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નવરાત્રી પાવનપર્વની માતૃભારતી પરિવારના દરેક સભ્યને ખૂબ ખૂબ શુભકામના🙏🏻

falgunidostgmailcom

किया था तूने हमेशा महफ़िलो में बदनाम हमें।
कभी तो हमारी कोई बात सच मानी होती।
चलो माना कि हम बुरे थे थोड़े तेरे हिसाब से
पर हमारे अच्छे ना होने की वजह तो जानी होती।
मंजीत सिंह गौहर ✍️

manjeetsinghgauhar6498

बेटी के जन्म पर मुँह बनाने वाले.......
अब नवरात्रि पर कन्या ढूंढते फिरेंग..!

kalpanasatav823113

एक अधूरा सवाल
आरोही अपने कमरे की साफ़-सफ़ाई में लगी हुई थी। उसकी शादी में अब बस पंद्रह दिन ही रह गए थे। वह अपनी पसंद की हर वह चीज़ समेटकर अपने साथ ले जाना चाहती थी, जिससे उसकी कोई ख़ास याद जुड़ी थी या जिससे उसे लगाव था। अपनी यादों को समेटने में उसे जो सुकून मिलता था, वह उसकी छोटी-छोटी आँखों में साफ़ झलकता था।
​आरोही को इस तरह काम में लगा देखकर उसकी माँ ने प्यार से उसके सिर पर हल्की-सी चपत लगाई और बोलीं, “पंद्रह दिन ब्याह में रह गए, लेकिन तेरा बचपन अभी तक नहीं गया! अब भी तू बस बचपन की यादें समेटने में लगी है!”
​आरोही ने माँ की तरफ़ देखा और दोनों बाँहें उनके गले में डालकर बोली, “कैसे भूल जाऊँ? ये मेरी साथी हैं!”
​माँ ने उसके हाथों की पकड़ से ख़ुद को छुड़ाया और बोलीं, “तू और तेरी बातें! मेरी समझ में तो कुछ नहीं आता।”
​फिर मेज़ पर चाय का कप रखते हुए बोलीं, “थोड़ा आराम भी कर लेना। ज़्यादा थक मत जाना, नहीं तो शादी से पहले बीमार पड़ जाएगी।”
​आरोही मुस्कुरा दी। माँ को हाँ में जवाब देकर फिर अपने काम में लग गई।
​अक्टूबर की रातों की ठंडक दिनभर की झुलसा देने वाली धूप के बाद सुकून देती है। वह रात भी अपने साथ ठंडी हवा और सुकून लेकर आई थी।
​सामान समेटते हुए आरोही को अपनी एक बहुत पुरानी डायरी मिली। वह डायरी लेकर छत पर चली गई और ठंडी हवा के बीच बैठ गई। दूर से आती नवरात्रि के भजनों की आवाज़ उसे बचपन की याद दिलाने लगी। कैसे वह सबके साथ मेला देखने जाया करती थी! उन दिनों को याद करके उसके होंठों पर मुस्कान आ गई।
​धीरे-धीरे वह डायरी के पन्ने पलटने लगी। अपनी ही लिखी बातें पढ़कर कभी मुस्कुराती, तो कभी हँस देती। लेकिन एक पन्ने पर आकर उसकी उँगलियाँ ठहर गईं। उस पन्ने को देखते ही उसके चेहरे की मुस्कान ग़ायब हो गई। अचानक उसके भीतर एक अजीब-सा सन्नाटा उतर आया।
​उस पन्ने पर एक नाम लिखा था—रवि।
​रवि का नाम देखते ही आरोही अतीत की उन गलियों में लौट गई, जहाँ उसकी बचपन की यादें अब भी साँस ले रही थीं।
​आरोही जब पहली बार स्कूल गई थी, तब वह एलकेजी में थी। उस कक्षा की बहुत-सी बातें उसे अब याद नहीं थीं, लेकिन रवि याद था। वह उसी की कक्षा में पढ़ता था।
​स्कूल के पहले दिन से ही दोनों एक ही कक्षा में रहे। यह साथ एलकेजी से यूकेजी, फिर पहली और आगे की कक्षाओं तक यूँ ही चलता रहा।
