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જયશ્રી કૃષ્ણ "માં શૈલપુત્રી ની આરતી , નામા વાલી અને માં ની વાર્તા "મારી રચના લઈને આવી રહી છું પ્રેમ આપશો એવી આશા યુટ્યુબ લિંક કમેન્ટ માં મળી જસે

• #MaaShailputri
• #NavratriDay1
• #માંશૈલપુત્રી
• #નવરાત્રિ૨૦૨૬
• #NavratriSpecial

desaimansi547624

क्षमा कीजिए, यह कहानी मैंने पहले ओड़िया में लिखी थी, इसलिए आप सभी इसे समझ नहीं पाए। अब उसी कहानी का हिंदी अनुवाद आपके सामने है। आशा है, इस बार यह कहानी आपके दिल तक ज़रूर पहुँचेगी। 🤍

एक गाँव के नदी किनारे एक गरीब लड़की रहती थी—काशपुष्प (कांशतंडी)। सरल चेहरा और शांत स्वभाव वाली वह लड़की एक दिन राजकुमार शरद की नज़रों में आ गई।

धीरे-धीरे नदी किनारे दोनों की मुलाकात होने लगी। कोई बड़ा वादा नहीं था, बस दोनों के बीच एक सरल-सा प्रेम पनप रहा था।

लेकिन राजा ने इस संबंध को स्वीकार नहीं किया। शरद को राजमहल ले जाया गया और काशपुष्प को उसी नदी किनारे मार दिया गया।

कहा जाता है, जाने से पहले काशपुष्प ने कहा था—
“हर साल शरद ऋतु आने पर, मैं इसी नदी किनारे तुम्हारा इंतज़ार करूँगी।”

कुछ दिनों बाद, काशपुष्प को खोकर शरद ने भी अपने प्राण त्याग दिए।

आज भी लोग कहते हैं, बारिश खत्म होकर जब शरद ऋतु आती है, तो नदी किनारे खिलने वाले सफेद काशपुष्प (कांशतंडी) काशपुष्प के उसी इंतज़ार का प्रतीक हैं। 🌾🤍

~अनामिका ✍️

niharikabehera251459

ममता गिरीश त्रिवेदी की कविताएँ✍️

mamtagirishtrivedi740648

ना शिकवा था लबों पर, ना कोई दिखावा था,
हाथों में जलती लौ थी, कलाई पर लाल कलावा था।
वो चुपचाप नदी के तट पर, जाने क्या लिख रही थी,
एक नन्हे से दीपक में, शायद पूरी दुनिया रख रही थी।

नदी की बहती लहरें भी, पल भर को ठहर-सी गईं,
जब उसकी हथेली से कुछ सुनहरी किरणें उतर सी गईं।
वो दीप नहीं था केवल, कोई ख़्वाब बह रहा था,
अँधेरी रात के सीने में, कोई जवाब बह रहा था।

कलाई पर बँधा वो धागा, अटूट विश्वास की निशानी था,
हथेली से छूटा वो दीपक, किसी मासूम मन्नत की कहानी था।
लहरों ने भी बड़े अदब से, उसे अपने आगोश में लिया था,
जैसे उस नन्हे चिराग़ से, सदियों पुराना कोई रिश्ता रहा था ।

झुकी पलकों के साये में, अटूट यक़ीन समाया था,
शीतल जल के दर्पण पर, उसका चेहरा नूर बन आया था।

दूर तलक वो दीपक फिर, लहरों के संग बहता गया,
रात के गहरे सन्नाटे में, उम्मीद का रंग भरता गया।
जो बात लबों तक आकर भी, कभी न जा सकी कही,
वो बात उस जलते दीये ने, सीधे नदी से जाकर ही कही ।

कुछ ख़्वाब थे जिन्हें उसने, उस रोशनी के साथ बहाया,
कुछ नाम थे जिन्हें उसने, अपनी दुआओं में छुपाया।

और जब वो दीपक आँखों से, दूर कहीं खो गया,
न जाने क्यों लगा मुझे—
जैसे उसका अपना कोई,
उसके दिल के और क़रीब हो गया।

