सम्राट की अंतिम प्रार्थना ✧
(वेदांत 2.0 लाइफ़ महामंत्र)
हे नाथ नारायण, हे अनादि अस्तित्व,
आज तक मैं भिखारी बनकर तेरे दरबार में खड़ा रहा।
माँगा धन, माँगा पद, माँगा सुख, माँगी सुरक्षा।
माँगी भीड़, माँगी प्रशंसा, माँगे चमत्कार।
मक्खी-मच्छर की भाँति अपने छोटे-छोटे गट्ठर लेकर तेरे द्वार पर गिड़गिड़ाता रहा।
पर आज दिखता है— मैं कितना मूर्ख था।
जो पहले से ही मिला हुआ था, उसी को बार-बार माँगता रहा।
जो माँगना चाहिए था, उसे कभी माँगा ही नहीं।
आज समझ आया— तू कभी रोकता नहीं।
तू तो अनादि काल से निरंतर दे रहा है।
सूर्य दिया, साँस दी, धरती दी, आकाश दिया, चेतना दी।
तेरा देना कभी समस्या नहीं था।
समस्या केवल इतनी थी कि मैं उसी को माँगता रहा जो पहले से ही दिया जा चुका था।
इसलिए हे प्रभु,
आज मैं वह माँग माँगता हूँ जिसके बाद कुछ शेष न रहे।
न भोगं देहि, न योगं देहि।
न देहि सुखं, न दुःख-वियोगम्।
सद्बुद्धिं देहि केवलम् एकाम्, येन सत्यं पश्यामि, अहं-तमो भिन्द्याम्।
न भोग दे, न त्याग दे।
न सुख दे, न दुःख का नाश दे।
केवल सद्बुद्धि की एक किरण दे—
जिससे सत्य और असत्य का भेद दिखे।
जिससे ‘मैं’ नामक अंधकार कटे।
मुझे परिस्थिति बदलकर मत दे।
मुझे वह तेज दे जिससे हर परिस्थिति में तेरा ही दर्शन हो।
मुझे समाधान मत दे।
मुझे वह बोध दे जो जान ले कि समस्या कभी थी ही नहीं;
केवल दृष्टि पर धुंध थी।
हे अस्तित्व,
मेरी झोली मत भर।
मेरी झोली ही गिरा दे।
ताकि दिखे—
मैं कभी खाली था ही नहीं।
मैं स्वयं तेरे खज़ाने का अंश हूँ।
यह भिखारी की याचना नहीं,
यह सम्राट की अंतिम माँग है।
क्योंकि जिसने सद्बुद्धि माँग ली,
उसने सम्पूर्ण ब्रह्मांड की चाबी माँग ली।
उसके बाद जगत जैसा भी हो,
उसका आंतरिक सिंहासन अडोल रहता है।
हे नाथ,
सद्बुद्धिं देहि।
बस।
इति।
🙏🌸 — 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲
Independent Researcher & Philosopher
Vedanta 2.0 ©
ORCID: 0009-0000-8083-0685
परिचय:
वेदांत 2.0 एक आधुनिक दार्शनिक मॉडल है, जिसके माध्यम से वेद, उपनिषद, गीता, बौद्ध दर्शन, योग, तंत्र, धर्म, मनोविज्ञान, जीवन और चेतना को 0–9 Framework के आधार पर समझने का प्रयास किया गया है। यह एक स्वतंत्र शोध-परिकल्पना है, जिसका उद्देश्य प्राचीन अनुभवजन्य ज्ञान और आधुनिक चिंतन के बीच संवाद स्थापित करना है।