​आरोही को याद आया कि जब वह पाँचवीं कक्षा में थी, तब एक पेंसिल को लेकर उसकी और रवि की लड़ाई हो गई थी। वह रोते हुए मैम के पास गई और रवि की शिकायत कर आई। मैम ने रवि को डाँट भी लगाई, लेकिन रवि भी कहाँ चुप बैठने वाला था! उसने वह पेंसिल आरोही को कभी वापस दी ही नहीं।
​आठवीं कक्षा में भी दोनों की कहानी कुछ अलग नहीं थी। न चाहते हुए भी उन्हें एक ही समूह में रख दिया गया था। सर से बहुत कहने के बावजूद दोनों को साथ ही काम करना पड़ा।
​उन दिनों स्कूल में लड़के-लड़कियों के बीच ज़्यादा बातचीत नहीं होती थी। और आरोही तो एक छोटे-से कस्बे से थी, जहाँ लड़के-लड़कियों का आपस में बात करना भी अच्छा नहीं माना जाता था।
​जब आरोही नौवीं कक्षा में लड़कियों के स्कूल में आ गई, तो उसे लगा कि अब रवि से उसका पीछा छूट गया। लेकिन दोनों के विषय एक जैसे होने के कारण उनकी मुलाक़ात फिर एक ही कोचिंग सेंटर में होने लगी।
​एक दिन कोचिंग में दोनों ने एक-दूसरे को देखा, तो रवि हल्का-सा मुस्कुराया और तंज़ भरे लहज़े में बोला, “तुम यहाँ भी मिल गई!”
​आरोही भी अपनी साइकिल स्टैंड पर लगाते हुए बोली, “हाँ, और क्या! मेरी किस्मत ही ख़राब है!”
​रवि और आरोही की वैसे तो कोई ख़ास बातचीत नहीं होती थी, लेकिन रवि उसे चिढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ता था। शायद उसे आरोही की फ़िक्र भी थी, मगर उस समय दोनों में से कोई इस बात को समझ नहीं पाया था।
​जब आरोही बारहवीं कक्षा में थी, तब एक दिन कोचिंग से लौटते समय रास्ते में उसकी साइकिल गिर गई। उसे चोट लगी और वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। उस समय रवि ही उसे अस्पताल लेकर गया। फिर उसने अपने साथ की कुछ लड़कियों के साथ उसे घर भी भिजवाया।
​धीरे-धीरे वक़्त बीतता गया और स्कूल की ज़िंदगी ख़त्म हो गई।
​अब आरोही को अच्छी पढ़ाई के लिए अपने शहर से बाहर जाना था। उसने दूर एक अच्छे कॉलेज में दाख़िला ले लिया।
​पहला सेमेस्टर, नए दोस्त, नई जगह और नई ज़िंदगी—इन सबमें आरोही इतनी व्यस्त हो गई कि रवि को लगभग भूल ही गई। कभी कोई दोस्त उसके स्कूल के समूह की तस्वीर देखकर पुराने दोस्तों के बारे में पूछती, तो रवि का ज़िक्र आने पर वह बस इतना कहती, “हम एक साथ पढ़ते थे।”
​रवि ने भी उससे संपर्क करने की कोई कोशिश नहीं की।
​एक दिन कॉलेज के काम से आरोही को अपने ही इलाके के एक कॉलेज में जाना पड़ा। वह अपने दोस्तों के साथ वहाँ पहुँची।
​कैंटीन में बैठकर आरोही और उसके दोस्त समूह में पढ़ाई करने की बात कर ही रहे थे कि पीछे से रवि की आवाज़ आई।
​“तुम यहाँ भी मिल गई! तुम्हें इसी शहर और मेरे कॉलेज में भी आना था?”
​आरोही ने पलटकर देखा और चिढ़ते हुए बोली, “लगता है, जब तक पढ़ाई करूँगी, तुमसे पीछा नहीं छूटेगा!”
​रवि उसकी बात पर मुस्कुराया और हँसते हुए बोला, “जब आ ही गई हो, तो अपना संपर्क नंबर दे दो। मैं तो कम ही घर जाता हूँ। लड़कियाँ तो अक्सर घर जाती रहती हैं। कुछ मँगवाना हुआ, तो कम-से-कम तुम ले आओगी।”
​आरोही ने उसे घूरते हुए कहा, “मैं क्या कोई कूरियर सर्विस हूँ?”
​इतना कहकर वह गुस्से में वहाँ से चली गई।
