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New bites

🙏🙏हम कोई तकलीफों में है,
मन भीतर टेंशन बढ़ रहा है।

तब हमें क्या करना चाहिए?
वहीं हमें मालूम नहीं पड़ता है।

हमारी जिंदगी में कुछ ना कुछ प्रोब्लेम्स रहेती है,

इसका मतलब यह नहीं है कि हम उस प्रोब्लेम को दूर करने कि वज़ह उसमें ही उलझकर जिंदगी जिना ही छोड़ दे।

उसमें उलझनें से टेंशन दूर नही होगी किन्तु और बढ़ेगी ऐसे वक्त पर हमें शांत चित्त से खुद उसका निराकरण ढूंढना चाहिए।

यदि हमें नही मिल रहा है तो हमारे हितेषी मित्रों से राय लें या कोई अच्छी किताबों को पढ़ेंगे।

उससे निराकरण अवश्य मिलेगा और हमारी टेंशन में राहत मिलेगी या दूर होगी।

जिंदगी में जब मन ना लगे! मूड़ ओफ हो, तब हमें मन को राहत दे ऐसा कुछ करना चाहिए।

जैसे कि एक फूल से दुसरे फूल पर उड़ती रंग-बिरंगे तितलियां देखनीं चाहिए,

पर्वत से नीचे गिर रहे झरने देखने चाहिए,

बह रही नदी की धाराओं को महसूस करना चाहिए,

खुले आसमां में उड़ रहे पंखी देखने चाहिए,

बस मित्रों की टोली के बीच रहकर "जिंदगी मिलेगी ना दोबारा" यह सोचकर जिंदगी जी लेनी चाहिए।

बस ऐसे ही दिमाग़ को मानसिक पीड़ा से सुकून मिलेगा तब हृदय को अपने-आप एक अच्छी ऊर्जा का संचार मिलेगा।🦚🦚

parmarmayur6557

"शीश महल से सूखी रोटी तक का सफर ही इश्क है। "

anisroshan324329

Do you know that impurity of the chit remains in the world because of failure to repent? And that is why all impure deeds (actions; karma) continue.

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#doyouknow #facts #spiritual #karma #DadaBhagwanFoundation

dadabhagwan1150

Good Morning 🌅

harshparmar8722

- लफ़्ज़ों की बंदिशों से परे -

लफ़्ज़ों की बंदिशों से परे एक राब्ता है तुमसे,
जैसे सदियों पुराना कोई वास्ता है तुमसे।

धुंधली सी इस दुनिया में जब खुद को खोता हूँ,
तेरी यादों के अक्स में ही तसल्ली पाता हूँ।

ज़िंदगी की इस मसरूफ़ियत में भी एक ठहराव हो तुम,
मेरी हर अनकही दुआ का खूबसूरत जवाब हो तुम।

वक्त भले ही रेत की तरह फिसल जाए हाथों से,
मगर तुम्हारा अहसास रूह में महकेगा सांसों से।

-MASHAALLHA

mashaallhakhan600196

बेरहम होकर के समंदर
हर चीज को नीगल लेता हैं।
पलभर अपनें पास में रखकर
पलभर में फिर उगल देता हैं।

