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स्वर्ग की अप्सरा तुम, दिव्य रूप धारी
नृत्य करतीं स्वर्ग में, अप्सरा तुम्हारी
गंधर्वों के साथ में, सुरों की ताल पर
नाचतीं तुम स्वर्ग में, अद्भुत सौंदर्य धार

तुम्हारे बालों में, फूलों की माला
तुम्हारे चेहरे पर, मुस्कान की लहर
तुम्हारे नृत्य में, स्वर्ग की झलक
तुम्हारी सुंदरता, हृदय को छू ले

स्वर्ग की अप्सरा, तुम्हारी कहानी
एक अद्भुत कथा, जो हृदय को छू जाए
तुम्हारी सुंदरता, स्वर्ग की शोभा
तुम्हारा नृत्य, हृदय को मोह ले।



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rajukumarchaudhary502010

बादलों से मेरी आस मर गई
अब बरसो या ना बरसो
.... मेरी प्यास मर गई......@@@

anisroshan324329

"आख़िरी आहट"  

तेरे जाने से मेरी दुनिया उजड़ी नहीं,  
बस अब किसी दस्तक पर ये दरवाज़ा खुलता नहीं।  
साँसें चलती हैं, रस्में निभती हैं,  
मगर दिल ने किसी मौसम से दोबारा दोस्ती नहीं की।  

तेरे बाद हर चेहरे को देखा, परखा,  
शिकवा किसी से नहीं रहा…  
और भरोसा भी अब किसी पर ठहरता नहीं।  

तू गया और दर्द ने चुपके से मेरे सीने में बसेरा कर लिया।  
अब ख़ुशी आती भी है तो दरवाज़े पर ही लौट जाती है।  
कहती है, "यहाँ जगह नहीं है।"  

लोग कहते हैं भूल जाओ।  
मैं हँस देती हूँ।  
कुछ रिश्ते दफ़्न होते हैं, साहब…  
वो लाशें नहीं होतीं जो मिट्टी के साथ गल जाएँ।  

अब कोई कहे "उम्र भर साथ निभाऊँगा"  
तो लब पर हँसी आ जाती है।  
क्योंकि मैंने एक बार उम्र भर का वादा  
आँखों के सामने टूटते देखा है।  

सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तेरे जाने की नहीं थी,  
सबसे ज़्यादा तकलीफ़ उस "वहम" की थी  
जो हर आहट में तुझे लौटता हुआ सुनता रहा।  

तू गया तो मैं कुछ रोज़ रोई…  
और मेरा यक़ीन बरसों तक भीगता रहा।  

शायद तुझे नया आसमान मिल गया होगा,  
नए लोग, नई बातें।  
और मेरे हिस्से…  
तेरी वो आख़िरी आहट रह गई,  
जो आज भी मेरे कमरे में गूंजती है।  

तू छोड़कर गया तो रास्ते वही रहे,  
शहर वही रहा, लोग वही रहे।  
बस मेरी रूह ने  
किसी का इंतज़ार करना छोड़ दिया। 
प्राची गुर्जर …..

prachitanwar111

🙏🙏यह महंगी 'भेंट सौगात'ों की,
दुनिया भले रहे एक तरफ,

मुझे एक 'चोकलेट' से,
खुश हो जाता 'बचपन' ज़ीना है।🦚🦚

parmarmayur6557

हर पति एक जैसा नहीं होता। पत्नी के प्रति उसका व्यवहार अक्सर तीन तरह का देखने को मिलता है—

पहला पति वह होता है जो समझदारी से पत्नी का साथ देता है। अगर घर वाले पत्नी से नाराज़ हों, तो वह बिना किसी का अपमान किए, बड़े धैर्य और बुद्धिमानी से पत्नी का पक्ष रखता है। वह ऐसा संतुलन बनाता है कि न पत्नी का सम्मान कम हो और न ही परिवार को बेवजह ठेस पहुँचे। ऐसे पति घर को जोड़ते हैं, तोड़ते नहीं।

दूसरा पति वह होता है जिसे हमेशा यही डर रहता है कि कहीं परिवार वाले नाराज़ न हो जाएँ। इसलिए वह पत्नी की भावनाओं की परवाह कम करता है। चाहे पत्नी का दिल टूट जाए, उसकी आँखों में आँसू आ जाएँ, लेकिन वह परिवार वालों के सामने कभी पत्नी के लिए नहीं बोलता। ऐसे रिश्तों में पत्नी धीरे-धीरे अकेली महसूस करने लगती है।