दृश्य: घाट के दूसरी तरफ़ से 🌊🪔
Credit : किसी की तस्वीर 😊

shivamdhuriya291955

Final quote

kattupayas.101947

Want to change the world?

kattupayas.101947

This quote I always remember

kattupayas.101947

"चाय ठंडी होने से पहले पी लो, मौका भी वैसे ही होता है।"

good evening 🌆
Dharmendra Kumar

erdharmendra

Meditation: A Moment to Pause, Relax & Care for Yourself
In today’s fast-paced life, our eyes are constantly engaged — from smartphones and computers to reading, driving and everyday activities. Along with our body and mind, our eyes also need moments of rest.
Meditation can be a simple way to pause, slow down and become more mindful of our overall well-being. Taking a few quiet minutes to breathe calmly and step away from screens can help us create a healthier daily routine.
Meditation should not be seen as a treatment for an eye disease, but mindfulness and regular breaks from prolonged screen use can be part of healthy eye-care habits.
Dr. Anchal Gupta’s Message
“We often remember to care for our eyes only when they begin to trouble us. Eye care should also be about prevention, awareness and giving ourselves time to pause. A few moments of calm each day can remind us to listen to our body, reduce unnecessary screen exposure and make healthier choices.”
Taking care of your eyes is not only about seeing clearly today — it is about protecting your vision for the years ahead.
Pause. Breathe. Relax. Give your eyes and mind a moment to rest.
— Dr. Anchal Gupta

bhumikabhati.662947

મારું ઘર,મારું ગામડું,મારું ખેતર પરિવાર,
પ્યારાં માં-બાપ,છોડી આવ્યો છું,શહેરમાં !
એ નદી એ ઝરણાં,ગલીઓ,તડકો,છાંયડો
એ શીતળ છાંયો છોડી આવ્યો છું,શહેરમાં !!
વાંકી-ચૂંકી ગલી,ચરતાં પશુ પગની ખરીઓ !!
ગોફનણ ગોળા છોડી આવ્યો છું,શહેરમાં.
હાથમાં ભાત,ખભે ધારિયું,માથે બાંધ્યું ફાળિયું!
ચામ ચમકતી મોજડી છોડી આવ્યો છું શહેરમાં.
પહેરતો'તો સૂથણો એકજ ખેંસીયુ,એકજ ખમીસ!
થેલો,એક જોડી કપડાં,લઇ આવ્યો છું,શહેરમાં.
ભાઈ-બહેન,ભાઈબંધ,શેરી મિત્ર સવા સો !
એક જ પ્યારી પ્રિયા છોડી આવ્યો છું શહેરમાં.
સાંભરે નવરાત્રીની રાતો,અંધારી આઠમનો કાનુડો!
હોળી-ધૂળેટી,દિવાળી છોડી આવ્યો છું શહેરમાં.
- સવદાનજી મકવાણા (વાત્ત્સલ્ય)

savdanjimakwana3600

મિલન
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હું ક્યાં ને,? તું ક્યાં ?
શક્ય ક્યાં હતું.મિલન આપણું.
રહેવું મારું ગામડે.
વસવાટ તારો મોટાં શહેરમાં.
વિરોધી જો ને,! એકબીજાનાં.
ગામડાને,ગમે નહીં શહેર.
ગમે નહીં શહેરને ગામડું.
કેમ થાય મિલન આપણું.?
હશે પરભવની લેણદેણ,
જો ને,મળ્યાં હું ને તું ......
છોડ,નકશાનાં વિસ્તારને.
આ ધરતી ને,આકાશ આપણું.
જીવવું સાથે,મારવું સાથે.
આ કબર,આ જગત આપણું.
નીકળે ભવોભવની લેણદેણ.
મળશું હરભવ આ જગ આપણું.
ભલે ન નીકળે પ્રેમ. કે ન નીકળે નફરત.
નીકળે જો લેણદેણ.
મળવું ને મળવું. શક્ય છે આપણું.
નર્ક આપણું,સ્વર્ગ આપણું.
હોય સ્થળ ગમે તે.
તો મળશું ને જરૂર મળશું.
યમલોક ને મૃત્યુલોક આપણુ.
🖊️જયા.જાની.તળાજા"જીયા"

davejayaben809394

वो मुझे कहती थी
में तुम्हारे बगैर नहीं रह सकती
अब 2 महीने से आईडी बंद कर के गायब है