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

चिराग जला लेता हूँ
आफताब बुझा करके

पुराना दर्द भुल जाते हैं हम
नया दर्द दिल में बसा करके के

चिरागों की सोहबत में रहते हो शायद
उजाला रख जाते हो मेरी दहलीज पे मुस्कूरा करके

अश्कों से सिंचता हूँ रोज सुबह ओ शाम
जख्मों को रखता हूँ मैं हरा भरा करके

मत मचाओ शोर ऐ जहान वालों
बस अभी सोया है दर्द मुझको रुला करके

ferojkhan.536289

उसने पुराने जख्म कुरेदें हैं
गुजरा दर्द जगाया है

हंसाने वाले तूने आज हमें
जार जार रुलाया है

क्यूँ रखते खाली कमरा दिल का
एक दर्द को बैठाया है

मैं यहीं का यहीं रह गया
परिंदा आसमां फिर आया है

आखिर निजात मिली सियाह रातों से
जहाँ में सुरज उग आया है

ferojkhan.536289

अश्कों का सैलाब है
दर्द बेहिसाब है

किनारा नहीं है
मेरे डुबने की बात है

तारें गिनना मेरा शौंक है
जागने की रात है

दम घुट रहा है
कोई टीस सांसों के पास है

करीब आकर मेरा दिल बहलाओं
ये दिल बड़ा उदास है

क्यूं उन पर भरोसा कर लिया
खंजर उनके पास है

ferojkhan.536289

सस्ती सांसें
महंगा खंजर

सुनसान रास्ते पे
डरा सिकंदर

बोल सिंकदर
जीता के हारा

कहता है
अपनों ने मारा
अपनों से हारा

ferojkhan.536289

जमानें की रस्मों को तोड़कर आई थी तुम
तोहफा मुस्कुहटों का लाई थी तुम

हमें तब से कुछ हो गया
जब पहली दफा मुस्कुराई थी

थे तनहा से हम जमानें में
जमाना जला जब नजदिक आई थी तुम

कोई अजाब न मुझको परेशां करें
ये दुआ लब पे लाई थी तुम

जल रहे थे हम जिस वक्त धुप में
मेरी छाँव बनकर आई थी तुम

ferojkhan.536289

कविता
दर्दनाक यादे

दर्दनाक यादव के साथ
आधी रात में आने वाले खौफनाक सपना
जिसे आंखों मैं आते ही लोग चिल्लाकर उठ जाते हैं



यह यादें उन दिनों की है जब हम
किसी के डर से छुपा करते थे
आंखें बंद कर लिया करते थे

और चाहते थे कि
हम कभी आंखें ही ना खोले
और यह पल बित जाए
या तो सब कुछ खत्म हो जाए

या तो उम्मीद होता कोई आए
और हमें बचा ले

उस राक्षस से जो हमें पीटने के लिए
हमारे पीछे पड़े हैं


और वही दर्द डर के साऐ अब तलक ख्वाबों में है
वह चिल्लाहट से गुजते हुए आवाज
वह सिकोड़ते हुए आंखें
वह डरावनी चेहरा

अभी भी ख्वाबों में आ जाता है
और फिर हमें उन्हीं दिनों में ले जाते हैं
जब हम सबसे दर्दनाक दिनों में थे


और डर घबराहट के मारे
हम पूरे जोर लगाकर वहां से भागते हुए
और खुद को जागते हुए
चिल्ला कर उठ परते हैं


एक बच्चे के ख्वाबों को हमेशा खुशनामा होना चाहिए

और उसी बच्चे की ख्वाब दर्दनाक होते हैं
उम्र बीतते हुए
वह दर्द वो डर कम होने की वजह
और भी बड़ जाते हैं


नहीं पता समय के बाद वह बच्चे वह व्यक्ति कैसे बन जाते हैं
पर सच यह है कि वह भरोसा करना छोड़ देते हैं


उसे अकेलापन खाता नहीं है
वह जिंदगी से थक जाते हैं
फिर भी जीते रहते हैं


वह खुद से बोड़ हो जाते हैं
फिर भी उनके सांसे चलते रहते हैं


उसे उम्मीद नहीं है किसी से
पर जरा सा उम्मीद
उस इत्तेफाक उस कायनात में है
जो हर किसी की लाइफ में एडजस्ट करता है



वह बुरी यादें के साथ कुछ बच्चे जीना सीख लेते हैं
तो कुछ बच्चे उन यादों से भागते रहते हैं
जिंदगी भर


हर रिश्ते से बचते रहते हैं
जिंदगी में आने वाले हर अचीवमेंट से दूर रहते हैं
यह सोचकर के उसे फिर दर्द ना हो


