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कविता
पिया क्या तुम तक मेरी आवाज नहीं जाता




नजर ऐ जिगर तुम्हारी याद और इंतजार मे है
तुम कहां हो
पिया क्या तुझ तक मेरी आवाज नहीं जाता

मेरी दर्द मेरी तरफ
मेरी खामोशी मेरी चिक
कुछ भी तुम्हारे कानों या
धड़कनों तक नहीं पहुंचता

पिया
सचमुच में तुम बरी बेरहम है



इतना लंबा इंतजार कौन करता है भला
जितना लंबा इंतजार मैं ने तुम्हारा किया है


अब इस इंतजार के दर्द सही नहीं जाती
यह दर्द इतनी भारी है कि
मेरी सांसों को ठहरा रहा है
और धड़कन को धड़कते हुए धीमा कर रहा है



क्या तुम्हें महसूस भी हो रहा है
मेरी दर्द मेरे तरफ


शायद नहीं
अगर होता तो
तुम मेरी आंखों के सामने होते


तुम नजरों से दूर हो
फिर भी
मैं तुम्हें चाहने पर मजबूर हूं पिया


यह दिल बड़ी ही जालिम है
जो तुझे चाहने से थकता नहीं


मेरे रोकने से रुक जाना चाहता है
पर तुम्हें चाहना छोड़ना नहीं चाहता


हड्डियां और मांसपेशियां और नशे
सब तने हुए हैं
सदियों से एक जगह ठहरते हुए

बस तुम्हारा इंतजार करते हुए
दिमाग पक चुका है पिया


बिना वादे की भी तुम्हारे
आने की इंतजार करते हुए


आंखों में कारी धूप के दर्द बर्दाश्त नहीं होता
पिया
और यह या पलके तुम्हारा इंतजार में
तुम्हारा रहा देखते हुए बंद होने चली है




देखो जरा गौर से
अगर देख सकते हो तो
मेरे माथे पर खींची हुई शिकंज को

शिकायतों से भारी मेरे इस मन को
ठहरते हुए एक ही जगह मेरे इस कदम को

पिया देखो जरा गौर से
मेरे मन में उठ रही
तुम्हारे लिए तरफ और चाहत को


पिया सचमुच में तुम बड़ी बेरहम हो

गहरी सांस ठंडी हो गई
पर मेरा इंतजार खत्म नहीं हुआ
तुमसे कितना प्यार है
मेरे अलावा कोई नहीं जानता

पिया
क्या अब तलाक तेरे कानों में मेरी दर्द की गूंज नहीं जाती


चिता पे लेटि आग जलती और
फिर हो जाती ठंडी
मैं जीवन से राख बन गई

पर मेरी इंतजार खत्म नहीं हुई


पिया क्या तुम्हें मेरी जिसमें में लग रही
आग की लपटे महसूस नहीं हुई


पिया
क्या सचमुच मे तुम इतनी नादान हो
की कभी समझा ही नहीं
की कोई है
जो तेरी राहों में चित से चिता तक बैठा रहा






चित से चिता तक का मतलब है
एक जगह ही जलने तक बैठा रहा
तेरे इंतजार करते हुए



दीवार में लगी किसी तस्वीर की तरह हूं मैं
ना जिंदगी भर हिली ना डोली
बस एक जगह पड़ा रहा
जो घर जलने पर साथ में खुद भी जल गया


ऐ आखिरी लव्ज देखते हुए
मेरे दिमाग में बस यही तस्वीर आया



दीवार पे टंगी हुई एक तस्वीर

abhinisha

राधा बोली— "कभी भूल तो नहीं जाओगे मुझे?"
कान्हा मुस्कुराए—
"जो मेरी बाँसुरी की हर धुन में बसी हो,
उसे भुलाने के लिए
मुझे खुद को भूलना पड़ेगा..."

