"अगर बदलना होता"
किसी ने पूछा मुझसे यूँ ही,
ख़यालों-ख़यालों में,
"अगर तुम कुछ बदलना चाहो,
तो क्या बदलोगी?"
सवाल ख़याली था,
पर मैं सच मान बैठी।
चली गई पूछने उनसे,
जो मैं कभी थी।
जो मैं अब हूँ।
जो मैं बन जाऊँगी।
पहले पूछा उस छोटी बच्ची से,
जो मिट्टी में घर बनाती थी,
जो तारों को मुट्ठी में भरना चाहती थी।
वो हँस कर बोली,
"मैं दुनिया बदल दूँगी,
ताकि कोई गुड़िया कभी न टूटे,
ताकि कोई परीकथा अधूरी न छूटे।
मैं? मैं ठीक हूँ।"
फिर पूछा उस लड़की से,
जिसके हाथों में किताबें थीं,
आँखों में सपने,
और दिल में डर।
वो चुप रही देर तक,
फिर धीरे से बोली,
"मैं ये डर बदल दूँगी,
ये लोगों का क्या कहेंगे।
ये पैरों की बेड़ियाँ।
खुद को? खुद को बस उड़ना सिखाना है।"
आख़िर में गई उस बूढ़ी औरत के पास,
जिसके बालों में चाँदी थी,
और आँखों में पूरी सदी।
उसने मेरा हाथ थामा,
और मुस्कुराकर कहा,
"बेटा, बदलना क्या है?
मैं तो हर दिन बदली।
बच्चे के लिए,
घर के लिए,
ज़माने के लिए।
अगर आज कुछ बदलना होता,
तो मैं वो सारे पल वापस ले आती,
जिनमें मैंने खुद को पीछे छोड़ दिया।
मैं खुद को नहीं बदलती।
बस खुद को जीना सीख लेती।"
लौट आई मैं,
सवाल वही था,
पर जवाब बदल गया था।
अब अगर कोई पूछे,
"अगर तुम कुछ बदलना चाहो..."
तो मैं कहूँगी,
"मैं कुछ नहीं बदलूँगी।
बस खुद को माफ़ कर दूँगी,
हर उस बार के लिए,
जब मैंने खुद से कहा था
'तुझे बदलना होगा'।"
प्राची तंवर