कही कुत्ते की मौत मर तो नहीं गई

anisroshan324329

તમારા મંદ હાસ્યના દિવાના બની ગયા, દિવસે ચાંદ તારાં જાણે ચમકી ગયાં,
ટકાવી રાખજો આ દોલત ચહેરા પર,
લૂંટાવી ના દેતા કોઈ અંજાન ઉપર.

nura2312

रिश्ते खून से नहीं, भरोसे, समझ और अपनापन से मजबूत होते हैं।
जो बिना कहे मन की बात समझ ले और मुश्किल वक्त में बिना बुलाए साथ खड़ा हो जाए, वही रिश्ता सबसे खूबसूरत होता है।

ankitkhatri900231

मेरी दादी
​मीनू और सकीना: रूह का रिश्ता

यह कहानी एक ऐसे रिश्ते की है जो वक्त, दूरी और इस दुनिया की सरहदों से भी परे है। कुछ लोग सिर्फ हमारी जिंदगी का हिस्सा नहीं होते, बल्कि हमारे वजूद का हिस्सा बन जाते हैं…
​
सितंबर का वह महीना अपनी ऐसी तीखी धूप लिए आता था जो मासूमियत को भी चुभती थी, और दिन की गर्मी जून की तरह कंधों पर बोझ बन कर बैठ जाती थी। इसी ताप्ते मौसम में एक रात, सकीना के घर उनकी पोती, मीनू का जन्म हुआ। पुरानी सोच के दायरों में बांधी दुनिया की तरह सकीना की भी यही ख्वाहिश थी कि उनके घर पहले पोता आए, पर चाहत और किस्मत के फैसलों में जमीन-आसमान का फर्क होता है। आखिरकार, उन्हीं के घर मीनू के रूप में एक ऐसी बरकत उतरी जिसने सभी की सोच को बदल दिया।
​कई दिनों तक सकीना मीनू से खफा-खफा सी रहीं। लेकिन कोई चाहे कितना भी रूठना चाहे, एक मासूम बच्चे के चेहरे की बे-गुनाही के आगे किसकी चलती है? फिर वह तो उनकी अपनी ही खून, उनकी पोती थी। उधर, सकीना की बहू की तबीयत दिन-ब-दिन गिरने लगी, और इधर भूख से बिलखती मीनू को देखकर आखिरकार सकीना का दादी दिल पिघल गया। जब उन्होंने पहली बार मीनू को अपनी कांपती गोद में उठाया और अपने हाथों से दूध पिलाया, तो जैसे सकीना का सारा गुस्सा और शिकवे मीनू के उन मासूमंसुओं के साथ ही बह कर निकल गए।
​धीरे-धीरे ही सही, सकीना और मीनू के दरमियान की यह दूरी मिटने लगी। वक्त गुजरता गया और मीनू जब छह महीने की हुई, तो वह सकेना की जिंदगी का एक लाजिम हिस्सा बन चुकी थी। मीनू को अब अपनी मां की गोद से ज्यादा अपनी दादी की गोद में सुकून मिलता था, और सकीना भी अपनी इस छोटी सी पोती को हमेशा सीने से लगा कर रखती थी। जब मीनू ने लड़खड़ाते कदमों से चलना सीखा, तो सकीना का आंचल ही उसका सहारा था—वही आंचल पकड़-पकड़ कर वह न सिर्फ पूरे घर में, बल्कि पूरे गांव की गलियों में घूमती रहती थी।
​अगर सकीना खेत की तरफ जाती या किसी रिश्तेदार के यहां, तो मीनू भी साये की तरह उनके साथ ही होती। सकीना की बस एक ही कोशिश होती थी—वह मीनू को दुनिया की हर दुख-तकलीफ से बचा कर हमेशा अपने आंचल की छाया में महफूज रखें। लेकिन वक्त के बहाव के आगे भला किसका जोर चला है? जब मीनू की उम्र तालीम हासिल करने और स्कूल जाने की हुई, तो उसे पहली दफा और एक लंबे वक्त के लिए अपनी दादी के इस गर्म-छांव साये से दूर जाना पड़ा।