​आरोही के हॉस्टल पहुँचते ही उसकी रूममेट उसे चिढ़ाते हुए बोली, “मेरे पास भी ऐसा कोई बचपन का दोस्त होता, तो अब तक मैं उसे प्रपोज़ कर चुकी होती!”
​आरोही ने अपनी छोटी-छोटी आँखों से उसे घूरा और गुस्सा दिखाते हुए बोली, “वह मेरा दोस्त नहीं है!”
​रूममेट हँस पड़ी। “अच्छा, मैडम! हम समझ गए। अब गुस्सा मत करो। चलो, कुछ खाने चलते हैं।”
​आरोही भी मुस्कुरा दी।
​एक दिन आरोही ने फ़ेसबुक पर एक पोस्ट डाली। उस पर सबसे पहला कमेंट रवि का था। थोड़ी ही देर में उसकी फ़्रेंड रिक्वेस्ट भी आ गई।
​उन दिनों छोटे शहरों में फ़ेसबुक का चलन नया-नया था। हर कोई ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों को दोस्त बनाने में लगा रहता था। आरोही ने भी रवि की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली।
​रवि का पहला मैसेज था—
​“Hi, अभी तक जाग रही हो?”
​आरोही ने जवाब दिया—
​“हाँ, तुम क्या सो गए? तुम भी तो जाग रहे हो!”
​आरोही अपनी आदत से मजबूर थी। रवि से बिना ताना मारे उसकी कभी बात ही नहीं हुई थी।
​धीरे-धीरे ये छोटे-छोटे मैसेज दिनों और हफ़्तों में बदलने लगे। अब रवि उसे मैसेज करता और आरोही भी जवाब दे दिया करती। मानो दोनों के बीच बातचीत का एक तय समय बन गया हो।
​एक दिन रवि ने आरोही को मैसेज किया कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है और वह कुछ दिनों के लिए घर जा रहा है। उसने यह भी कहा कि घर से कुछ मँगवाना हो, तो बता देना। साथ ही उसने अपना संपर्क नंबर भी भेज दिया।
​आरोही ने उसे कई मैसेज किए, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। अब उसे रवि की फ़िक्र होने लगी थी। आख़िरकार, थोड़ी झिझक के साथ उसने उसे फ़ोन कर ही लिया।
​फ़ोन उठते ही दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, “Hello?”
​आरोही ने जब अपना नाम बताया, तो रवि हँस पड़ा। उसे यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि आरोही कभी ख़ुद उसे फ़ोन भी करेगी!
​उसकी हँसी सुनकर आरोही चिढ़ गई।
​“ज़्यादा हँसे, तो फिर कभी फ़ोन नहीं करूँगी। और न ही तुम्हारा फ़ोन उठाऊँगी!”
​रवि अपनी हँसी रोकने की कोशिश करते हुए बोला, “Sorry, sorry! अच्छा, आज फ़ोन कैसे किया?”
​आरोही ने उसकी तबीयत का हाल पूछा और फिर फ़ोन रख दिया।
​अब आरोही और रवि की बातचीत फ़ेसबुक से निकलकर कीपैड वाले फ़ोन के मैसेज तक पहुँच गई थी। अब बात करने का कोई तय समय नहीं था। सुबह से रात तक दोनों के फ़ोन मैसेज की आवाज़ से बजते रहते और दोनों कोशिश करते कि एक-दूसरे के मैसेज का जवाब उसी समय दे दें।
​धीरे-धीरे उनकी बातें छोटी-छोटी बातचीत तक सीमित नहीं रहीं। फ़ोन पर बात होती, तो घंटों चलती—भले ही कोई ख़ास विषय न हो। कभी स्कूल के दिनों को याद करते, तो कभी कोचिंग के किस्से दोहराते और फिर दोनों हँस पड़ते।
​अब आरोही बेझिझक रवि को किसी भी नाम से बुला सकती थी और रवि भी उसे अपने मन से कोई नाम दे देता। कॉलेज में क्या हुआ, कक्षा में क्या हुआ, परीक्षा कैसी गई, टेस्ट कैसा रहा या हॉस्टल में क्या नया हुआ—जब तक आरोही उसे दिनभर की सारी बातें नहीं सुना देती, उसे चैन नहीं मिलता था।
