तुम क्या चाहती हो?
मुझसे कभी पूछा ही नहीं गया,
"बोल, तू क्या चाहती है?"
क्यों मेरी ज़िंदगी के फैसले,
हमेशा दूसरे ही बनाते हैं?
सपने तो मेरे हैं,
फिर भी किसी और के हाथों बुनते हैं।
मैं बस देखती रहती हूँ
खुद से पूछती हूँ,
"आखिर तू क्या चाहती है?"
हाँ, अगर सच में चाहने दिया जाए...
तो सुनो, मुझे क्या पसंद है
मुझे पानी की लहरों सा बहना पसंद है,
हर तालाब, हर नदी, हर समंदर की
गहराई को छूना पसंद है।
मुझे सूरज की किरणों सा चमकना पसंद है,
हर गली, हर गाँव, हर शहर के
अंधेरों से गुज़रना पसंद है।
मुझे टूटे सपनों को सीना पसंद है,
हर दर्द, हर दीवार, हर "ना-मुमकिन" को
जीत में बदलना पसंद है।
बस इतनी सी ख्वाहिश है मेरी,
कोई बड़ी बात नहीं
मुझे बस... मैं रहना पसंद है।
वोही जो मैं हूँ, वही बने रहना पसंद है।
प्राची तंवर