तीसरा पति सबसे उलझा हुआ होता है। पत्नी के सामने तो उसकी हाँ में हाँ मिलाता है और परिवार वालों के सामने परिवार की तरफ हो जाता है। इतना ही नहीं, जब बात रिश्तेदारों, पड़ोसियों या समाज तक पहुँचती है, तो अपनी पत्नी को ही गलत साबित कर देता है ताकि उसकी अपनी छवि अच्छी बनी रहे। ऐसे पति किसी के भी सच्चे नहीं होते, क्योंकि वे हर जगह सिर्फ अपना फायदा देखते हैं।

रिश्ता तभी मजबूत बनता है जब पति सच का साथ दे, चाहे गलती पत्नी की हो या परिवार की। न्याय और सम्मान ही हर रिश्ते की सबसे मजबूत नींव होते हैं।

चौथा पति
चाहे पत्नी अपनी जगह पूरी तरह सही हो, फिर भी वे परिवार, रिश्तेदारों और समाज के सामने उसी की गलतियाँ गिनाते रहते हैं। इतना ही नहीं, अगर उनका किसी और से संबंध हो, तो उस रिश्ते को छिपाने के लिए भी पत्नी को ही दोषी ठहराते हैं।
वे कहते हैं, "तुम्हारे साथ मुझे कभी सुकून नहीं मिला... घर में हमेशा क्लेश रहता था... इसलिए मैं किसी और के पास चला गया।"
लेकिन सच यह है कि किसी रिश्ते में समस्या होना और किसी का विश्वास तोड़कर अफेयर करना, दोनों अलग बातें हैं। अपने फैसले की जिम्मेदारी लेने के बजाय जब कोई अपनी बेवफाई का ठीकरा हमेशा पत्नी के सिर फोड़ देता है, तो यह जिम्मेदारी से बचने और अपने व्यवहार को सही ठहराने की कोशिश होती है।
एक अच्छा जीवनसाथी अपनी गलतियों की जिम्मेदारी भी स्वीकार करता है। हर गलती का दोष केवल पत्नी पर डाल देना न तो न्याय है और न ही एक स्वस्थ रिश्ते की निशानी।

archanalekhikha

हर पति एक जैसा नहीं होता, लेकिन कुछ पति ऐसे भी होते हैं जो अपनी पत्नी को हर जगह गलत साबित करने की कोशिश करते हैं।

चाहे पत्नी अपनी जगह पूरी तरह सही हो, फिर भी वे परिवार, रिश्तेदारों और समाज के सामने उसी की गलतियाँ गिनाते रहते हैं। इतना ही नहीं, अगर उनका किसी और से संबंध हो, तो उस रिश्ते को छिपाने के लिए भी पत्नी को ही दोषी ठहराते हैं।

वे कहते हैं, "तुम्हारे साथ मुझे कभी सुकून नहीं मिला... घर में हमेशा क्लेश रहता था... इसलिए मैं किसी और के पास चला गया।"

लेकिन सच यह है कि किसी रिश्ते में समस्या होना और किसी का विश्वास तोड़कर अफेयर करना, दोनों अलग बातें हैं। अपने फैसले की जिम्मेदारी लेने के बजाय जब कोई अपनी बेवफाई का ठीकरा हमेशा पत्नी के सिर फोड़ देता है, तो यह जिम्मेदारी से बचने और अपने व्यवहार को सही ठहराने की कोशिश होती है।

एक अच्छा जीवनसाथी अपनी गलतियों की जिम्मेदारी भी स्वीकार करता है। हर गलती का दोष केवल पत्नी पर डाल देना न तो न्याय है और न ही एक स्वस्थ रिश्ते की निशानी।

archanalekhikha

दोस्ती एक अनमोल खजाना है इसकी कोई सीमा नहीं होती कि कौन कब तक निभाएगा और ये जब तक निभाएगा जा सकता है जब दोस्तों में प्यार और विश्वास हो

vanshsingh118873

असली वॉयरल डेटा यही है
जिसे नेट की जरूरत नहीं
कितने घरों को तोड़ा है
कितने प्रेमी को इसने अलग किया है

आओ बहन चुगली करे

और ये गुण सिर्फ औरतों में पाया जाता है

anisroshan324329

good morning

rupex

आज समझा कि... उनके हो ना पाए
ये सज़ा नहीं,
मुद्दतों से उन्हें देखा नहीं, ये सज़ा है।

anisroshan324329

सबसे ज़्यादा दर्द कब होता है...

