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“मैं” अहंकार नहीं है
अध्याय : अहंकार, कर्म और कृतज्ञता

“मैं” अहंकार नहीं है

अक्सर कहा जाता है कि अहंकार के बिना संघर्ष नहीं हो सकता, “मैं” के बिना कर्म नहीं हो सकता। लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है।

जीवन में “मैं” का होना आवश्यक है, पर हर “मैं” अहंकार नहीं है।

बच्चा जब भूख लगने पर भोजन चाहता है, चलना सीखता है, गिरता है और फिर उठता है—वहाँ जीवन की स्वाभाविक गति है। बच्चे में “मैं” का बीज हो सकता है, लेकिन उसे उसी क्षण अहंकार कहना उचित नहीं।

जीवन के अलग-अलग चरणों में भी यही बात है।

बचपन में तमस अधिक आधार और स्थिरता देता है।
यौवन में रजस ऊर्जा, गति, प्रयास और निर्माण देता है।
और चेतना के परिपक्व होने पर सत्त्व उसी गति में विवेक और बोध लाता है।

इसलिए न तमस शत्रु है, न रजस शत्रु है, न “मैं” अपने-आप में शत्रु है।

समस्या तब शुरू होती है जब जीवन की स्वाभाविक “मैं” भावना तुलना, श्रेष्ठता और स्वामित्व में बदल जाती है।

आवश्यकता और अहंकार में अंतर

भूख लगी और भोजन प्राप्त हुआ—यह अहंकार नहीं।.... वेदांत लाइफ. कॉम
https://www.vedanta2life.com/

bhutaji

1. पुस्तक विवरण - Description

Vedanta 2.0 : सत्य की पहली धड़कन

सत्य कहाँ है - बाहर दिखाई देने वाले जगत में, या उस चेतना में जिसके कारण यह जगत दिखाई देता है?

मनुष्य ने इस प्रश्न का उत्तर मंदिरों में, शास्त्रों में, विज्ञान में और गुरुओं में खोजा। पर वह एक जगह देखना भूल गया - जहाँ से यह प्रश्न उठ रहा है।

यह पुस्तक कोई नया धर्म, नया विश्वास या नया सिद्धांत नहीं देती। यह तुम्हें तुम्हारे ही भीतर उपस्थित सबसे प्रत्यक्ष सत्य की ओर लौटाती है - तुम्हारी धड़कन, तुम्हारी श्वास, और उस धड़कन को जानने वाला चेतन बिंदु।

Vedanta 2.0 में 0 का अर्थ है - कोई मूर्ति नहीं, कोई नाम नहीं, कोई दावा नहीं। वह मूल बिंदु जहाँ सारी मान्यताएँ समाप्त होती हैं और प्रत्यक्ष खोज शुरू होती है।

0 → चेतन बिंदु → जीवन → अनुभव → विचार → जगत

6 छोटे अध्यायों की यह यात्रा तुम्हें कोई नया सत्य नहीं देगी, बल्कि वह दृष्टि देगी जिससे तुम अपने ही जीवन को पहली बार होशपूर्वक देख सको।

agyat agyani


यह किताब उनके लिए है जो मानना नहीं, जानना चाहते हैं।
2. प्रस्तावना - लेखक की ओर से

मैंने यह पुस्तक सत्य को समझाने के लिए नहीं लिखी।

सत्य को समझाया नहीं जा सकता। जो समझाया जाता है, वह जानकारी बन जाता है। और जानकारी कभी मुक्त नहीं करती।

यह पुस्तक एक प्रयोग है।

बरसों तक मैंने भी बाहर खोजा - शास्त्र, दर्शन, गुरु, विज्ञान। हर जगह कुछ मिला, पर मूल प्रश्न वहीं रहा - जिसे यह सब दिखाई दे रहा है, वह कौन है?