​एक बच्चे के मुकाबले उस इंसान के लिए यह जुदाई कहीं ज्यादा दर्दनाक होती है जो उसे अपने आंचल के हिफाजती घेरे में रखता है। मेनु के पास तो स्कूल में दूसरे बच्चों का साथ और नई दुनिया थी, लेकिन सकीना के आंचल से तो उनकी जान, उनकी पोती ही रुखसत हो रही थी। सकीना ने ऊपर से हंसते हुए मीनू को शहर के लिए अलविदा कहा और प्यार से समझा-बुझा कर तैयार किया, लेकिन उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि वह मेनु के बिना अपने इस सून-ए-मन्न को कैसे संभाल पाएंगी।
​शहर पहुंच कर मीनू दिन भर स्कूल की पढ़ाई और दोस्तों के साथ खेलने में मशरूफ रहती, पर जैसे ही शाम ढलती, उसकी मासूम आंखें बस अपनी दादी को ढूंढने लगती थी। वह चाहती थी कि बस एक बार दादी के सीने से लग कर वैसी ही नींद आए और दिन भर का दुख उनके आगे रो कर बांट सके। पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था; उनका अलग होना तय हो चुका था।
​वक्त के साथ-साथ दोनों को इस जुदाई की आदत पड़ने लगी। मीनू को आदत तो हो गई, पर उसके अंदर एक खामोशी उतर आई थी। दादी के बिना अब वह पहले की तरह बे-बाक नहीं बोलती थी। अगर कभी स्कूल में कोई चोट लगती या दिल पर कोई तकलीफ गुजरती, तो वह किसी से कुछ नहीं कहती थी; बस चुपचाप अकेले में जी भर कर रो लेती और हर पल बस अप्रैल के आने का इंतजार करती रहती थी।
​और यहां सकीना भी मीनू के घर लौटने के दिन गिनती रहती थी। उसके आने की खुशी में सकीना ने पहले से ही ढेर सारे मनपसंद खाने के सामान जोड़ कर रखने शुरू कर दिए थे। अप्रैल से जून तक के ये दो महीने उस जलती हुई गर्मी में भी सकेना और मीनू के लिए किसी ठंडक से कम नहीं होते थे। वही पुराना सिलसिला एक बार फिर जिंदा हो जाता—रात को दादी के साथ सोना, उन्हीं से पुरानी कहानियां सुनना, सुबह दादी के दस बार आवाज देने पर भी बिस्तर न छोड़ना, और पूरा दिन दादी का आंचल पकड़ कर उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमना।
​मीनू को दादी के हाथ की हर चीज से बे-पनाह मोहब्बत थी, पर दादी के हाथों की बनी प्याज की चटनी उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी, जिसे सकीना भी बड़ी चाह से रोज बनाया करती थी। यही सिलसिला चलते-चलते जाने कितने साल बीत गए। बड़ी होती हुई मीनू को अब आगे की पढ़ाई के लिए किसी दूसरे शहर के कॉलेज जाना था।
​शहर और गांव की लंबी दूरी ने अब सकीना और मीनू के दरमियान भी एक गहरा फासला खड़ा कर दिया था। उम्र के इस पड़ाव पर खड़े होकर बूढ़ी होती सकीना को अब फोन की आवाज भी साफ सुनाई नहीं देती थी, और मीनू के लिए भी अब पहले की तरह बारंबर गांव आना मुमकिन नहीं रहा था। जब भी कोई शहर से गांव आता, सकीना की थकी और बूढ़ी आंखें बस मीलों दूर से मीनू को खोजती और हर आने वाले से एक ही सवाल पूछती, "मीनू नहीं आई?"
​जब मीनू नहीं पहुंच पाती थी, तो सकेना के चेहरे और उनके कमजोर मन पर एक ऐसी गहराई वाली उदासी छा जाती थी जो उन्हें पल भर में और ज्यादा बूढ़ा कर देती थी। उन दिनों सकीना की बस एक ही आखिरी ख्वाहिश बची थी—मीनू की शादी देखना। पर मीनू अपनी पढ़ाई और सपनों को पूरा करना चाहती थी।