❣️❣️

जब सामने वाला आपकी ख़ामोशी भी सुनना छोड़ दे।


अगर ये बात दिल तक पहुँची हो, छोड़िए।

anisroshan324329

अपना होना ही जीवन है

"जो हुआ, अच्छा हुआ।
जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है।
जो होगा, अच्छा होगा।"

इन वाक्यों का अर्थ यह नहीं कि हर घटना सुखद होती है, बल्कि यह है कि अस्तित्व अपने नियमों से चलता है। अस्तित्व किसी व्यक्ति की इच्छा, अहंकार या कल्पना के अनुसार नहीं चलता। जो संभव है, वही घटित होता है।
समस्या अस्तित्व में नहीं है। समस्या मनुष्य के भीतर है।
मनुष्य स्वयं को जैसा है, वैसा स्वीकार नहीं करता। वह हमेशा किसी और जैसा बनना चाहता है—अधिक पवित्र, अधिक महान, अधिक ऊँचा, अधिक विशेष। यहीं से तुलना जन्म लेती है। तुलना से ऊँच-नीच पैदा होती है, ऊँच-नीच से अहंकार और हीनता, और इन्हीं से संघर्ष, हिंसा और दुख का विस्तार होता है।
अस्तित्व किसी को ऊँचा या नीचा नहीं बनाता। वह केवल विविधता को प्रकट करता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वभाव में पूर्ण है। लेकिन जब मनुष्य अपने स्वभाव को छोड़कर किसी कल्पित आदर्श के पीछे दौड़ता है, तब वह स्वयं से कट जाता है। यही वास्तविक त्रासदी है।
कर्म अपने आप में न पाप है, न पुण्य। कर्म तो केवल कर्म है। पाप और पुण्य हमारे निर्णय, मान्यताएँ और सामाजिक व्याख्याएँ हैं। जब हम कर्मों पर अपने मानसिक लेबल चढ़ा देते हैं, तब उन्हीं लेबलों के बंधन में बँध जाते हैं। बंधन कर्म नहीं बनाता; बंधन हमारी व्याख्या बनाती है।
इसलिए समस्या धार्मिक नहीं, अस्तित्वगत भी नहीं, बल्कि व्यक्तिगत है। प्रश्न यह नहीं कि अस्तित्व क्या कर रहा है। प्रश्न यह है कि मैं स्वयं अपने बारे में क्या मानता हूँ। मेरा भ्रम ही मेरा बंधन है।
ज्ञान का सार बहुत छोटा है—
अस्तित्व को समझो, और स्वयं को समझो।
यदि मनुष्य अपने वास्तविक परिचय में खड़ा हो जाए—न स्वयं को छोटा माने, न बड़ा; न पवित्र बनने का अभिनय करे, न अपवित्र होने का भय रखे; केवल जैसा है वैसा स्वयं को स्वीकार कर ले—तो अधिकांश संघर्ष उसी क्षण समाप्त हो जाएँ।
जहाँ स्वीकृति है, वहाँ तुलना नहीं रहती।
जहाँ तुलना नहीं रहती, वहाँ अहंकार नहीं रहता।
जहाँ अहंकार नहीं रहता, वहाँ बंधन नहीं रहता।
और जहाँ बंधन नहीं रहता, वहीं जीवन पहली बार खिलता है।
मनुष्य को बदलने की आवश्यकता नहीं है; उसे स्वयं को देखने की आवश्यकता है। स्वयं का स्पष्ट बोध ही मुक्ति है। मुक्ति अर्थ मृत्यु नहीं स्वतंत्र जीवन खुला आकाश अन्नत संभावना है।
Independent Researcher & Philosopher
Vedanta 2.0 ©
ORCID: https://orcid.org/0009-0000-8083-0685
(इंटरनेशनल रजिस्टर्ड – विज्ञान और वेदांत का संश्लेषण)परिचय:
वेदांत 2.0 “न मार्ग, न साधना, न नियम –
केवल समझ।
जो देख लिया, वही मोक्ष;
जो समझ गया, वही साधना, तो अभी जी लिया वही ईश्वर जीवन ही ईश्वर है।"

