निकम्मा इश्क़
जी..जहाँ ,
निकम्मा हूँ ! फ़र्ज़ी हूँ !
तेरे इश्क़ में ,
काब़िल कहा हूँ मैं ?
तेरे पाक दिल के ,
हर दफ़ा, सौ-सौ ज़ज्बातें
तोड़ कर, तुम्हारे पास
अफलातून....,
वापस लौट आता हूँ |
बेशर्म, बेहया बनकर,
भोली-भाली बातों से,
झूठे-मूठे किस्सों से
अजीब-ओ-ग़रीब चश्में लगाकर ,
बनावटी सूरत दिखाकर ,
उल्टे-पुल्टे कारनामों पर
मख़मली मक्खन लगाकर ,
तुम्हें फिर से मनाता हूँ |
बेतुकी कहानी सुनाकर ,
जी-हजूरी करते-करते,
हमेशा-हमेशा तेरा ही
लुभाता हूँ कोमल मन..
फिर भी लायक कहां हूँ मैं !
तुम्हारी अच्छाईयों के आगे
अपने स्वार्थी, ज़िद्दी रवैये से ,
आदत से मज़बूर होकर ,
बन जाता हूँ, लायक से
इक खलनायक मैं ||
-©®- शेखर खराड़ी
तिथि-४/८/२०२६