ग़ज़ल: एक आत्मा की अधूरी आवाज़
कवि / शायर:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'
भटकती फिर रही है रूह, अभि कोई तो सदा दे दे,
जो इस तन्हाई से रोके, मुझे ऐसी कोई दवा दे दे।-१
ये कैसा हश्र है मेरा, न ज़िंदा हूँ न मुर्दा हूँ,
कोई आए क़रीब मुझको जीने की दुआ दे दे।-२
हवाएँ सनसनाती हैं तो दिल धड़कता है मेरा,
कोई इस थरथराहट को ज़रा-सा आसरा दे दे।-३
चले थे जिस तरफ़, उस राह का कोई सिरा ही नहीं,
मुसाफ़िर थक गया है, अब तो कोई रास्ता दे दे। -४
सुलगती आग है भीतर, धुआँ बाहर नहीं आता,
ये कैसा दर्द है जिसका कोई भी वास्ता दे दे। -५
मैं सदियों से अकेलेपन के इस साए में ज़िंदा हूँ,
मुझे इस क़ैद से कोई मसीहा अब तो रिहा दे दे। -६
ज़माने भर के मेले में अकेले ही रहे हम तो,
जो मेरा दर्द समझ सके, मुझे वो आश्ना दे दे। -७
पुकारा था जिसे मैंने, वो मुड़कर देख भी न पाया,
मेरी आवाज़ खोई है, अभि कोई तो इब्तिदा दे दे। -८
ये सन्नाटा मुझे अंदर ही अंदर खाए जाता है,
कोई आकर मेरे घर का दीया फ़िर से जला दे दे। -९
मैं उस चौखट पे बैठा हूँ जहाँ कोई नहीं आता,
जो मेरे नाम की तख्ती वहाँ आकर लगा दे दे। -१०
बिछड़कर आपसे हम इस तरह बर्बाद बैठे हैं अभि,
कि जैसे कोई लहर कश्ती को साहिल पे डुबा दे दे। -११
अधूरी आस है मेरी, अधूरी हर कहानी है,
जो इस अधूरेपन को एक मुकम्मल दास्ताँ दे दे। -१२
लिखा था नाम जिसका दिल पे, वो भी मिट गया आख़िर,
कोई इस कोरे कागज़ को नया एक आशिया दे दे। -१३
गले में घुट रही है चीख़, पर आवाज़ मद्धम है,
मेरी इस बेबसी को कोई चीख़ने की वफ़ा दे दे। -१४
कवि / शायर:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'