​रवि भी उसकी बातें उतने ही ध्यान से सुनता था।
​बचपन वाली नोक-झोंक अब भी थी, लेकिन आरोही पहले की तरह हर बात पर चिढ़ती नहीं थी। शायद अब उसे रवि की आदत हो गई थी।
​एक दिन आरोही को रवि से बात करते देखकर उसकी रूममेट ने पूछ ही लिया, “अच्छा, तुम दोनों में से पहले किसने प्रपोज़ किया था?”
​यह सवाल रवि ने भी फ़ोन पर सुन लिया। आरोही तो जैसे अचानक ख़ामोश ही हो गई।
​रवि उसे असहज नहीं करना चाहता था। इसलिए कहीं जाने का बहाना बनाकर उसने फ़ोन काट दिया।
​रूममेट ने फिर पूछा, “तुम कब से उसे पसंद करने लगी?”
​आरोही कुछ देर उसके सवाल पर चुप रही। फिर हँसते हुए बोली, “हम बस दोस्त हैं। इससे ज़्यादा कुछ नहीं।”
​रूममेट हँस दी। “मुझसे झूठ बोल रही हो या ख़ुद से?”
​आरोही मुस्कुराकर बोली, “नहीं, हम बस दोस्त हैं।”
​रवि सच में उसके लिए एक दोस्त ही था।
​रूममेट ने फिर सवाल किया, “अच्छा, एक बात बताओ। कौन-सी लड़की अपने किसी लड़के दोस्त से इतनी बातें करती है?”
​आरोही थोड़ी चिढ़ गई।
​“मैं उसे पसंद करती हूँ, ठीक है! लेकिन सिर्फ़ एक दोस्त की तरह!”
​यह बात उसने अपनी रूममेट से तो कह दी, मगर उस रात उसे इसी सवाल ने सोने नहीं दिया। रवि ने भी यह सब सुन लिया था। न जाने वह क्या सोच रहा होगा!
​आरोही ने कभी ख़ुद से यह सवाल ही नहीं किया था कि रवि क्या चाहता है या उनके रिश्ते को किस नज़र से देखता है। उसने तो रवि के साथ अपने रिश्ते को दोस्ती से आगे कभी सोचा ही नहीं था।
​इन्हीं ख़यालों में उलझते-उलझते उसकी आँख लग गई।
​अगली सुबह उसने रवि को कोई मैसेज नहीं किया। रवि की तरफ़ से मैसेज आया भी, तो वह ख़ुद को व्यस्त बताकर बात करने से बचती रही।
​ऐसे ही दो-तीन दिन गुज़र गए।
​आख़िरकार, फ़ेसबुक पर उसे ऑनलाइन देखकर रवि ने मैसेज किया—
​“अब और कितने दिन ऐसे ही बिज़ी रहना है?”
​आरोही बस उस मैसेज को देखती रही। उससे कोई जवाब नहीं दिया गया।
​रवि ने फिर लिखा—
​“हमें बातें साफ़ कर लेनी चाहिए। ऐसे बचने से क्या होगा?”
​आरोही सफ़ाई देना चाहती थी कि ऐसी कोई बात नहीं है, वह बस व्यस्त है। लेकिन वह कुछ कह नहीं पाई। आख़िर में बस इतना ही लिख सकी—
​“हाँ।”
​रवि ने फिर मैसेज किया—
​“कोई सवाल हो, तो पूछ सकती हो।”
​आरोही ने मैसेज टाइप किया—
​“क्या तुमने कभी हमारी दोस्ती को उस नज़र से देखा है?”
​लेकिन वह उसे भेज नहीं पाई। कुछ पल स्क्रीन पर देखने के बाद उसने मैसेज मिटा दिया।
​रवि का फिर मैसेज आया—
​“क्या बात है? बताओ।”
​इस बार आरोही ने लिख ही दिया—
​“तुम्हारे लिए दोस्ती क्या है?”
​रवि का जवाब आया—
​“जो हमेशा साथ रहे।”
​आरोही ने कुछ देर बाद पूछा—
​“और मैं?”
​इस सवाल के जवाब में रवि ने मैसेज करने के बजाय उसे फ़ोन कर दिया।
​आरोही ने फ़ोन उठाया। दूसरी तरफ़ से रवि की वही पुरानी, हँसती हुई आवाज़ आई—
​“ढक्कन, क्या चल रहा है दिमाग़ में?”
​ढक्कन—रवि प्यार और अपनेपन से आरोही को इसी नाम से बुलाता था। और आरोही भी उसे ढक्कन ही कहती थी।