parmarsantok136152

😭🥹

gulaboo22

“पिंजरा नहीं, घोंसला  …“
कहते हैं कि जिस चिड़िया के आगे रोज़ दाना रख दिया जाए, जिसके लिए पानी का कटोरा भर दिया जाए, उसे और क्या चाहिए।
मगर किसी ने कभी उसकी आँखों में झाँककर यह नहीं देखा कि उसकी भूख दाने की नहीं, उड़ान की होती है।
मेरे पिंजरे में कभी किसी चीज़ की कमी नहीं रही। दाना भी था, पानी भी था, धूप से बचाने के लिए छाँव भी थी।
कमी अगर थी, तो बस उस खुले आसमान की, जहाँ मैं अपने पंख अपनी मर्ज़ी से फैला सकूँ।
मैं अपना दाना किसी के हाथ से नहीं खाना चाहती।  
मैं चाहती हूँ कि सुबह की पहली धूप के साथ उड़ूँ, किसी अनजान छत पर बैठूँ।  
आँगन में बिखरे दो दाने अपनी चोंच से चुनूँ और फिर किसी पेड़ की डाल पर बैठी गिलहरी के साथ एक ही पोखर से पानी पी लूँ।
शायद उस पानी में मिट्टी की खुशबू होगी, आज़ादी का स्वाद होगा।  
सोने के कटोरे का पानी कभी वह स्वाद नहीं दे पाया।
लोग कहते हैं कि कैद में रहने वाली चिड़िया सुरक्षित रहती है।  
उसे न भूख सताती है, न मौसम का डर होता है।
मगर उन्हें कौन समझाए कि डर से बड़ी भी एक कैद होती है।  
और वह है बिना जिए पूरी उम्र गुज़ार देना।
सुरक्षित रहना और जीवित रहना, दोनों एक बात नहीं होते।
मुझे कभी सोने का पिंजरा नहीं चाहिए था।  
मैंने तो बस एक पेड़ की सबसे पतली टहनी माँगी थी।  
जहाँ हवा तेज़ चलती हो, जहाँ गिरने का डर भी हो और उड़ना सीखने की गुंजाइश भी।
मैं अपना घर किसी और के हाथों बना हुआ नहीं देखना चाहती।  
मैं चाहती हूँ कि एक-एक तिनका अपनी चोंच से उठाऊँ, उसे कई बार गिराऊँ, फिर दोबारा जोड़ूँ।
क्योंकि घोंसले लकड़ियों से नहीं, मेहनत और उम्मीद से बनते हैं।
कभी-कभी मैं सोचती हूँ, क्या सचमुच प्रेम किसी को अपने पास बाँध लेने का नाम है?  
अगर है, तो फिर पिंजरे में बंद हर चिड़िया सबसे ज़्यादा प्रेम की हक़दार होगी।
लेकिन नहीं…  
प्रेम वह है जो पंखों पर भरोसा करे, उड़ानों से डरे नहीं और लौट आने की ज़िद भी न करे।
जिस दिन पिंजरे का दरवाज़ा खुलेगा, शायद मैं पीछे मुड़कर नहीं देखूँगी।  
इसलिए नहीं कि मुझे उस जगह से नफ़रत होगी, बल्कि इसलिए कि मेरी आँखें पहली बार इतने बड़े आसमान को देख रही होंगी।
मुझे नहीं पता होगा कि मेरा पहला बसेरा कहाँ होगा, पहली बारिश कहाँ मिलेगी और पहली रात किस डाल पर कटेगी।
मगर मुझे इतना यक़ीन होगा कि वह हर तिनका, हर दाना और हर घूँट पानी मेरा अपना होगा।
मैं पिंजरे से भागना नहीं चाहती।  
मैं बस अपने हिस्से का आकाश माँगती हूँ।
मैं किसी और का बनाया हुआ घर नहीं चाहती।  
मैं अपना घोंसला बनाना चाहती हूँ।  
जहाँ हर तिनका मेरी मेहनत का हो, हर सुबह मेरी उड़ान की हो।  
और हर शाम मुझे यह सुकून दे कि मैंने अपनी ज़िंदगी उधार में नहीं, अपनी शर्तों पर जी है।
क्योंकि मैं चिड़िया हूँ।  
मुझे दाने से पहले दिशा चाहिए, कैद से पहले खुला आसमान चाहिए। 
और पिंजरे से कहीं ज़्यादा… अपना बनाया हुआ एक छोटा-सा घोंसला चाहिए।
 प्राची गुर्जर…..

prachitanwar111

“चाँद की स्मृति  “

मेरा एक गहरा ताल्लुक रहा है चाँद से।  
इतना पुराना कि अब उसकी तारीख़ भी याद नहीं।

बहुत कच्ची उम्र में उसकी चाँदी-सी चमक मेरे मन की किसी कोरी दीवार पर उतर आई थी।  
मैंने रातों को उसी की रोशनी में पढ़ा, उसी की तरफ़ देखकर अपने सारे अनकहे सवाल रखे।

मुझे लगता था, आकाश में जितने भी तारे हैं, उन सबसे पहले चाँद मेरा है।

फिर एक दिन मैंने देखा, चाँद अब भी वहीं था, बस उसकी रोशनी मेरे हिस्से में नहीं उतरती थी।  
वह दूर-दूर तक तारों में बँटा हुआ था।  
और मैं… अपनी ही रात में धीरे-धीरे अँधेरी होती चली गई।

समय ने मुझे एक ऐसे सूरज के सामने ला खड़ा किया, जिससे मुझे कभी मोह नहीं था।  
उसकी धूप तेज़ थी। उसके साथ चलना आसान नहीं था।  
कई बार उसकी तपिश से मेरे सपनों की नमी सूख गई।  
कई बार मैंने अपने ही साए को अपने पैरों में सिमटते देखा।