​अब दोनों की मुलाकातें सालों में बस एक-दो दिन के लिए सिमट कर रह गई थीं। और यह एक-दो दिन भी ऐसे होते थे जैसे सकीना फिर से थोड़ी जवान हो गई हो और मीनू एक बार फिर से वही छोटी सी बच्ची बन गई हो। मीनू को सकीना के आगे कभी कुछ बनने की या खुद को बदलने की जरूरत नहीं पड़ती थी—वह बस मीनू रहती थी, सकीना का आंचल पकड़ने वाली वही मासूम पोती।
​वक्त अपने नियम के मुताबिक चलता गया और सकीना की उम्र के साथ उनकी सेहत भी कमजोर पड़ने लगी। बीमारी ने जब उनके जिस्म को पूरी तरह जकड़ लिया और तबीयत में कोई सुधार नहीं आया, तो उन्हें मजबूरन हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा। उस उम्र और बे-धड़क बीमारी के कहर में सकेना अपने बाकी परिवार के चेहरे तक भूल चुकी थी, पर एक नाम था जो उनके होठों और उनकी रूह पर अब भी ताजा था—मीनू। शायद यह नाम उनकी आखिरी सांसों का भी हिस्सा बन चुका था।
​जब कुछ हालत संभली और डॉक्टर ने उम्मीद छोड़ते हुए उन्हें घर ले जाने की सलाह दी, तो सकीना को वापस ले आया गया। घर आने पर उनकी बहू, पोतों और बच्चों ने उनकी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन जब सकीना दर्द से कराहती, तो उनसे ज्यादा तड़प मीनू के दिल में मच जाती थी।
​एक शाम सकीना ने बड़े जिद्दो-भर लहजे में गुड़ से बने मीठे चावल खाने की ख्वाहिश जाहिर की। सकीना को हमेशा से मीनू के हाथ के बने मीठे चावल सबसे ज्यादा पसंद थे। मीनू ने बिना वक्त गंवाए, बड़े प्यार से वह चावल बनाए और अपने कांपते हाथों से दादी को खिलाए। उस वक्त मीनू के जेहन में यह ख्याल तक नहीं आया था कि वह अपनी दादी को जिंदगी का आखिरी निवाला खिला रही है।
​बीमारी के आखिरी दौर में सकीना बिल्कुल एक छोटे बच्चे की तरह हो गई थीं—जिसे जो चीज चाहिए, वह बस उसी वक्त चाहिए होती थी। इसी बचकानी जिद के चलते उन्होंने गांव जाने की जिद पकड़ ली, शायद इसलिए भी क्योंकि उनकी रूह मीनू के इस मोह और प्यार से बंधी हुई थी। और मीनू भी कहां मानने वाली थी; वह भी दादी का हाथ ऐसे थामे रखी थी मानो अपनी इस पूरी दुनिया को कहीं जाने ही न देना चाहती हो।
​फिर एक सुबह, अचानक पांच बजे मीनू का फोन रिंग हुआ। गांव से आती उस कॉल को देखकर मीनू का दिल एक पल के लिए बैठ गया। कांपते हाथों से फोन उठाते ही दूसरी तरफ से एक सिसकती हुई आवाज ने वह सच बोल दिया जिसे सुनने की ताकत मीनू के पास नहीं थी—दादी अब नहीं रहीं!
​मीनू ने बस इतना कहा, "हम निकलते हैं," और फोन रख दिया। वह किसी गहरे और सुन्न सदमे में उतर चुकी थी जहां बाहर की दुनिया की कोई आवाज नहीं पहुंच रही थी। वह इस कौरवे सच को अपने दिल में उतारने के बजाय उसे गलत साबित कर देना चाहती थी। बिना किसी से एक लफ्ज बोले, बिना एक भी आंसू बहाए, वह खामोशी से अपनी पैकिंग में जुड़ गई।