​आरोही झिझकी। फिर धीरे से बोली, “मैं आगे चलकर कोई परेशानी नहीं चाहती। बस इतना चाहती हूँ कि हम हमेशा ऐसे ही रहें।”
​रवि ने पूछा, “आगे चलकर क्या हो सकता है?”
​आरोही ने जवाब दिया, “अगर हम आगे चलकर बदल गए, तो हमारा अलग होना तय हो जाएगा। लेकिन अगर हम दोस्त रहे, तो हमेशा साथ रहेंगे।”
​रवि उसकी बात ध्यान से सुन रहा था। फिर हँसते हुए बोला, “वह कैसे?”
​आरोही कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “दोस्ती से कुछ ज़्यादा हुआ, तो ग़लतफ़हमियाँ होंगी, झगड़े होंगे और छोटी-छोटी बातों पर शक होने लगेगा। फिर न दोस्ती बचेगी और न वह रिश्ता। मैं तुम्हें बस अपना दोस्त मानती हूँ। ऐसा दोस्त, जो ज़िंदगी के हर पड़ाव पर मेरे साथ रहे—जैसे बचपन से रहा है।”
​रवि हँस पड़ा और उसे चिढ़ाते हुए बोला, “लड़की बड़ी हो गई है और समझदार भी!”
​आरोही भी कहाँ पीछे रहने वाली थी!
​“हाँ, और क्या! बच्ची थोड़ी ही हूँ!”
​रवि ने बहुत सहजता से जवाब दिया, “हम हमेशा ऐसे ही दोस्त रहेंगे। अब बिज़ी मत होना!”
​फ़ोन कटने के बाद आरोही ने सुकून की साँस ली।
​वक़्त के साथ उनका रिश्ता वैसा ही बना रहा। उनकी बातें भी पहले की तरह चलती रहीं—बिना किसी तय वक़्त के, बिना किसी ख़ास वजह के।
​लेकिन जब भी कोई तीसरा उन्हें साथ देखता या उनकी बातचीत के बारे में जानता, तो उन्हें सिर्फ़ दोस्त नहीं, दोस्ती से कुछ ज़्यादा ही समझता।
​एक दिन आरोही ने रवि को फ़ेसबुक पर ऑनलाइन देखा, तो उसे कॉलेज में चल रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम की एक तस्वीर भेज दी। तस्वीर में उसने साड़ी पहनी हुई थी।
​उसने मैसेज किया—
​“ढक्कन, मैं कैसी लग रही हूँ?”
​लेकिन उस वक़्त ऑनलाइन रवि नहीं, उसकी दीदी थीं।
​आरोही बचपन से रवि की दीदी को जानती थी। रवि की आईडी से वह उनसे भी जुड़ी हुई थी और वे भी आरोही को जानती थीं। लेकिन वक़्त के साथ लोगों की सोच बदल जाती है, और कभी-कभी रिश्तों को देखने का नज़रिया भी।
​रवि की दीदी ने लगभग डाँटते हुए जवाब दिया—
​“मेरे भाई का नाम रवि है, ढक्कन ”नहीं!”
​आरोही को उनकी बात बुरी लगी, लेकिन उसने कुछ कहने के बजाय बस माफ़ी माँगी और ऑफ़लाइन हो गई।
​जब रवि को पता चला कि उसकी दीदी ने आरोही से क्या कहा था, तो उसने उसे समझाने के लिए फ़ोन किया।
​आरोही ने भी कोई शिकायत नहीं की। बस इतना कहा, “बताया तो होता कि दीदी भी तुम्हारी आईडी ऑनलाइन कर लेती हैं।”
​लेकिन यह बात उसके मन में अटक गई थी कि आख़िर रवि की दीदी ने ऐसा क्यों कहा।
​कुछ दिनों बाद आरोही को महसूस होने लगा कि रवि के साथ उसके मैसेज पर अब उसकी दीदी की नज़र रहने लगी है। उसने रवि को मैसेज करना कम कर दिया। जब बात करनी होती, तो कोशिश करती कि फ़ोन पर ही बात हो जाए।
​एक दिन आरोही ने रवि को मैसेज किया—
​“क्या कर रहे हो? क्या हम कॉलेज के बाहर मिल सकते हैं?”
​लेकिन यह मैसेज रवि की जगह उसकी दीदी तक पहुँच गया।