bhutaji

Good morning friends.. have a beautiful day

kattupayas.101947

મિત્રો,
લેખન ના આ નવા સફર માં આપ સહુ જ્ઞાની , જાણકાર, અને સંવેદનશીલ લોકો માટે પ્રસ્તુત છે મારી નવી રચના.
આપ ને આ કેવી લાગી જણાવશો તો આભારી થઈશ.
અસ્તુ....

jiteshdattani024052

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skptech

आंसूं जो बहा नहीं दिल चीर गया है
उससे माँगा था वक़्त उसने इंतज़ार दिया है
मैं रोता नहीं दिल भरा हो तब भी
सब्र ने देखो हाल क्या कर दिया है

anisroshan324329

एक ऐसे इंतजार जो खत्म हो चुकी है
फिर लौट है कोई उसके इंतजार करने


गीत पार्ट 1
वह इंतजार जी

हु। हु हु। हु हु।

प्यार में जो घड़ी-घड़ी होती है
वह इंतजार जी




हु। हु। हु। हु हु हु। 2



आया मेरे बाद। आया मेरे बाद
आया मेरे बाद दीवाना। आया मेरे बाद मेरा दीवाना


आ। या मेरे बाद करने मेरा इंतजार जी

करने मेरे इंतजार। जी




हु।


तन्हा हमने उन्हें छोड़ कहां
तनहा तो हम थे लम्हा लम्हा रहा



आया वक्त वही हालत की
मैंने प्यार किया था
और कमी था उनकी इसी प्यार की


पेमहाल तो हो गई थी मैं
आपा में उसके भी कुछ ना रहा आज



हु हु। हु हु। हु। हु

वह दिन मेरे कल
यह दिन उसका आज
बराबर की लगी है दोनो तरफ आग


हां इसमें फर्क है बरसों की
जज्बातों की और जिंदे आशो की



हु। हु। हु। हु
लेनी आई फिर से मजाक पे गुमान से
तन्हाई जिंदगी मेरे बाद मेरे इंतजार जी




हा आ। हा। आ। हा आ

प्यार में जो घड़ी घड़ी होती है
वह इंतजार जी

हा हा। हा हु। हु। हु।


वे एतबार जी
आया मेरे दीवाने आया मेरे दीवाने
मेरे बात करने मेरा इंतजार की


खुदा की खैर करूं
या उसके दर्द की दवा दूं

दर्द से भरा हो है खाक में मैं भी हूं



हु। हु। हु। 2
क्या फायदा एसी इंतजार की
जब उमरा वित ही गई तन्हा अकेली



आया सो साल बाद वे करने मुझे ही प्यार जी


आया 100 साल बाद वे




हु। हु। हु। हा आ। हा। आ। हा आ

जीवन वही वादा वही कसम वही खाए हजारों बार जी

होगा तुम्हें भी एक दिन मुझे जानिसार जी
आया मेरे बाद आया मेरे बाद
आया मेरे बाद मेरे दीवाने
आया मेरे बात मेरा दीवाना करने मुझे से ही प्यार


हु। हु। हु। हु। हु। हु

abhinisha

શુભસંધ્યા
જય શ્રી રાધેકૃષ્ણ🙏🏻

falgunidostgmailcom

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rajukumarchaudhary502010

दिल की इस बेचैनी को सुकून के धागों में पिरो गई,,
आज ये शाम भी जाते जाते कितनी हसींन हो गई।।
❤️

nandiv

હું પૂછુ છુ સતત આ મારા દિલને
જે સુખ હું તને ના આપી શક્યો
એ સુખ તે બીજે થી શોધ્યું
તો એમા ખોટુ શુ છે?
હા જલન તો થાય છે પણ કરુ તોય શુ
જેવુ મેં કર્યું તેવુ જ મેં પણ પામ્યુ
તો એમા ખોટુ શુ છે?

