ढल रहा है आफ़ताब और ढल रही है शाम,
लहरों के इस किनारे पर ठहरा हुआ है एक पैग़ाम।
रेत पर सिमट आई हैं दिन भर की थकावटें,
हवाओं में तैरती हैं किसी अपने की आहटें।
एक हाथ जो मुद्दतों से थामे है मेरा हाथ,
सफ़र में तनहाइयों को जिसने दिया है मात।
न किसी नाम की ज़रूरत, न किसी रिश्ते की फ़िक्र,
बस एक खामोश सा ताल्लुक़ और गहरा सा ज़िक्र।
जब भी अंधेरों ने घेरा, एक लौ सी जल उठी,
मेरी हर अनकही उलझन उस एक चेहरे ने पढ़ी।
दुनिया के इस शोर में जो सुकून का किनारा बने,
आँखों के हर आँसू को जो मुस्कान में ढाले।
सामने फैला है यह असीम नीला समंदर,
और एक बेपनाह सुकून है सीने के अंदर।
यह ढलती हुई लाली, यह बहती हुई ठंडी हवा,
हर मर्ज़ का मरहम है, हर दर्द की दुआ।
ज़िंदगी के हर मोड़ पर यह साया साथ रहे,
चाहे राहें बदल जाएँ, पर ये जज़्बात रहे।
कुछ ख़ामोशियाँ ऐसी हैं जो सब बयाँ कर देती हैं,
ज़िंदगी के सारे खालीपन को प्यार से भर देती हैं।