​रवि की दीदी ने आरोही को फ़ोन किया और उसे डाँटते हुए कहा कि वह उनके भाई की ज़िंदगी में ज़रूरत से ज़्यादा दख़ल दे रही है। उनके मुताबिक़, आरोही के पास कोई और काम नहीं था, इसलिए वह दिनभर उनके भाई को मैसेज करती रहती थी।
​आरोही कुछ कह पाती, उससे पहले ही रवि की दीदी ने फ़ोन काट दिया।
​आरोही अभी यह समझने की कोशिश ही कर रही थी कि उसके साथ अचानक यह सब क्यों हो रहा है, तभी उसका सब्र टूट गया।
​रोते हुए, काँपते हाथों से उसने रवि को मैसेज किया—
​“रवि, अब मुझे कभी फ़ोन या मैसेज मत करना।”
​रवि का जवाब आया—
​“OK।”
​बस, इतना ही।
​वह एक छोटा-सा जवाब था, लेकिन आरोही के लिए उसके भीतर बहुत कुछ टूट जाने जैसा था।
​उसे उस पल समझ ही नहीं आया कि आख़िर हुआ क्या था। उसने तो बस गुस्से और तकलीफ़ में रवि को वह मैसेज भेज दिया था। कहीं न कहीं उसे उम्मीद थी कि रवि उसे समझने की कोशिश करेगा, फ़ोन करेगा, पूछेगा कि आख़िर हुआ क्या है।
​लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
​आरोही इंतज़ार करती रही।
​दिन बीत गए। फिर हफ़्ते गुज़र गए। न कोई मैसेज आया, न कोई फ़ोन।
​जब भी कोई उससे रवि के बारे में पूछता, वह ख़ामोश हो जाती। कभी-कभी तो वह अपने ख़यालों में इस क़दर खो जाती कि उसे ख़ुद भी समझ नहीं आता कि उसकी ज़िंदगी में क्या चल रहा है।
​लोगों के सवालों से बचने के लिए उसने उन सभी लोगों से दूरी बना ली, जो कभी उससे और रवि से जुड़े थे।
​स्कूल के दोस्त, कॉलेज के दोस्त—धीरे-धीरे उसने सबसे संपर्क तोड़ लिया।
​वह इतनी ख़ामोश हो गई, जैसे अपने ही भीतर कहीं सिमटकर रह गई हो।
​और उस ख़ामोशी के भीतर एक सवाल अब भी ज़िंदा था—आख़िर उस दिन हुआ क्या था?
​तभी आरोही का फ़ोन बज उठा।
​रिंगटोन ने उसे ख़यालों से बाहर खींच लिया। फ़ोन पर संजीव का नाम चमक रहा था।
​उसने कॉल उठाई, तो संजीव ने पूछा, “घर आने की सारी तैयारियाँ हो गईं या कुछ रह गया है? ज़्यादा थक मत जाना।”
​आरोही हँसते हुए बोली, “हाँ, सब कर लिया। बस आप तैयार रहना।”
​इतना कहकर उसने फ़ोन रख दिया।
​कुछ देर तक वह फ़ोन की स्क्रीन पर संजीव का नाम देखती रही।
​संजीव—वह इंसान, जिससे आरोही की शादी होने वाली थी।
​फिर उसकी नज़र दोबारा डायरी के उस पन्ने पर पड़ी, जहाँ रवि का नाम लिखा था। उसके नीचे अब भी ख़ाली जगह थी।
​आरोही ने पेन उठाया और लिखना शुरू किया—
​“रवि,
​बारह साल बीत गए उस पल को, लेकिन वह आज भी मेरी ज़िंदगी में वैसा ही ठहरा हुआ है। अगर हम एक बार ठीक से अलविदा कहकर अलग हुए होते, तो शायद मुझे कभी इतनी तकलीफ़ नहीं होती।
​मैंने बहुत कोशिश की थी कि तुम्हें अपने साथ एक दोस्त के रूप में बनाए रख सकूँ। तुम साथ होते, तो तुम्हें बताती कि इन बारह सालों में मेरे साथ क्या-क्या हुआ।
​आज भी जानना चाहती हूँ कि उस पल तुम्हारे साथ आख़िर हुआ क्या था…”
​यह लिखते-लिखते आरोही का हाथ रुक गया।
​उसकी आँखों से गिरे आँसू डायरी के उसी पन्ने पर जा ठहरे।
​कुछ पल तक वह उन शब्दों को देखती रही, जिन्हें लिखने के लिए उसे बारह साल लग गए थे।
​फिर उसने एक गहरी साँस ली, हल्का-सा मुस्कुराई और डायरी बंद कर दी।
​☆अनामकारा