​गांव पहुंच कर देखा तो घर के अंदर और बाहर एक ऐसा बोझ-हल सन्नाटा छाया हुआ था जो चीख-चीख कर बता रहा था कि अब वह इस घर में अकेली पड़ चुकी है। दरवाजे की देहरी पर आकर उसके कदम ठिठक गए। चारों तरफ अपनों को रोते देख कर उसने अपने कदम तेज कर दिए। पहले जब भी वह यहां आती थी, तो "दादी, दादी" पुकारती हुई सीधे उनके कमरे की तरफ दौड़ती थी। लेकिन आज, इस बार, वह दादी के कमरे से बचते हुए, आंगन को पार करके सीधे घर के सबसे पिछले वाले कमरे में चली गई और खुद को किसी काम में उलझा लिया।
​मीनू आज अपने हिस्से का हर काम खुद कर लेना चाहती थी, शायद इसलिए क्योंकि वह सबकी तरस खाई हुई नजरों से बचना चाहती थी, या फिर सच तो यह था कि वह खुद से ही भाग रही थी। तभी उसकी बुआ ने आगे बढ़ कर मीनू को अपनी बाहों में कस लिया और रोते हुए बोलीं कि अब उनकी दादी नहीं रहीं। उस एक आगोश के साथ ही मीनू का वह आखिरी सहारा भी बिखर गया जिसे वह अपनी ताकत मान कर बैठी थी, और उसके साथ मीनू का अंदर का घबराया हुआ बच्चा भी टूट गया।
​वह बेतहाशा फूट-फूट कर रोने लगी, बिल्कुल वैसे जैसे एक छोटा बच्चा अपनी मां के बिछड़ने पर बिलखता है। सबकी आंखें नम थीं, सबके दिल में बस एक ही सब्र था कि आखिरकार दादी को इस लंबी तकलीफ और दर्द से आजादी मिल गई। मीनू भी इस सच से अनजान नहीं थी कि अब दादी को तकलीफ नहीं होगी, पर वह अपने इस नादान दिल को यह कैसे समझाए कि अब दादी सचमुच कभी लौट कर नहीं आएंगी, और न ही कोई उसे कभी प्यार से चुप करवाएगा।
​जब सकीना को आखिरी अलविदा कहने के लिए पूरा परिवार और सभी रिश्तेदार इकट्ठे हुए, तो मीनू बिना पलक झपकाए बस एक-टक अपनी दादी को देखे जा रही थी। वह उनके चेहरे की हर लकीर को अपनी आंखों में हमेशा के लिए कैद कर लेना चाहती थी ताकि वह उनसे कभी जुदा न हो सकें।
​और जब सकीना का जनाजा घर से रुखसत हुआ, तो हर कोई इस दर्द में रो रहा था कि उनके सर से किसी की मां, किसी की दादी, तो किसी की भाभी का साया उतर गया है। लेकिन मीनू का दिल चीख-चीख कर उसे यह अहसास करवा रहा था कि उसके सर से सिर्फ एक साया नहीं, बल्कि वह हिफाजत छिन गई है जो उसे कभी बड़ा होने ही नहीं देना चाहती थी।
​एक ही पल में मीनू सब के बीच रह कर भी दुनिया की सबसे अकेली और लाचार लड़की बन चुकी थी। उसे लग रहा था कि दादी की गोद, बच्चों की तरह उनसे लड़ना-झगड़ना, उनकी डांट और वह बेशुमार प्यार सब कुछ एक ही लम्हे में उससे छिन गया है और उसे जबरदस्ती एक समझदार और अकेली औरत बना दिया गया है—क्योंकि अब वहां कोई नहीं बचा था जिसके सामने वह बे-खौफ होकर बच्चों की तरह जिद कर सके, मनमर्जी कर सके।
​धीरे-धीरे दिन ढल गया और एक-एक कर सभी रिश्तेदार अपने घरों को लौट गए। तन्हा बैठी मीनू बस चारों तरफ अधूरी नजरों से दादी को ढूंढ रही थी। आज मीनू की इन थकी आंखों में दूर-दूर तक नींद का कोई नाम-ओ-निशान नहीं था। उसके अंदर एक अनजाना सा डर बैठा था—अगर वह सो गई और सुबह उठ कर दादी को वहां न पाई, तो वह इस दर्द को कैसे सहेगी?
