रिश्तों का तराजू
"रिश्ते अगर जज्बात से जुड़े हों, तो वहाँ 'धर्म' और 'गुलामी' जैसे शब्दों का स्थान नहीं होता।"
समाज ने सालों से रिश्तों को एक तराजू में तौला है। एक पलड़ा 'संस्कार' का है और दूसरा 'गुलामी' का। एक स्त्री पति का मान रखे तो वह आदर्श है, लेकिन एक पुरुष पत्नी का सम्मान करे तो वह गुलाम? यह विडंबना हमारे समाज की सोच को दर्शाती है।
असल में, सम्मान तो प्रेम की पहली शर्त है। जब हम किसी को अपना जीवनसाथी चुनते हैं, तो हम उन्हें अपने बराबर का दर्जा देते हैं। पति का अपनी पत्नी की राय का सम्मान करना, उसकी भावनाओं को समझना और उसे अपनी जीवनसंगिनी मानकर चलना 'गुलामी' नहीं, बल्कि प्रेम की पराकाष्ठा है।
रिश्ता वो है जहाँ न कोई छोटा हो, न बड़ा, बस दो रूहों का साथ हो। जहाँ सम्मान की नींव हो, वहाँ गुलामी नहीं, सुकून बसता है।
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