एक दिन लगा कि हम सबसे निकटतम सत्य को छोड़कर सबसे दूर के उत्तर खोज रहे हैं। जिस धड़कन के बिना जीवन नहीं, जिस श्वास के बिना शरीर नहीं, जिस चेतना के बिना अनुभव नहीं - उसी को हमने सबसे कम देखा है।

तब यह स्पष्ट हुआ - सत्य को पाने की आवश्यकता नहीं है; पहले यह देखना आवश्यक है कि जिसे सत्य की खोज है, वह स्वयं क्या है।

इसी देखने से Vedanta 2.0 जन्मा।

Vedanta 2.0 किसी पुराने वेदांत का खंडन नहीं है, न ही किसी नए पंथ की स्थापना। यह केवल इतना कहता है - जो राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, कबीर ने अपने भीतर देखा, उसे मूर्ति बनाकर पूजना ही पर्याप्त नहीं है। दृष्टा का सम्मान करो, पर दृष्टि स्वयं प्राप्त करो।

"जिसने देखा, उसने रास्ता दिखाया; उसे पकड़ लेना देखने का विकल्प नहीं है।"

इस पुस्तक में मैंने कोई उत्तर नहीं दिया है। मैंने केवल उस क्रम को रखा है जो सबसे स्वाभाविक है - प्रत्यक्ष अनुभव से प्रश्न, प्रश्न से बाहर की खोज, बाहर की खोज की सीमा, और फिर भीतर के चेतन बिंदु पर वापसी।

यदि इसे पढ़ते हुए तुम्हें लगे कि तुम्हें कुछ मानना पड़ रहा है, तो रुक जाना। यह पुस्तक मानने के लिए नहीं, रुककर देखने के लिए है।

AgyatAgyani

3. भूमिका - यह पुस्तक कैसे पढ़ें

यह पुस्तक किसी धार्मिक ग्रंथ की तरह नहीं पढ़ी जानी चाहिए।

इसे किसी उपन्यास की तरह भी मत पढ़ना कि जल्दी-जल्दी खत्म कर दें।

यह पुस्तक भीतर की विज्ञान की पुस्तक है। विज्ञान की तरह ही इसे प्रयोग के साथ पढ़ना होगा।

इस पुस्तक में 0 क्या है?

0 कोई अंक नहीं है। 0 उस मूल अज्ञात का प्रतीक है जहाँ से सब प्रकट होता है। जहाँ तुम ईमानदारी से कहते हो - "मुझे नहीं पता।" यही ईमानदार अज्ञान प्रश्न बनता है, और प्रश्न ही निरीक्षण बनता है।

0 रिक्तता नहीं, अनंत संभावना है।

इस पुस्तक में चेतन बिंदु क्या है?

चेतन बिंदु कोई आत्मा या परमात्मा का धार्मिक नाम नहीं। यह तुम्हारे भीतर वह जीवित क्षमता है जो अभी इस वाक्य को पढ़ रही है, इस विचार को जान रही है। शरीर, श्वास, विचार सब दृश्य हैं, चेतन बिंदु द्रष्टा है।

यह पुस्तक क्या नहीं है?

यह किसी गुरु, धर्म, या पंथ के विरुद्ध नहीं है। मंदिर, शास्त्र, विज्ञान - सभी ने अपना काम किया है। पर मानचित्र को ही मंजिल मान लेना भूल है।

यह पुस्तक तुम्हें तुम्हारे गुरु से नहीं तोड़ेगी, तुम्हें तुम्हारे भीतर देखने भेजेगी। सच्चे गुरु की यही कसौटी है।

कैसे पढ़ना है?

हर अध्याय के अंत में एक छोटा प्रयोग दिया है। उसे केवल पढ़ो मत, करो।

रुकिए।
धड़कन को देखिए।
श्वास को देखिए।
विचार को देखिए।
और फिर पूछिए - इन सबको जान कौन रहा है?

उत्तर शब्द में मत खोजना। निरीक्षण में रहना ही उत्तर है।

यदि एक भी अध्याय में तुम्हें यह स्पष्ट दिख जाए कि देखने वाला देखे हुए से अलग है, तो इस पुस्तक का काम पूरा हो गया।

बाकी जीवन स्वयं सिखा देगा।
VEDANTA 2.0 LIFE — अध्याय क्रम

अध्याय 1 : सत्य की पहली धड़कन

अध्याय 2 : चेतन बिंदु

अध्याय 3 : जीवन का प्रकट होना
https://www.vedanta2life.com/

bhutaji

जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है।
जो हो गया, अच्छा हो गया।
जो होगा, वह भी अच्छा होगा।