​बरसों से यही तो दस्तूर चला आ रहा था कि गांव आने के बाद जब भी मीनू सोती थी, दादी हमेशा उनके पास बैठी रहती थीं ताकि जब मीनू की आंख खुले और वह दादी को सामने न पाए, तो किसी डर से घबरा न जाए। बचपन में यह उसकी हिफाजत थी, और बाद में यह सकीना की एक आदत बन चुकी थी। पर आज, पहली बार, मीनू बिल्कुल अकेली थी।
​आखिरकार मीनू ने धीरे-धीरे अपने दिल को इस कदरत-ए-खुदा के आगे झुकाने की कोशिश की और खुद को समझाया कि शायद उनकी दादी की रूह को सुकून इसी आजादी में मिल सकता है। उसने उनके लिए दुआ मांगी, ताकि वह जहां भी हों, सुकून से रहें।
​लेकिन उसके बाद एक अजीब सा सिलसिला शुरू हुआ। उस दिन के बाद से मीनू के पैरों में एक अनोखा और गहरा दर्द बैठ गया—एक ऐसा दर्द जो बड़े से बड़े इलाज और दवाइयों के बाद भी ठीक होने का नाम नहीं ले रहा था। जब भी मीनू को वह दर्द हद से ज्यादा तकलीफ देता, सकीना अक्सर उसके सपने में चली आती और प्यार से अपना ख्याल रखने और किसी अच्छे डॉक्टर से इलाज करवाने की हिदायत देती। यह सिलसिला लगातार छह महीने तक चलता रहा, और हर बार सपने में दादी को देख कर मीनू को एक सुकून सा मिल जाता कि कम से कम उनकी दादी उन्हें छोड़ कर कहीं दूर नहीं गई हैं, वह आज भी उनसे मिलने आती हैं।
​आखिरकार, एक रोज डॉक्टर ने मीनू को सर्जरी करवाने की आखिरी सलाह दी। यह कोई आम सलाह नहीं थी, बल्कि उसके पैर के उस पुराने दर्द से हमेशा के लिए नजात पाने का एक ही रास्ता था, क्योंकि मीनू का लिगामेंट अंदर से पूरी तरह डैमेज हो चुका था। अगली ही सुबह मीनू का ऑपरेशन होना तय था।
​उस रात, एक बार फिर सकीना खामोशी से मीनू के सपने में आईं। लेकिन इस बार उन्होंने मीनू को कोई नसीहत या हिदायत नहीं दी; वह आईं, बिना एक लफ्ज बोले मीनू को अपनी बाहों में कस कर गले लगा लिया और चुपचाप वहां से चली गईं। मीनू घबरा कर उस सपने से जाग गई, पर हम सब जानते हैं कि सपने हकीकत की तरह रुकते नहीं हैं—हम चाहे जितनी भी कोशिश कर लें, उस गुजरे हुए लम्हे या सपने में वापस नहीं लौट सकते। मीनू भी चाह कर उस दरवाजे पर फिर नहीं जा सकी।
​अगली सुबह मीनू की सर्जरी सफल रही और वक्त के गुजरने के साथ उसका वह दर्द भी हमेशा के लिए उसकी जिंदगी से रुखसत हो गया। पर उसके साथ-साथ सकीना भी हमेशा के लिए चली गईं। उस रात के बाद से सकीना कभी दोबारा मीनू के सपने में नहीं आईं—मानो सकीना सिर्फ और सिर्फ आखिरी बार अपनी पोती को उस फिजिकल और रूहानी दर्द से महफूज करने और उसको विदा करने आई थीं, और जब उसके पैर का दर्द हमेशा के लिए मिट गया, तो दादी का यह फर्ज भी पूरा हो गया।
​एक एहसास
​“कुछ रिश्ते वक्त और जिस्म के दायरों से कहीं ज्यादा आगे के होते हैं... यह वह पक्का और अनमोल बंधन है जो सांसें थम जाने और दुनिया बदल जाने के बाद भी कभी कमजोर नहीं पड़ता।”
☆अनामकारा