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આ વાળ તમારા હખણા રાખો ને વારંવાર સંભાળવા પડે છે.
અને આ નજરને તમારી આંખમાં કેદ કરી વશ કરો ને,વશ કરો ને.
કેટલું સાચવું દિલ?તમારા દિલમાં વારંવાર ઢળી જતું જોઉં છું,
તમારા મુખડે ને દિલડે આડું ઓઢણું રાખો ને,ઓઢણું રાખો ને.
- વાત્સલ્ય

savdanjimakwana3600

"परिवार ही सबसे बड़ी दौलत है, बाकी सब तो आनी-जानी चीज़ें हैं, अपनों को समय दो।"

-Dharmendra Kumar

erdharmendra

નવરાત્રી 
આવી નવરાત્રીને હૈયા સૌના હરખાય રે
ઘટસ્થાપન ને અખંડ જ્યોત જલાવી 
                 થાય પૂજા અંબે માતની રે.....

નવલા આ નોરતા રમે ભક્તો સૌ ભક્તિમય થાય રે
ભક્તિભાવ પૂર્વક કરે ભક્તો માં તારી આરાધના રે.


કામ,ક્રોધ,લોભ,મોહને અહંકાર જેવા
                     અસુરોનો કરીએ નાશ રે
થાય આસુરીવૃતિ પર દૈવી શક્તિનો વિજય રે....

નવ સ્વરૂપ માં અંબાના શૈલપુત્રી,
     બ્રહ્મચારિણી ને ચંદ્રઘંટા માં કૂષ્ટમાંડા રે
સ્કંદમાતા, કાત્યાયની ને કાલરાત્રી 
         મમહાગૌરી ને માં સિદ્ધિદાત્રી રે.....

દેજો આશિષ માં ભક્તોને તારા
          તારા આશિષથી સૌ પાવન થાય રે
પૂરા કરજો કોડ મનના 
          રહેજો ભક્તોની સંગાથ રે........
આજથી શરૂ થતી નવરાત્રિની શુભકામના
જય અંબેમાં: પુષ્પા એસ ઠાકોર

thakorpushpabensorabji9973

happy navratri guys

vanshsingh118873

जिनके सपने टुकड़ो में टूटते है वै लोग उन टुकड़ो को जोड़ अपनी जिंदगी बनाते हैं।

chitrakshianant734586

​रात के सन्नाटे में जब अकेलापन शोर करता है,
दर्द का घूंट पीकर जब इंसान कुछ याद करता है,
आंखों की कोर से ढुलकते उस ख़ामोश आंसू से पूछो,
कि टूटा हुआ दिल भी जीने का हौसला कैसे रखता है।
​मां की सीने से लिपटकर रोने की वो चाहत,
पिता के थक चुके हाथों की वो अधूरी राहत,
समय की धूप ने सुखा दिए चेहरे के सारे रंग,
पर मन के किसी कोने में बची रही वो मासूम आदत।
​रास्ते अजनबी थे, मंजिलों का कोई ठिकाना न था,
दूसरों की महफ़िल में अपना कोई आशियाना न था।
ज़िंदगी ने जितने भी दिए ज़ख्म, हंसकर सह लिए,
क्योंकि टूटकर बिखर जाना कभी कोई बहाना न था।
​जो छूट गए पीछे, वो साए याद आते हैं,
बीते हुए हसीं लम्हे आंखों को भिगो जाते हैं।
पर सुनो, ये अंधेरा हमेशा के लिए टिक नहीं सकता,
दुखों की काली रात के बाद ही उम्मीद के सूरज मुस्कुराते हैं।

ritukumari509471

दिन की नुमाइश ढल गई, अब उदासी का पहरा है,
ये जो रात का सन्नाटा है, इसमें दर्द ज़रा गहरा है।
​जो मुस्कुराहटें दिन भर चेहरे पर टांग रखी थीं,
रात ने आते ही वो सब चुपचाप उतार दीं।
​तकिए के कोने में सिमट कर रो लेता है दिल,
गैरों की भीड़ में खुद को खो देता है दिल।
​चिराग बुझते ही यादों का कारवां आता है,
जो कह न सके किसी से, वही बात सताता है।
​ऐ रात, तू ही बता कैसे ये सिलसिले खत्म होंगे,
क्या सुबह का सूरज आने पर ये ज़ख्म मद्धम होंगे?

ritukumari509471

muje bola gaya tha Bina hathiyar ke . ye vali dhok tak aaja
You do not change your decision

virdeepsinh

🎉વાંચો સુંદર પારિવારિક વાર્તા મારા ફેસબુક પેજ પર 🎊

https://www.facebook.com/share/p/1PpL5siajW/

ronakjoshi2191

"आज शाम जो किताब का एक पन्ना पढ़ लोगे, कल वही तुम्हें भीड़ में आगे खड़ा करेगा।"

Good evening to all of you.
-Dharmendra Kumar

erdharmendra

A man who exists only in my words... for now.✨
who misses this type of gentleman 🫶🏻🤗❤️

itzmeakki

श्राद्ध पक्ष का मानना या न मानना. . . एक प्रश्न !!
(श्राद्ध पक्ष समाप्ति विशेष)

हिन्दू संस्कृति के अनुसार ये एक शाश्वत नियम है कि मृत्यु केवल शरीर को प्राप्त होती है, आत्मा अजर-अमर है और वह समय अनुसार दूसरे शरीर (अर्थात एक नए जन्म) को धारण करती है तो यहाँ एक स्वाभाविक सा प्रश्न उठता है; जब हमारे 'पितरों' ने पुनर्जन्म ले लिया है, तो हम श्राद्ध किसके लिए करते हैं ?