Subtitle:कर्म से दृष्टा तक - गीता के मूल दर्शन पर एक नई दृष्टि | भक्ति, ज्ञान और सेवा सहायक कैसे मालिक बन जाते हैं



क्या कर्म ही बंधन है, या कर्तापन की कल्पना?
हम जीवन भर सोचते हैं - मैं कर रहा हूँ, मैं दुखी हूँ, मैं सफल हूँ। यहीं से बंधन शुरू होता है।
भगवद् गीता कहती है - कर्म तुम्हारे माध्यम से हो रहा है, तुम फल के मालिक मत बनो।
यह पुस्तक गीता की पारंपरिक व्याख्या नहीं है। यह घटना को घटना की तरह देखना सिखाती है।
इस पुस्तक में आप जानेंगे:
कर्म का वास्तविक नियम: कर्म भविष्य का फल नहीं, अभी घट रही घटना है।
दृष्टा का जन्म कैसे होता है: 'मैं दुखी हूँ' और 'दुख हो रहा है' में आकाश-पाताल का अंतर।
अशुभ कहाँ है? घटना में नहीं, उसे 'मेरा' बनाकर देखने में। घटना प्रकृति है, दृष्टि का अंधापन बंधन है।
सहायक कैसे मालिक बनता है: ज्ञान, भक्ति और सेवा सहायक हैं, पर जब वे ही सत्य के मालिक बन जाएं तो वही माया बन जाती हैं।
ब्रांड से भगवान तक: सत्य का अपहरण कैसे होता है - व्यक्ति से ब्रांड, ब्रांड से संस्था, संस्था से सत्ता तक।
भक्ति, शिष्य और सेवा का मनोविज्ञान: प्रेम कैसे सत्ता बनता है, समर्पण कैसे निर्भरता और पुण्य कैसे लेखा-जोखा बन जाता है।
यह पुस्तक किसके लिए है?
जो गीता को धर्मग्रंथ से अधिक जीवन-दर्शन की तरह समझना चाहता है। जो कर्म करते हुए भी मुक्त रहना चाहता है। जो भक्ति को प्रेम रहने देना चाहता है, सत्ता नहीं।
जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है।
जो हो गया, अच्छा हो गया।
जो होगा, वह भी अच्छा होगा।
यहाँ अच्छा का अर्थ सुखद, मनचाहा या नैतिक रूप से अच्छा नहीं है।
अच्छा का अर्थ है—घटना को उसके अस्तित्वगत नियम में घटते हुए देख पाना।
कर्म चलता रहे।
विचार आते-जाते रहें।
इच्छाएँ उठती रहें।
जीत और हार आती-जाती रहें।
संस्थाएँ बनती-बिगड़ती रहें।
व्यवसाय चले।
सेवा हो।
ज्ञान दिया जाए।
घटना को मत रोको; अपनी दृष्टि को देखो।
सत्य को अपने “मैं” का स्वामी मत बनाओ।
जो हो, वही दिखाओ।
जो करो, वही कहो।
और जो घट रहा है, उसे पहले घटना की तरह देखो—अपनी कहानी की तरह नहीं।
क्योंकि जैसे ही घटना “मेरी” होती है, कर्तापन पैदा होता है।
कर्तापन से इच्छा जुड़ती है।
इच्छा भविष्य को वर्तमान में खींचती है।
और वहीं से बंधन शुरू होता है।
जब घटना केवल घटना दिखाई देती है, तब देखने वाला दृष्टा प्रकट होता है।
यहीं कर्म है।
यहीं दृष्टा है।
यहीं कर्तापन ढीला पड़ता है।
और यहीं से मुक्ति की पहली झलक दिखाई देती है।
पहला खंड — कर्म से दृष्टा तक ( अध्याय 1 से 9 + उपसंहार )
दूसरा खंड — सहायक कैसे मालिक बनता है ( अध्याय 10 से 14 )