लेकिन… अजीब बात है।  
अब मेरी हर सुबह उसी के साथ खुलती है।  
मैंने उसकी धूप में अपने मौसम उगते देखे हैं।  
अब अगर वह एक दिन भी न उगे, तो शायद मैं रेत की तरह अपने ही भीतर बिखर जाऊँ।

कभी-कभी रात बहुत शांत होती है।  
और उसी सन्नाटे में चाँद मुझे देखता है। बहुत देर तक।  
ऐसे… जैसे उसे यक़ीन हो कि मैं अब भी उसकी रोशनी पहचानती हूँ।

मुझे लगता है, उसे अपने दाग़ों की चिंता है।  
शायद उसे लगता है, मैंने उन्हें कभी देखा ही नहीं।  
उसे कौन बताए… दाग़ तो हमेशा से थे, मैंने ही उन्हें उजाला समझ लिया था।

अब जब भी वह मेरी खिड़की पर ठहरता है, उसकी चमक में एक अनकही थकान होती है।  
जैसे उसने अपनी सारी जवानी तारों को रोशन करने में गुज़ार दी हो।  
और जब तारे किसी और की दुआओँ में टूटने लगे, तब उसे अपनी ही रोशनी की कमी महसूस हुई हो।

वह शायद मुझे पुकारता नहीं। बस देखता है। उम्मीद से।  
और मैं… मैं भी उसे देखती हूँ। मगर लौटती नहीं।

क्योंकि लौटना हमेशा प्रेम नहीं होता।  
कभी-कभी लौट जाना उन सुबहों के साथ विश्वासघात होता है, जिन्होंने हमें धीरे-धीरे जीना सिखाया है।

अब मेरी प्रार्थनाएँ रात के लिए नहीं, सुबह के लिए होती हैं।  
मेरी आँखें चाँद की राह नहीं तकतीं, वे उस पहली किरण का इंतज़ार करती हैं।  
जो हर दिन मेरे आँगन में उतरकर मुझे याद दिलाती है कि उजाला हमेशा सबसे सुंदर नहीं होता, लेकिन सबसे भरोसेमंद अक्सर वही होता है।

और शायद… यही प्रेम का अंतिम रूप है।  
जहाँ स्मृतियाँ आकाश में टँगी रहती हैं, पर जीवन धरती पर उगते सूरज के साथ अपनी जड़ें जमा लेता है।

प्राची गुर्जर….

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navaneethsabu

"मैं बदलने चली थी"

मैं बदलने चली थी किसी रोज़।  
सूरज से पहले उठी।  
बाल नहीं संवारे।  
चेहरा नहीं धोया।  
बस नंगे पांव चल पड़ी।  
अपने ही घर से बाहर।  
अपने ही अंधेरे की तरफ।

रास्ते में मिलीं मेरी पुरानी आदतें।  
वो जो कहती थीं "लोग क्या कहेंगे"।  
मैंने कहा …."कहने दो।"  
और आगे बढ़ गई।

मिलीं मेरी पुरानी ख़ामोशियां।  
वो जो गले में अटक कर  
लहू बन गई थीं।  
मैंने उन्हें थूक दिया।  
और पहली बार  
ऊंची आवाज़ में सांस ली।

धूप आने से पहले  
मैंने अपना अंधेरा नहीं छुपाया।  
उसे गले लगाया।  
कहा …."तूने मुझे बचाया था।  
जब कोई नहीं था तब तू था।  
अब तू जा।  
मैं उजाले की दोस्त बन गई हूं।"

लोगों ने पूछा …"क्या हुआ?"  
मैंने कहा …"कुछ नहीं।  
बस वो दाग जो चांद से उधार लिए थे,  
वापस कर दिए।  
अब मेरे चेहरे पर  
मेरी ही रातें हैं।  
और वो खूबसूरत हैं।"

किसी ने कहा  "तू टूट गई थी न?"  
मैं हंसी।  
"हां। तारों की तरह।  
और तारों का काम ही है टूटना।  
ताकि किसी की मन्नत पूरी हो।  
आज मैं अपनी मन्नत हूं।"

मैं बदलने चली थी।  
और बदल गई।  
बिना ऐलान के।  
बिना तमाशे के।  
जैसे दरख्त बदलते हैं 
एक दिन पत्ते गिर जाते हैं।  
दूसरे दिन कोंपल आ जाती है।  
किसी को पता नहीं चलता।  
पर दरख्त को पता होता है।  
कि वो अब पहले वाला नहीं रहा।

अब मैं सूरज के साथ उठती हूं।  
अंधेरे को साथ लेकर।  
दागों को साथ लेकर।  
टूटन को साथ लेकर।

क्योंकि बदलना मतलब  
पुराना मिटाना नहीं होता।  
बदलना मतलब  
पुराने को सीने में रखकर  
नया जीना होता है।

मैं बदलने चली थी किसी रोज़।  
और वो रोज़...  
आज था।
प्राची गुर्जर…..

prachitanwar111

मोहब्बत की ऊँचाइयाँ छू लीं,
बस एक गलती ने उन्हें मुजरिम बना दिया।

anisroshan324329

आपको पता है लोग ठंड में शादी क्यों
करते...