anamcara397gmail.com353208

जो मुजरा आज online पे मुफ्त में देख रहे हो न,

वो देखने के लिए कुछ समय पहले लोगों को जमीन जायदाद तक बेचना पड़ता था।


समय समय की बात है

anisroshan324329

कर्जदार हूं में अपने पिता की....!!
जिसने झाड़ू बर्तन नहीं, ✍️ कलम पकड़ाई।

kalpanasatav823113

वो घरौंदे बनाना, बनाके मिटाना
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी
वो ख्वाबों खिलौनों की जहाँगीर अपनी
ना दुनिया का गम था न रिश्तों का
बंधन ...
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िंदगानी ......
भुलाये न भूल सकता हैं कोई ...
वो कागज की कश्ती वो ... बारिश का पानी ..

kalpanasatav823113

टकराव होना अपनी ही कमज़ोरी है। - दादा भगवान

अधिक जानकारी के लिए: https://dbf.adalaj.org/bIs5CaAG

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dadabhagwan1150

🌱हिरव्या मुगाचा डोसा

🌱साहित्य
एक वाटी अख्खे हिरवे मूग
दोन मिरच्या
जिरे
मीठ चवीनुसार
किसलेले चीज
कोथिंबीर
बारीक चिरलेला कांदा
गाजर कीस

🌱कृती
एक वाटी मूग स्वच्छ धुवून पाच ते सहा तास भरपूर पाणी घालून भिजवून ठेवा
मुगाच्या वरती एक बोट तरी पाणी हवे

🌱भरपुर भिजल्यावर मिरची जीरे घालून शक्यतो भिजवलेले पाणी वापरून बारीक वाटुन घ्या व बाजूला झाकुन ठेवा

🌱अर्ध्या तासाने जरूर असल्यास थोडे पाणी
व चवीनुसार मीठ घालून डोसे घाला

🌱 डोशावर गाजर कीस, कांदा व कोथिंबीर पसरुन घडी घालून घ्या

सोबत टोमॅटो सॉस..

🌱हा डोसा छान कुरकुरीत होतो 😋

jayvrishaligmailcom

बावरी छोरी...

थारो म्हारो छोरा..,
कोणी मजो न आवें..!
थारे चौखो इश्क़ करनो हैं
म्हारे पक्के हिवडै़ सूं..
तो आणा ठाठ-बाट से ,
ऊंची ऊंटनी पर बैठ'र
कदि उदेपुर, जयपुर
आंख्यों सूं मन्ने निरखने ,
सांसों सूं म्हारो पतों पूछणे ?
म्हें..घणी बाबरी छोरी !
रात-दिन बस थारी बाट जोवूं
टेम मिले तो आता अठै !
कदि रेतीले टीले पार
म्हारे सूणे- सूणे सपणो में
थांसू मुलाकात करणे।

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-१/१०/२०२६

- राजस्थानी की देशी भाषा का ठाठ-बाट

shekharkharadi6923

"जीत हमेशा बड़ी नहीं होती, कभी-कभी बस टूटने से बच जाना भी जीत है।"
GM. Dharmendra Kumar

erdharmendra

ज़िंदगी की हर कहानी में
कुछ अधूरी बातें होती हैं,
कुछ सपने होते हैं,
और कुछ लोग...
जो दिल में रहकर भी
कभी साथ नहीं होते।

लेकिन शायद यही अधूरापन
हमें आगे बढ़ना सिखाते हैं,
क्योंकि हर सफर में मंज़िल से पहले
एक कहानी होती है...

अभी कहानी बाकी है...

ankitkhatri900231