https://www.vedanta2life.com/

bhutaji

🌸किसका है🌸

खोए हो ख़्वाब में, ये इंतज़ार किसका है,
आँखों में ये नशा और ये ख़ुमार किसका है।

लबों पे है शराब, निगाहों में है नशा,
बताओ तो सही, ये इकरार किसका है।

अल्हड़पन तेरी अंगड़ाई में कुछ कह रहा है,
खिलता हुआ ये रूप, ये बहार किसका है।

ज़ुल्फ़ों की घटा छाई है तेरे चेहरे पर,
इस चाँद पर ठहरा ये निखार किसका है।

तेरी हर अदा में मोहब्बत झलकती है,
दिल में छुपा हुआ ये प्यार किसका है।

हम तो समझे थे कि तुम यूँ ही मुस्कुराए हो,
फिर आँखों में ये मीठा ख़ुमार किसका है।

सागर, तेरी बातों में राज़ गहरा है कोई,
तू बता दे आखिर ये इंतज़ार किसका है।

✍️बेनी सागर

benisagar

I'm not a shayr

कलम थोड़ी कमज़ोर हैं हमारी, तारीफें तुम्हारी एक साथ नहीं लिख पाएगी !


अपनी आँखों से कहो ज़रा कम इतराएँ, इन्हें पता है शुरुआत इन्हीं से की जाएगी !

anisroshan324329

मौसम आज कुछ यूँ मेहरबान है,
ठंडी हवा में घुली बारिश की मुस्कान है।
बादलों से ढका ये नीला आसमान,
हर तरफ़ बिखरा प्रकृति का निखार है।
चलते-चलते नज़र जब उठती है,
तो हरियाली कुछ और खूबसूरत लगती है।
हवा चेहरे को छूकर जब गुजरती है,
मन की सारी थकान जैसे वहीं ठहरती है।
ऐसे मौसम में बस चलते रहने का मन करता है,
क्योंकि आज हर कदम के साथ सुकून मिलता है।

ruchiraptagmail.com106238

" ચાહત "
------------
ચા હતી, તું હતી, ને એક સાંજ હતી.
મૌન હતુ મુરાદ હતી,ને મિલન હતું.

વાત હતી, વિગત હતી,ને વિદાય હતી.
પીપળાનાં ઝાડની નીચે બે જાન હતી.

ગોપી હતી, મીરા હતી, કે રાધા હતી.
પહેલાનાં યુગમાં જોય હતી.

આજનાં યુગમાં જોવા મળી હતી.
જુગલ જોડી પછી પણ, જોવા મળશે.
🖊️Jaya.Jani.TalaJa. "Jiya "

davejayaben809394

" સંસ્કારોની ધરોહર "

ઘરોમાં જે સદા સંસ્કારોનું સિંચન રાખે છે.
એ જ દિલમાં સદાય સંસ્કૃતિનું મનન રાખે છે.

તજી પાશ્ચાત્ય પાછળની આ આંધળી દોટને,
ભારતીય સંસ્કૃતિનું એ કાયમ જતન રાખે છે.

મોટાને દઈ આદર ને નાનાને જે વ્હાલ આપે,
સંસ્કારોનું મનમાં એ કેવું રૂડું ભવન રાખે છે.

નમાવી શીશ માતૃભાષા ને ધરતી માના ચરણે,
ધબકતા હૃદયમાં હરેક જણ સદા વતન રાખે છે.

કળા, સંગીત ને ઉત્સવ તણી જે ધરોહર છે,
ક્ષણે ક્ષણમાં એ પર્વનું પવિત્ર ઉપવન રાખે છે.

ભલે બદલાય દુનિયા આખી સમયની સાથે,
સંસ્કારોની મૂડી સાથે 'વ્યોમ' જીવન રાખે છે.

✍...© વિનોદ. મો. સોલંકી "વ્યોમ"
જેટકો (જીઈબી) અંજાર. મુ. રાપર.

omjay818

એક નાનકડું છમકલું...