वह घाऊ जो कभी भरा ही नहीं
उसे कोई खोरोज कर बाहर ना निकल दे


वह बच्चा जो सब कुछ छुपा कर रखा है
ऐसा नहीं है
कि वह समय के साथ ताकतवर हो गया है
सच यह है कि वह अंदर से डरा और सहमा हुआ है


इस दुनिया से इस समाज से अपनों से
यादों से ख्वाबों से वह डरा हुआ है


और यह डर उससे हर रोज तिल तिल मार रहा है
ऐसा नहीं है कि
जो हुआ उसमें उस बच्चों की गलती थी


पर सच इस समाज को सुकारता हुआ नहीं बन रहा

वो बच्चे समाज से डर रहे हैं
और समाज सच से



और यह साइकिल जिंदगी भर चलता रहता है
उस समाज और बच्चे की जिंदगी में
कभी ना खत्म होने वाले दर्द
और कभी ना भरने वाले जख्म
और समाज के कभी ना समझने वाले नासमझ के साथ



गजल


भीड़ है फिर भी तनहा है
दर्द में डुवो वे लम्हा लम्हा है

आखिर अकेला कौन है
और कौन साथ किसका है

दर्द है तो आके कहते हो हम है ना
फिर चिंता किस बात का है
सब साथ सभी का है
तो आखिर में अकेला कौन है


आखिर अकेला कौन है

abhinisha

मोहब्बत करना तो बड़ी दूर की बात

नाम लेने की हिम्मत भी नहीं कर सकते

तुमने उस उम्र में छोड़ा हैं जिसमें हम

माँ से तेरी शिकायत भी नहीं कर सकते..!!

anisroshan324329

सुनो ना…

आज मासिक धर्म पर खुलकर
बात करते हैं...

सुनो ना…

आज उस ख़ामोशी को तोड़ते हैं,
जो हर महीने
एक औरत के दर्द को
शर्म के पर्दे में छुपा देती है।
ये कोई गुनाह नहीं,
ना ही कोई कमजोरी है,
ये तो प्रकृति की वो भाषा है
जिससे जीवन जन्म लेता है।
फिर क्यों फुसफुसाहट में
कहा जाता है इसका नाम..?

फिर क्यों निगाहें झुक जाती हैं,
और सवाल पूछना भी
गुनाह समझ लिया जाता है..?
पेट की ऐंठन,
मन की थकान,
और चेहरे पर मुस्कान ओढ़े
दुनिया निभा लेना...
क्या ये कम हिम्मत की बात है..?

सुनो ना…

आज सिखाओ बच्चों को
कि ये “गंदा” नहीं,
बल्कि “ज़रूरी” है।
आज कहो सबको
ये तो औरत होने की
सबसे सच्ची पहचान है।
चलो आज
खुलकर बात करते हैं,
क्योंकि जब बात होगी,
तभी समझ बढ़ेगी,
और जब समझ बढ़ेगी
तभी सम्मान मिलेगा...!!

एक सच्चाई है ये इस लिए सोच बदलो मर्दों ♥️♥️♥️♥️✍️✍️✍️✍️
❤️💯🔥✍️

mystory021699

कोई एक ऐसा भी है जो मेरी काबिलियत को समझ सका

थोड़ी ही मगर वो हमारी असलियत को समझ सका

दिल से धन्यवाद है उस इन्सान का

जो हमारी लिखावट को काफी लोगो तक पहुचाने की कोशिश कर सका ।
♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️writer bhagwat singhnaruka ✍️

mystory021699

कान्हा…
अब थक गई हूँ हर बार खुद को समेटते-समेटते… 💔
तुम दूर जाते हो
और मैं फिर भी तुम्हारे लौट आने की दुआ करती हूँ…
शायद यही राधा का प्रेम है—
टूटकर भी सिर्फ कृष्ण को चाहना। 🌙
“अब दर्द भी तुम्हारा लगता है कान्हा,
और सुकून भी तुम ही हो…
कैसे छोड़ दूँ उस मोहब्बत को,
जिसमें मेरी पूरी रूह बसती हो…” 💙

parmarsantok136152

बुंदेली दोहा प्रतियोगिता -268
दोहा दिवस दिनांक-16.5.2026
प्रदत्त शब्द #अनयाव (अन्याय)
प्राप्त प्रविष्ठियां:-