amirali3796

“मैं आज की नारी हूँ  “

न सियासत की जंग मेरी है,  
न बँटवारे की कोई गुहार है।

न मैं सिपाही हूँ,  
न मैं बाग़ी हूँ।

मैं तो बस…  
आज की नारी हूँ।

और दुख इस बात का है,  
कि मैं आज में होकर भी  
आज में नहीं हूँ।

कहते हैं, ज़माना बदल गया है।  
मैं हर बार अपने चारों ओर देखती हूँ।

बदले हैं बस घर के रंग,  
दीवारों की पुताई,  
और सोच पर चढ़ा हुआ सभ्यता का नया पर्दा।

बंदिशें अब भी उतनी ही पुरानी हैं।

आज भी जब एक लड़की ज़रा-सा सिर उठाकर चलती है,  
तो सौ आँखें उसके कदम नहीं, उसकी औक़ात नापने लगती हैं।

उसकी आवाज़ उन्हें ऊँची लगती है,  
मगर उस पर उठते हाथ उन्हें कभी भारी नहीं लगते।

कोई नहीं देखता उसकी हथेलियों के छाले,  
जो रोटियाँ सेंकते हुए बने।

कोई नहीं देखता उसकी पीठ का दर्द,  
जो पूरे घर का बोझ ढोते-ढोते पत्थर हो गया।

हाँ… सबको दिखती है उसके होंठों की लाली।  
किसी को नहीं दिखता उसकी मुस्कान का रोज़-रोज़ मरना।

उसे हर मोड़ पर दायरे सिखाए जाते हैं।  
धीरे चलो। धीरे बोलो। धीरे हँसो। धीरे जियो।

इतना धीरे…  
कि एक दिन वह अपने ही सपनों की आवाज़ सुनना भूल जाए।

कहते हैं, “बेटियाँ घर की इज़्ज़त होती हैं।”  
मैं पूछती हूँ, इज़्ज़त होती हैं या इज़्ज़त का बोझ?

जिसे जन्म लेते ही मर्यादा की गठरी बनाकर कंधों पर रख दिया जाता है।  
जिस दिन वह पहली साँस लेती है,  
उसी दिन उसकी आज़ादी की पहली साँस छीन ली जाती है।

फिर पूरी उम्र उसे समझाया जाता है  
कि यह सब उसकी भलाई के लिए है।

किस भलाई की बात करते हो तुम?  
उस भलाई की जिसमें एक लड़की अपनी ही हँसी दबाकर जीती है?  
या उस भलाई की जिसमें वह हर बार अपने आँसू पोंछकर दूसरों की थाली परोसती है?

मुझे मत बताओ कि औरत देवी है।  
देवी बनाकर तुमने उसे इंसान होना ही नहीं दिया।

मुझे मंदिर नहीं चाहिए। मुझे बराबरी चाहिए।  
मुझे पूजा नहीं चाहिए। मुझे सुना जाना चाहिए।

मैं थक चुकी हूँ हर रिश्ते में खुद को साबित करते-करते।  
हर बार अपनी चुप्पी को संस्कार कहते-कहते।

अब अगर मेरी आवाज़ तुम्हें बग़ावत लगती है,  
तो हाँ… मैं बाग़ी हूँ।

अगर अपने हिस्से का आसमान माँगना गुनाह है,  
तो मैं गुनहगार हूँ।

अगर अपने शरीर, अपने सपनों, अपने फ़ैसलों पर अपना अधिकार माँगना तुम्हें ज़िद लगता है,  
तो यह ज़िद अब मेरी पहचान होगी।

याद रखना…  
जिस दिन औरत ने अपने भीतर दबी हुई सदियों की ख़ामोशी को एक साथ आवाज़ दे दी,  
उस दिन तुम्हारे बनाए हुए सारे दायरे मिट्टी की लकीरों की तरह पहली बारिश में बह जाएँगे।

मैं किसी क्रांति का चेहरा नहीं बनना चाहती।  
मैं बस इतना चाहती हूँ…  
कि अगली बार जब कोई बेटी जन्म ले,  
तो उसके कानों में पहला शब्द “रुक ” नहीं, “उड़” हो।

और जिस दिन हर लड़की बिना डर के अपना नाम अपनी आवाज़ में बोल सकेगी,  
उसी दिन समझना…  
मैं सचमुच आज की नारी बन गई हूँ।
 प्राची गुर्जर…..

prachitanwar111