શીર્ષક: માં

માંના હાથની હૂંફમાં આખી દુનિયા સમાઈ જાય છે,
એની એક હાસ્યમાં થાકેલી સાંજ પણ ખીલી જાય છે,
ઉંમર ભલે જીવનની કેટલીય મંજિલો વટાવી જાય,
પણ માં પાસે પહોંચતાં જ વ્યક્તિ ફરી બાળક બની જાય છે. ❤️

✍🏼 જિગર અશોક પંડ્યા

pandyajigar

🙏🙏कुछ यादें धुंधली हो जाती है,
वक्त गुजर जाने के साथ साथ,

हा किन्तु उन यादों को तस्वीरों में,
संभाला के समेट रखीं है,

बस तस्वीरें देखते ही,
वो यादें जिंदा हो जाती है।

मस्तिष्क और हृदय दोनों में।🦚🦚

parmarmayur6557

शिक्षक दिवस पर मेरे सभी गुरुजनों को समर्पित

सौभाग्य है जो ऐसे गुरु मिले
सबकी कृपा है मैंने पायी
हुई मेरे महादेव की कृपा जो
ऐसे गुरुजनों से शिक्षा मैंने पाई

भोला भाला मन था मेरा
संस्कार और नीति मुझे सिखाई
पाकर स्नेह उनका हुआ प्रफुल्लित मन
भाग्य पर अपने मैं भी इतराई

शब्दों का मर्म सिखवाया
अर्थ में गहनता तब आई
मेरी गलती पर मुझे सुधारा
लेखन की बारीकी समझाई

थी अनजान चालाकियों से जग की
दे ज्ञान मुझे नई राह दिखलाई
बन प्रेरणा मेरी मुझे रास्ता दिखवाया
हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाया

सत्य और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया
आशीर्वाद से उनके मैंने ये सफलता पाई
बारम्बार धन्यवाद मेरे गुरुजन को
देती हूँ शिक्षक दिवस की आपको बधाई

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

drvandnasharma8596

આપણે પોતાના જીવનમાં કે આસપાસ બનાવો બનતા જોઈએ છીએ કે બે ભાઈઓ વચ્ચે મિલકતની વહેંચણીમાં એક ભાઈ બધું પચાવી જાય અને બીજાને ઓછું મળે. પછી બીજો ભાઈ ન્યાય ખોળે, છેવટે કોર્ટનો આશરો લે અને સુપ્રીમ કોર્ટ સુધી ઝઘડે. ન્યાય તો ન મળે, પણ બંને ભાઈઓ દુઃખી દુઃખી થતા જાય. એવું પણ જોવા મળે કે નિર્દોષ વ્યક્તિ જેલ ભોગવે છે, જ્યારે ગુનેગાર વ્યક્તિ મોજ કરે છે. ત્યારે આપણને મનમાં થાય કે આમાં ન્યાય શું રહ્યો? ભગવાનની ન્યાયની ભાષા શું છે? : https://dbf.adalaj.org/C65wTSmd

#selfhelp #spirituality #justice #DadaBhagwanFoundation

dadabhagwan1150

RAJSTHAN'S FAMOUS NEWSPAPER RAJSTHAN PATRIKA 💫

niraliipatel.127808

उनसे मिलने की ख़्वाहिश नहीं है,
कि मुझमें अब रंजिश नहीं है,
अना रखो या फ़ना हो जाओ,
इश्क़-इश्क़ है बंदिश नहीं है

anisroshan324329

🏵️चटपटित मखाणे.. आणि
🏵️मसाला सोया चंक्स

🏵️मखाणे योग्य प्रकारे आणि योग्य वेळी खाल्ले तर वजन कमी करण्यासाठी त्याचा चांगला फायदा होतो.
मखाण्यामध्ये मॅग्नीशियम असतें
उपयोगी अँटी-ऑक्सिडंट असतात.
हे अँटी-ऑक्सिडंट्स हृदयाचे आरोग्य चांगले ठेवण्याचे काम करतात.
मखाणे चा ग्लाईसेमिक इंडेक्स कमी असतो

🏵️प्रथम मखाणे कढईत कोरडेच भाजून
कुरकुरीत करून घ्यावे
ते ताटात काढून ठेवावे
आता कढईत एक मोठा चमचा साजुक तूप घालावे
तूप वितळले की त्यात
चवीनुसार फक्त मीठ व काळी मिरी पावडर घालावी
तुमच्या आवडीचा मसाला सुद्धां वापरू शकता 😊
ताबडतोब मखाणे घालून एकसारखे करून घ्यावे
चविष्ट
कुरकुरीत
पौष्टिक मखाणे तयार...