1
मचा हुआ अन्याव है,अब तो चारों ओर।
कोई कुछ नइं कर रहा,मचा रहे बस शोर।।
*
- वीरेन्द्र चंसौरिया टीकमगढ़
2
हड़प रहे जांगा जमीं,करबैं निसदिन घात।
अनयाव राजई करें,कितै जोरबैं हात।।
*
-प्रदीप खरे 'मंजुल',टीकमगढ़
3
गय अतीक अनयाव कर , मर गय दुबें विकास ।
किलन चेंपला मूँत रय,देखो होगइँ नाश।।
*
-प्रमोद मिश्रा बल्देवगढ़
4
बड़े बड़े न्यालय बने, सिस्टम बड़ौ बनाव।
न्याव मिलो ना वक़्त पै, जौइ बड़ौ अनयाव।।
*
-अरविन्द श्रीवास्तव,भोपाल
5
छल अनीत अनयाव जे, औगुन के सब नाम।
कीरत माटी में मिलत, बुरै देत अंजाम ।।
*
-विद्या चौहान, फरीदाबाद
6
करौ काउ के संग में, जीनें भी अन्याव।
विपदा भोगी ओइ नें, करनी कौ फल पाव।।
*
- अंजनी कुमार चतुर्वेदी निबाड़ी
7
जब-जब असुरन नें करो, धरती पै अनयाव।
विविध रूप धर विस्नु नें,उनकौ मान घटाव।।
*
-गोकुल प्रसाद यादव, नन्हींटेहरी
8
सहो बिभीसन भाइ को, जब खूबइ अनयाव।
सरन गही सिरि राम की, कुल को नास कराव।।
*
-तरुणा खरे'तनु' जबलपुर
9
जीत रई नित न्याय की , हारत रय अनयाव।
सौ भाई सोए समर, कौरव के कुनयाव।।
*
-आचार्य रामलाल द्विवेदी प्राणेश,चित्रकूट
10
कभउॅ॑ किसी के स॑ग मे॑,करियौ नै अन्याव।
साजौ कोई ना बनै॑,बुरव न रखियौ ख्वाब ।।
*
-शोभारामदाॅ॑गी"इ॑दु,न॑दनवारा
11
जब तक जा धरती रहो,करियो मत अन्याव।
मूरत भूले सें कभी,बुरो न होय तुमाव।।
*
-मूरत सिंह यादव दतिया
12
मार -मार भाँनेज सब, कंश करौ अन्याव।
किशन जन्म लै जेल में ,मम्में मार गिराव।।
*
-एस आर 'सरल',टीकमगढ़
13
रचो चक्रव्यू द्रोण ने, भओ बड़ो अनयाव।
अभिमन्यू से शूर खों,जुर मिल मार गिराव।।
*
-आशा रिछारिया,निवाड़ी
14
राजा होके जो करत,जनता पै अनयाव।
रैयत ऊँकी जान लो, देत न ऊखों भाव।।
*
-सुभाष सिंघई, जतारा
© संयोजक राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'
आयोजक जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़

rajeevnamdeoranalidhori247627

मन मारने की आदत लग जाए तो
फिर ख़्वाब मारते वक्त हाथ नहीं कांपते

anisroshan324329

झील से गहरे तुम्हारे दो नयन,
चाँदनी ओढ़े है सोने का बदन,
मैं तुम्हारे प्राण में हूँ इस तरह,
जैसे ही सुरभित चंदन का वन।

साँस मेरी तेरी साँसों से मिली,
ज्यूँ मिली फूलों से तितलियाँ,
मैं तुम्हारे रूप गंध में भींगा हुआ,
कर रहा भ्रमरों की तरह गुंजन ।

