कर चिल्ला चिल्ला कर
और अपने बेबसी पर
अपनी बेकार गुजर रही लाइफ पर



सच कहूं तो मैं अपनी जिंदगी को अलविदा कहना चाहती
और चाहती हूं
अगर कोई दूसरी लाइफ हो तो इतनी बेकार ना

abhinisha

" ચા ના રિસામણાં "
-----------------------
ચા તો, રોજ પીવાતી.
પણ,કિંમત એની ના થાતી.
લીધા ચા એ,રિસામણા.
અનેક ઉપાયથી,.....
થવા લાગ્યા ચા નાં મનામણાં.
કાશ,!આજ ચા,માફક આવી જાય.
સંતોષ ચા પીધા નો છવાય જાય.
🖊️ જયા.જાની.તળાજા. "જીયા"

davejayaben809394

Very good afternoon all of you.

erdharmendra

समाज की दृष्टि और आप का अस्तित्व
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इस कम्पीटिशन और लोभ के दौर में जो भी लोग बहारी स्वरूप , बातचीत और अपने आप को प्रस्तुत करने के ढंग में दूसरे लोगों को प्रभावित नहीं कर पाते , वह काबिल होते हुए भी सामाजिक मानकों में "सामान्य" लोगो के साथ नहीं जुड़ पाते। आत्मविश्वास,कपड़े की चोइस, हावभाव ,आपकी चाल, आपकी आँखों की चमक और आपकी अपनी कमजोरियों ,खूबियों और महारथ का आंकलन किया जाता है, इसका कारण के आज हम लेन देन के बड़े बाज़ार का एक छोटा सा हिस्सा है। जहां आप की सेवाओं को बाद में, पहले आप का मूल्यांकन किया जाता है।
ऐसा नहीं है कि लोगों को सेवा और वस्तु की आवश्यकता नहीं है, परन्तु लोगों के पास विकल्प और विविधताएं बहुत है। आज लोग रेस्टोरेंट और बार्बर शॉप को भी बार बार बदल रहे है।
ऐसे वक्त में आप का अस्तित्व एक नई और रचनात्मक योग्यता ,ईमानदारी,विश्वसनीयता और मूल्य आधारित निष्ठा का स्रोत हो, एवं नई पद्धतियों को स्वीकार करने में आप का हृदय खुला हो , यह आज की आवश्यकता है। सेवा के नियमों और पैसों के मामले में व्यहवारिक स्पष्टता और सरलता आज के समय की सब से बड़ी एसेट है।

yashibc123gmail.com135615

उसने थोड़ी देर मुझसे बात की,
फिर ~~~
मैंने सारी रात ख़ुद से बात की...✍️
♥️

narayanmahajan.307843

बिना वजह जब कोई गुस्सा करे तब हमें क्या करना चाहिए? यदि वे लोग घरके या करीबी हों, तब तो बात सुलझने के बजाय और बिगड़ जाती है। गुस्सैल व्यक्तियों से कैसे निपटें? आइए जानें क्रोध की समस्या को हल करने के कुछ आसान तरीके पूज्य नीरू माँ से।

Watch here: https://youtu.be/4cnZq12So7Q

#angermanagement #angerissue #selfhelp #selfimprovement #dadabhagwanfoundation

dadabhagwan1150

🎇 " यादों का शहर " 🎇

वो ऐसे बिछड़े कि ख़्वाब में मिलते नहीं।
अब सूखे फूल भी किताब में मिलते नहीं।

ग़म-ए-यार कुछ इस तरह से छाया है कि,
ग़म भुलाने के रास्ते शराब में मिलते नहीं।

दिल में सदियों से छुपे कई सवाल हैं मगर,
उनके सवालात अब जवाब में मिलते नहीं।

दिलों में दर्द का दरिया उतर गया ऐसे कि,
खुशियों के निशान हिजाब में मिलते नहीं।

दिखावे की इस दुनिया में खो गए जो चेहरे,
वो सादगी वो अदब नक़ाब में मिलते नहीं।

बदल रहे हैं यहाँ यार, कपड़ों की तरह सब!
सच्ची वफ़ा के सलीके जनाब में मिलते नहीं।

चले हैं ढूंढने हम यादों के शहर में 'व्योम',
मगर बीते हुए दिन हिसाब में मिलते नहीं।

✍...© विनोद. मो. सोलंकी " व्योम "
जेटको (GEB) अंजार. मु. रापर.

omjay818

बागो में बहार है..


अळू ची भजी

अळू च्या वड्या आपण नेहेमीच करतोय
पण परवा अळू ची भजी ट्राय केली
आधी पाहुण्यांना ओळखले नाही कसली भजी आहेत ते ..
नंतर त्यानी खुप तारीफ केली ..
त्यांना इतकी आवडली की भजी नंतर आम्हाला खायला नाही शिल्लक राहीली 😜
कृती

प्रथम अळू च्या पानांचे बारीक तुकडे करून घेतले
आधीच करून ठेवलेल्या चिंचेच्या कोळ मध्ये ही पाने तास भर भिजत ठेवली
म्हणजे पानांची खाज कमी होते

नंतर त्यात जसे आपण अळू वडीला
साहित्य घालतो तसे घालून पीठ भिजवले
डाळीचे पीठ ,थोडी तांदूळ पिठी , गूळ , मीठ , हळद , तिखट , काळा मसाला , थोडी बडीशेप (चविष्ट लागते )कोथिंबीर , थोड खोबरे , इत्यादी सर्वच अंदाजे
नंतर यात कडक तेलाचे मोहन घातले
व छोटया आकारात खरपूस मंद आचेवर तळली
😊

jayvrishaligmailcom