पुस्तक वाचताना
टीव्ही पाहताना
गप्पा मारताना..
कुठंही कधीही आस्वाद घेऊ शकता

घट्ट झाकण असलेल्या कंटेनर मध्ये भरुन ठेवावे म्हणजे मऊ होत नाहित..

🏵️मसाला सोया चंक्स

निसर्गाच्या चांगुलपणाने समृद्ध,
सोयाबीनमध्ये अँटिऑक्सिडंट्स आणि फायटोन्यूट्रिएंट्स भरपूर प्रमाणात असतात,
जे पुरेसे प्रमाणात सेवन केल्यावर तुमचे आरोग्य सुधारते.
इतकेच नाही तर सोयाबीनमध्ये फायबर, प्रथिने आणि ओमेगा-३ फॅटी अॅसिड्स देखील असतात, जे चयापचय वाढवणे, लठ्ठपणाशी लढा देण्यासारखे फायदे देतात.

सोया चे असे चंक तयार मिळतात
तेलात मंद आचेवर ते तळून घेणे
गरम असतानाच त्यावर मीठ मितकुट
अथवा आवडीचा मसाला टाकणे
गार झाल्यावर घट्ट झाकणाच्या डब्यात भरणे..

🏵️फोटोत दाखवले आहेत असे दोन डबे कायम माझ्याकडे डायनिंग टेबल वर ठेवलेले असतात
मनात येइल तेव्हां चटकन तोंडात टाकता येतात
पौष्टिक आणि चवीष्ट

🏵️जेवताना सुद्धां ऐन वेळेस गरम आमटीत टाकून हे खाता येतात
अथवा कुठल्याही भाजीत शिजून झाल्यावर शेवटच्या वाफेला मिसळता येतात

🏵️ज्यांच्या घरी किशोर वयाची मुले मुली आहेत त्यांना तर हे अतिशय उपयोगी आहेत 😊

jayvrishaligmailcom

किसी और से क्या मोहब्बत करूं, इन दिनों खुद से ही फिर जुङने की कोशिश कर रहा हूं

anisroshan324329

ममता गिरीश त्रिवेदी की 🌹 कविताएं ✍️

mamtagirishtrivedi740648

नफ़रतें तो बहोत हैं कर ली
अब प्यार कर के भी देख ले
किसी क़ातिल हसीना से दोस्त
नज़रें दो चार कर के देख ले

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

The Letter

What if a letter written decades ago… was never meant for the past?

Evelyn finds Edward’s letter to Eleanor among the forgotten things of the old house.

She doesn't know why it feels strangely familiar.
She doesn't know why the words seem to reach beyond the years.

Who is Edward?

Some ghosts don't haunt places.
They haunt memories.

Some secrets are forgotten.
Some are buried.
And some… wait.

Is Edward haunting Evelyn?
Or is there something far more terrifying waiting to be remembered?

🕯️ The Journal That Waited — Chapter One
Now live. 📖

Stay tuned for Chapter Two…

@noctis_whisper

pallavidas

🌸मोहब्बत की रुस्वाई🌸

तूने ही तो ये दुनिया बसाई है,
फिर क्यों आँखों में दर्द उतर आई है।

चुना था मोहब्बत का रास्ता तुमने,
फिर सफ़र में क्यों ये रुसवाई है।

तेरे क़दमों में सजदा करता था हमदम तेरा,
अब ये शिकवा क्यों कि तू हरजाई है।

जिसे अपना समझकर उम्र गुज़ारी,
उसी ने आज दूरी क्यों बनाई है।

तेरी यादों से रोशन था मेरा घर,
अब हर तरफ़ क्यों तन्हाई है।

हमने तो वफ़ा को इबादत समझा,
फिर हिस्से में क्यों सिर्फ़ जुदाई है।

✍️बेनी सागर

benisagar

ALFHA PRODUCTION HOUSE
OFFICIAL NOTICE
Date: August 18, 2026
Subject: Release Schedule Update for October Story Launches
This is to officially inform all concerned authors, readers, and consultants that Alfha Production House has reviewed the story release form submissions from our authors.
Based on the overwhelming feedback and preferences shared by the authors, it has been realized that October is the most optimal and strategic month for releasing their upcoming works.
Consequently, in complete conformity and agreement with our authors, readers, and consultants, the Alfha Production House team is pleased to announce that 28 stories—with the potential confirmation of 2 additional stories—will officially release this coming October.
We thank everyone involved for their valuable input and continuous support. Further details regarding the exact launch dates and promotional schedules will be shared shortly.
Authorized By:
Management Team
Alfha Production House