प्रश्न स्वाभाविक है और विचारणीय भी।

यहाँ यदि सनातन धर्म के मूल में इन बातों पर विचार करें, तो हो सकता है कुछ बातें तर्कहीन भी लगें और कई कर्म मान्यताएं केवल झूठ या पाखंड भी लगें। लेकिन वास्तव में सनातन धर्म में इस प्रश्न को केवल शरीर या आत्मा के संदर्भ में नहीं, बल्कि श्रद्धा, कर्तव्य, कर्म और पीढ़ियों के आपसी संबंध से जोड़ा गया है। यदि भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण के शब्दों को देखें, तो एक शरीर द्वारा पुराने वस्त्रों को त्यागकर नया शरीर धारण करने के मूल में यही भाव सामने आता है कि शरीर भले ही नश्वर है, लेकिन आत्मा अजर-अमर है और उसकी यात्रा निरंतर आगे की ओर चलती रहती है।

अतः यदि थोड़ा गहरे में सोचें, तो सही में श्राद्ध का अर्थ यह नहीं है कि हम अपने पूर्वजों को उसी पुराने शरीर में उपस्थित मानकर उन्हें जल या भोजन पहुँचा रहे हैं। श्राद्ध का मूल भाव है—उनका स्मरण करना, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और उनके कल्याण की कामना करना।

यदि हम मान लेते हैं कि हमारे पूर्वज पुनर्जन्म ले चुके हैं, तो अवश्य ही वे कहीं किसी नए परिवार में एक नया जीवन जी रहे होंगे; लेकिन जरा विचार कीजिए, जिन पूर्वजोँ ने हमारे परिवार में कभी पिता, माता-पिता, दादा-दादी के रूप में हमारा पालन-पोषण किया था, क्या उनका महत्व और भावनात्मक स्थान इस लिए समाप्त हो जाता है कि वह हमारे जीवन से जा चुके हैं। हम जिस वंश, परिवार, संस्कार और जीवन-परंपरा से जुड़े हैं, उसका इतिहास हमारे पूर्वजों से ही बनता है। उनका स्मरण किसी एक शरीर तक तो सीमित हो ही नहीं सकता। क्या हम उनके नाम (या अपने वंश) पर वर्ष में एक दिन स्मरण, सम्मान और धार्मिक अर्पण की परंपरा नहीं निभा सकते जो अप्रत्यक्ष में सहज ही श्रद्धा और प्रकृति से भी जुड़ी हुई है।

वस्तुतः श्राद्ध अपने पितरों तक जल या भोजन अर्पित करने का आयोजन मात्र नहीं है, बल्कि यह उनके संबंधों के प्रति हमारी श्रद्धा का परिचायक है। श्राद्ध उनके प्रति एक कृतज्ञता है, एक परंपरा है, जिसे हम निभाते हैं, निभाना ही चाहिए।

और यही श्राद्ध के नाम में भी निहित है. . .

श्रद्धया क्रियते इति श्राद्धम्।
अर्थात श्रद्धा से किया जाने वाला कर्म।

सादर।।
. . . वीर।। 💝

veermehta

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हम इस पीढ़ी की लड़कियां
अपने मां जैसे नहीं बनना चाहती।
देखा है मां को घुट घुट के जीते हुए
अपने अरमानों को दिल में गाड़कर
किसी कोने में रोते हुए..
दिल में दर्द दबाकर लबों पे मुस्कान
सजाकर संस्कार तले दबे हुए..
हम आज की पीढ़ी की लड़कियां हैं
साहब.......
अपने दम पर उड़ान भरना जानती है
स्वतंत्रता मतलब व्यभिचार नहीं हम
अपनी हदे पहचानती है,
अगर पढ़ी जरूरत तो मर्द जात का ईगो
घसीटकर जमीन में गाड़ देती हैं।
हम आज की पीढ़ी की लड़कियां हैं ....

kalpanasatav823113

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