नहीं...

ताली ठंड में गर्मी का मज़ा ले सके

anisroshan324329

"किसी रोज़"

किसी रोज़ मैं ख़ुद के सामने बैठूंगी।  
बिना फोन, बिना शोर, बिना किसी बहाने के।  
सामने दो कप रखूंगी  
एक मेरे लिए, एक उस "मैं" के लिए  
जो सालों से इंतज़ार कर रही है।

किसी रोज़ मैं अलमारी के सबसे निचले खाने से  
अपने अधूरे सपने निकालूंगी।  
धूल झाड़ूंगी, सिलवटें सीधी करूंगी।  
और उनसे पूछूंगी 
"अभी भी सांस है तुममें?  
चलो, फिर से कोशिश करते हैं।"

किसी रोज़ मैं टूटे हुए दर्पण के टुकड़े बीनूंगी।  
उंगली कटे तो कटे।  
हर टुकड़े में एक पुराना चेहरा दिखेगा।  
मैं सबको जोड़ूंगी।  
और आखिर में जो चेहरा बनेगा  
वो न खूबसूरत होगा, न बदसूरत।  
वो बस... असली होगा।

किसी रोज़ मैं नदी के किनारे जाकर  
पत्थर नहीं फेंकूंगी।  
बस बैठ जाऊंगी।  
और पानी से सीखूंगी  
कि कैसे बहते-बहते भी  
ख़ुद को साफ़ रखा जाता है।  
कैसे मुड़ना पड़ता है,  
पर रुकना नहीं पड़ता।

किसी रोज़ मैं अपने दुख को कुर्सी दूंगी।  
कहूंगी ….."बैठ।  
आज तुझे भी सुना जाएगा।"  
और शांति को कहूंगी 
"तू थोड़ा तेज़ बोल।  
इतने साल बाद आई है,  
आवाज़ तो सुनाई दे।"

किसी रोज़ मैं रात को देर तक जागूंगी।  
छत पर लेटकर तारे नहीं गिनूंगी।  
बस अंधेरे को देखूंगी।  
और अंधेरे से कहूंगी 
"तू बुरा नहीं है।  
तू ही तो है जो मुझे  
मेरे अंदर का उजाला दिखाता है।"

किसी रोज़ मैं माफ कर दूंगी।  
सबको नहीं।  
ख़ुद को।  
उन सब बार के लिए  
जब मैं गिरकर भी नहीं रोई,  
जब मैं टूटकर भी मुस्कुराई,  
जब मैं हारकर भी "मैं ठीक हूं" बोली।

क्योंकि किसी रोज़ ये समझ आएगा  
दुख अच्छा लगता है,  
क्योंकि वो झूठ नहीं बोलता।  
और शांति शोर लगती है,  
क्योंकि वो बहुत दिन बाद आती है।

किसी रोज़...  
मैं ख़ुद से मिल लूंगी।  
और उस दिन के बाद  
कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।
प्राची गुर्जर….

prachitanwar111

" દાવ જિંદગીના "

હાવ નોખા છે અને ભાવ નોખા છે.
માણસે માણસે સ્વભાવ નોખા છે.

માનતો હતો કે હું રમું છું જિંદગીથી,
પણ જિંદગીના અહીં દાવ નોખા છે.

બતાવી ના શક્યો હું દાગ આ પીઠના,
એક જ ખંજરના પણ ઘાવ નોખા છે.

કિનારે જે મળ્યાં હતાં, બસ મૃગજળ,
હવે સમજ્યો દરિયાના વહાવ નોખા છે.

સદા એ અમૃતની જેમ વરસતાં રહ્યાં,
પણ ભીતર છૂપા ઝેરના તાવ નોખા છે.

કરવા ગયો જ્યાં સચ્ચાઈનો ખુલાસો,
ત્યાં સમજાયું જૂઠાણાના રાવ નોખા છે.

ખરીદવા નીકળો તો ખબર પડે "વ્યોમ",
કે હરેક બસ્તીમાં વફાના ભાવ નોખા છે.

✍...© વિનોદ. મો. સોલંકી "વ્યોમ"
જેટકો (જીઈબી), મુ. રાપર

omjay818

दुनिया औरत की तारीफ उसकी काया देख कर,
और मर्द की तारीफ उसकी कमाई देख कर करती है।

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