तुम बसी मेरे हृदय में इस तरह,
जैसे सागर में छिपी कोई लहर,
जैसे मोती हो छिपी हुई सीप में,
जैसे फूल पर बिखरी ओस कण।

प्रशस्त करती तुम मेरा पथ प्रिये,
प्राण को देती हो तुम आराम भी,
तुम मेरे दिल की हो धड़कन प्रिये,
तुम से ही विश्राम पाता मेरा मन ।


Das vijju,,,,,,,

dasvijuu

१. समानता बनाम दासता
​"सच्चा प्रेम समानता में जन्मता है, डर और दासता में नहीं।"
​भक्ति मार्ग में अक्सर एक दूरी पैदा कर दी जाती है—'भगवान ऊँचे आकाश में हैं और भक्त पाताल की धूल है।' लेकिन मित्रता इस दूरी को मिटा देती है। सुदामा द्वारिका के वैभव को देखकर डरे नहीं, और कृष्ण अपनी सत्ता के मद में अंधे नहीं हुए। जहाँ दो लोग पूरी तरह नग्न मन से, बिना किसी मुखौटे के एक-दूसरे के सामने खड़े हो सकें, वहीं सच्ची मैत्री है।
​२. सिंहासन का झुकना और पैर धोना
​कथा का सबसे सुंदर विश्लेषण यही है कि सबसे बड़ा दृश्य कोई चमत्कार (जैसे सुदामा की झोपड़ी को महल बना देना) नहीं था, बल्कि कृष्ण का सुदामा के पैर धोना था।
​यहाँ राजा, रंक के सामने झुक रहा है।
​यहाँ ऐश्वर्य, सादगी के सामने नतमस्तक है।
​यह इस बात का प्रमाण है कि प्रेम में कोई 'पदानुक्रम' (Hierarchy) नहीं होता।
​३. दृष्टि ही संबंध तय करती है
​"जो प्रेम से आया, उसके लिए वे मित्र हैं। जो भय से आया, उसके लिए भगवान बन गए।"
​यह बात श्रीमद्भगवद्गीता और कृष्ण के पूरे चरित्र को समझने की कुंजी है। कंस ने उन्हें भय से देखा, तो वे काल बन गए। शिशुपाल ने ईर्ष्या से देखा, तो वे शत्रु बन गए। गोपियों और अर्जुन ने उन्हें प्रेम और सखा भाव से देखा, तो वे उनके सारथी और प्रेमी बन गए। कृष्ण एक दर्पण की तरह हैं—आप उनके सामने जो भाव लेकर जाएंगे, आपको वही रूप दिखाई देगा।
​४. अद्वैत की सुगंध
​“कृष्ण जानते थे कि सुदामा भी मैं ही हूँ।”
​यही वेदांत का चरम बिंदु है। जब तक 'मैं' और 'तू' का भेद है, तब तक द्वैत है, भय है, याचना है। लेकिन जैसे ही यह बोध होता है कि "तत्वमसि" (वह तुम ही हो), वैसे ही माँगने की इच्छा समाप्त हो जाती है। सुदामा कृष्ण के पास कुछ माँगने नहीं गए थे, और कृष्ण ने भी बिना माँगे सब कुछ दे दिया, क्योंकि अपने ही दूसरे रूप (सुदामा) को अभाव में देखना कृष्ण के लिए खुद को अभाव में रखने जैसा था।
​निष्कर्ष
आपने बिल्कुल सही कहा कि बाद के युगों ने 'भय' मिश्रित भक्ति को बढ़ावा दिया क्योंकि डरे हुए व्यक्ति को नियंत्रित करना आसान होता है। लेकिन कृष्ण और सुदामा की यह कथा हमें याद दिलाती है कि अध्यात्म का अंतिम लक्ष्य दास बनना नहीं, बल्कि सखा बनकर उस परम चेतना के साथ एक हो जाना है। यह 'वेदांत २.०' की एक बहुत ही प्रगतिशील और सुंदर व्याख्या है।

bhutaji