"दीवारों के पार"
कुछ ख़ास नहीं... हाँ, बहुत आम हूँ मैं।
मेरे नाम के आगे कोई ताज नहीं,
मेरी हँसी के पीछे कोई राग नहीं।
उजाले कभी थे मेरे, अब खो गए हैं,
अब तो बस एक थकी हुई, ढलती शाम हूँ मैं।
पर मेरे भीतर...
एक कमरा है।
न उसमें खिड़की है, न दरवाज़ा।
बस चार दीवारें हैं
और एक मैं हूँ,
जो ख़ुद से ही छुपी हुई हूँ।
इस कमरे को रोज़
मेरे भीतर का शोर खटखटाता है।
वो शोर जो चीख़ बन नहीं पाया,
वो आँसू जो बह नहीं पाए,
वो बातें जो कही नहीं गईं।
सब जमा हैं यहाँ,
साँस ले रहे हैं अँधेरे में।
हर सुबह एक सुनहरी रोशनी आती है,
मेरे जिस्म की दरारों से झाँकती है।
खिड़की ढूँढती है... नहीं मिलती।
थककर, मेरे ही साये से लिपटकर,
लौट जाती है रात के पास।
और मैं,
उसकी पीठ देखती रह जाती हूँ
बिना आवाज़, बिना शिकायत।
पर अब...
अब ये अँधेरा चुभने लगा है।
अब ये ख़ामोशी काटने लगी है।
अब मेरा मन
इस कमरे की मरम्मत चाहता है।
मुझे एक खिड़की चाहिए
छोटी ही सही,
पर इतनी बड़ी कि
कोई सवेरा उसमें से झाँक सके,
और पूछ सके "तुम ठीक हो?"
मुझे एक दरवाज़ा चाहिए
जिसकी चौखट पर
कोई दस्तक दे,
और मैं डरकर छुपूँ नहीं,
बल्कि कहूँ "आ जाओ,
यहाँ अँधेरा है, पर जगह है।"
मैं नहीं चाहती कि मेरा शोर
इन दीवारों में दफ़न हो जाए।
मैं चाहती हूँ कि वो
किसी के नाम की दुआ बनकर
इस कमरे से निकले।
मैं ख़ास नहीं हूँ, मुझे पता है।
पर ये दर्द... ये इंतज़ार...
ये ख़ास है।
और शायद
इसी इंतज़ार के नाम
एक सवेरा लिखा जाए।
तो आज,
मैं हथौड़ी उठाती हूँ
पहली चोट अपनी ही दीवार पर।
क्योंकि ढलती शाम को
अगर जीने का हक़ है,
तो उसे सुबह बुलाने का हक़ भी है।
प्राची तंवर …..