alfha202141

ALFHA PRODUCTION HOUSE
OFFICIAL NOTICE
Date: August 18, 2026
Subject: Reader and Consultant Consultation: Launch Timeline for the "Earn by Imagination" Stories App
This is to officially inform all consultants, authors, and readers that Alfha Production House is preparing to launch the "Earn by Imagination" stories app.
Under this upcoming platform, consultants will have the opportunity to earn revenue directly through the views and downloads of their authorized books published by Alfha Production House.
To ensure the best possible rollout for our community, we are currently considering three potential release windows for the app:
* September 2026
* November 2026
* January 2027
Call for Feedback
We value the input of our community. Therefore, we invite all readers, consultants, and authors to share their views and preferences regarding which of these months is most suitable for the official app release. Please submit your feedback to help us determine the ideal launch timeline.
Further updates and final scheduling details will be announced based on your responses.
Authorized By:
Management Team
Alfha Production House

alfha202141

সম্পৰ্কৰ সন্ধান

সম্পৰ্ক মানুহৰ জীৱনৰ আটাইতকৈ মূল্যৱান সম্পদ। কিন্তু সময়ৰ লগে লগে বহু সম্পৰ্কৰ মাজত দূৰত্ব, অভিমান আৰু ভুল বুজাবুজিৰ সৃষ্টি হয়। আমি কেতিয়াবা সম্পৰ্কটোক ধৰি ৰাখিবলৈ চেষ্টা নকৰি, কেৱল আনজনৰ পৰা আশা কৰি থাকোঁ।

সম্পৰ্কৰ প্ৰকৃত অৰ্থ কেৱল তেজৰ সম্পৰ্ক নহয়। যিজনে দুখৰ সময়ত কাষত থিয় দিয়ে, নীৰৱতাতো মনৰ কথা বুজি পায়, ভুল হ’লে ক্ষমা কৰে আৰু সুখৰ সময়ত আন্তৰিকভাৱে হাঁহে—তেওঁয়েই প্ৰকৃত আপোন।

জীৱনৰ বাটত বহু মানুহ আহে আৰু যায়। কোনোবাই আমাক শিক্ষা দিয়ে, কোনোবাই সাহস দিয়ে, কোনোবাই মৰম দিয়ে। কিন্তু সকলো সম্পৰ্ক একে নহয়। কিছুমান সম্পৰ্ক সময়ৰ লগে লগে গভীৰ হয়, আন কিছুমান সম্পৰ্ক সময়ৰ পৰীক্ষাত হেৰাই যায়।

সেয়ে সম্পৰ্ক বিচাৰি দূৰলৈ যাব নালাগে। কেতিয়াবা আমাৰ ওচৰতে থকা মানুহজনৰ মনটো এবাৰ বুজিবলৈ চেষ্টা কৰিলেই সম্পৰ্কৰ প্ৰকৃত মূল্য বিচাৰি পোৱা যায়।

সম্পৰ্ক ৰক্ষা কৰিবলৈ অহংকাৰ নহয়, প্ৰয়োজন মৰম, বিশ্বাস, সন্মান আৰু বুজাবুজি। কাৰণ সম্পৰ্ক ভাঙিবলৈ এটা মুহূৰ্তই যথেষ্ট, কিন্তু এটা সম্পৰ্ক গঢ়িবলৈ লাগে বহু বছৰ।

শেষত মনত ৰাখিব—সম্পৰ্কৰ সন্ধান কেৱল আন মানুহক বিচাৰি ফুৰা নহয়; নিজৰ মাজত থকা মৰম, বিশ্বাস আৰু মানৱীয়তাক বিচাৰি পোৱাও এক গভীৰ সন্ধান।

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