हार का पहला स्वाद
अर्जुन को हमेशा लगता था कि उसके अंदर कुछ खास है।
लेकिन “लगना” और “साबित करना” दो अलग चीजें होती हैं और वह यह बात उस दिन समझ पाया, जब पूरी कक्षा के सामने उसका नाम असफल छात्रों की सूची में पुकारा गया।
“अर्जुन चौधरी फेल।”
शब्द छोटे थे, लेकिन असर भारी।
कुछ लड़के मुस्कुराए।
कुछ ने पीछे मुड़कर उसे देखा।
कुछ ने धीरे से फुसफुसाया “फिर से…”
अर्जुन की उंगलियाँ कांप रही थीं। वह अपनी कॉपी पर नजरें गड़ाए बैठा रहा, जैसे अगर वह ऊपर देखेगा तो दुनिया टूट जाएगी। उसकी छाती में अजीब सा दबाव था। उसे लग रहा था जैसे पूरा कमरा सिकुड़कर उसके ऊपर गिरने वाला है।
यह पहली बार नहीं था जब वह असफल हुआ था।
लेकिन पहली बार उसे लगा शायद समस्या पढ़ाई नहीं, वह खुद है।
स्कूल से घर तक का रास्ता उस दिन बहुत लंबा लग रहा था। सड़क पर गाड़ियाँ सामान्य गति से चल रही थीं, लोग अपने काम में व्यस्त थे, लेकिन अर्जुन को लग रहा था कि सबको पता है वह हार गया है।
घर पहुंचते ही माँ ने पूछा, “कैसा रहा रिज़ल्ट?”
वह कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला “ठीक नहीं।”
माँ ने गहरी साँस ली, लेकिन कुछ कहा नहीं। वह जानती थीं कि उनके बेटे के भीतर कुछ चल रहा है कुछ ऐसा जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं।
रात को अर्जुन छत पर लेटा था। आसमान में तारे थे, लेकिन उसका मन अंधेरे से भरा हुआ था। उसने खुद से पूछा
“क्या मैं सच में इतना कमजोर हूँ?”
उसे याद आया बचपन में वह दौड़ में सबसे आगे रहता था। खेल में उसका आत्मविश्वास अलग ही होता था। लेकिन जैसे-जैसे कक्षाएँ बढ़ीं, प्रतियोगिता बढ़ी, तुलना बढ़ी… उसका आत्मविश्वास घटता गया।
उसे असफलता से ज्यादा डर “लोग क्या कहेंगे” से लगता था।
उस रात पहली बार उसने महसूस किया
उसकी असली लड़ाई किताबों से नहीं, अपने दिमाग से है।
अगले दिन स्कूल में उसका दोस्त राघव मिला।
“यार, छोड़ ना। सबके बस की बात नहीं होती। मैं तो अगले साल प्राइवेट फॉर्म भर दूँगा। ज्यादा टेंशन लेने का फायदा नहीं।”
राघव की आवाज में हार की आदत थी। जैसे वह असफलता को स्वीकार कर चुका हो।
अर्जुन ने सिर हिलाया, लेकिन उसके भीतर कुछ और चल रहा था।
उसे राघव की बातों में सुकून नहीं, डर महसूस हुआ।
“क्या मैं भी ऐसा ही बन जाऊँगा?”
यह सवाल उसे चुभ गया।
कुछ दिनों बाद स्कूल में एक नया कार्यक्रम घोषित हुआ “व्यक्तित्व विकास शिविर।”
कहा गया कि एक पूर्व सैनिक आने वाले हैं, जो छात्रों को अनुशासन और मानसिक शक्ति पर प्रशिक्षण देंगे।
अर्जुन ने नाम तो सुना “भीष्म सर।”
लोग कह रहे थे कि वह बहुत कठोर हैं।
कुछ छात्र पहले से ही डर गए थे।
शिविर के पहले दिन मैदान में सभी छात्र पंक्ति में खड़े थे। सुबह के पाँच बजे थे। ठंडी हवा चल रही थी। अधिकतर छात्रों की आँखें नींद से भरी थीं।
तभी एक तेज आवाज गूँजी
“सीधे खड़े हो जाओ!”
सबकी रीढ़ सीधी हो गई।
भीष्म सर लंबे, सख्त चेहरे वाले व्यक्ति थे। उनकी आँखों में अजीब सी स्थिरता थी जैसे वह सामने वाले के मन को पढ़ सकते हों।
उन्होंने बिना मुस्कुराए कहा
“तुममें से कितने लोग सफल होना चाहते हैं?”
सभी ने हाथ उठा दिए।
उन्होंने फिर पूछा
“कितने लोग सुबह पाँच बजे रोज़ उठ सकते हैं?”
आधे हाथ नीचे हो गए।
“कितने लोग रोज़ तीन घंटे अतिरिक्त मेहनत कर सकते हैं?”
और हाथ नीचे हो गए।
भीष्म सर हल्का सा मुस्कुराए।
“तुम सफलता नहीं चाहते। तुम उसका परिणाम चाहते हो। प्रक्रिया नहीं।”
अर्जुन के दिल में जैसे कोई बात सीधी उतर गई।
शिविर का पहला अभ्यास था दौड़।
पाँच किलोमीटर।
अर्जुन ने सोचा “मैं कर लूंगा।”
लेकिन दूसरे ही किलोमीटर में उसकी सांस फूलने लगी। पैरों में दर्द होने लगा।
राघव पीछे रह गया।
कई छात्र बीच में ही रुक गए।
अर्जुन भी रुकना चाहता था।
उसके मन ने कहा “बस कर। कोई ज़रूरी नहीं है।”
तभी भीष्म सर की आवाज आई
“जब शरीर थकता है, तो असली लड़ाई शुरू होती है। हार शरीर नहीं मानता, मन मानता है।”
अर्जुन ने दाँत भींच लिए।
वह दौड़ता रहा।
वह सबसे आगे नहीं था।
लेकिन वह रुका नहीं।
दौड़ खत्म हुई तो वह जमीन पर बैठ गया।
उसकी सांस तेज थी। शरीर कांप रहा था।
लेकिन उसके अंदर पहली बार एक हल्की सी चमक थी
“मैंने हार नहीं मानी।”
शाम को भीष्म सर ने सभी छात्रों को इकट्ठा किया।
“आज किसने खुद को हराया?”
कोई जवाब नहीं आया।
उन्होंने कहा
“सफलता दूसरों को हराने से नहीं मिलती। पहले खुद के बहानों को हराना पड़ता है।”
अर्जुन के मन में जैसे कोई दरवाज़ा खुल रहा था।
उसे समझ आने लगा
वह पढ़ाई में इसलिए नहीं हार रहा था क्योंकि वह कमजोर था।
वह इसलिए हार रहा था क्योंकि वह कोशिश से पहले ही डर जाता था।
वह असफलता से नहीं, अपमान से डरता था।
वह मेहनत से नहीं, तुलना से डरता था।
उस रात अर्जुन ने एक कागज निकाला।
उसने लिखा:
मैं रोज़ सुबह पाँच बजे उठूँगा।
मैं रोज़ कम से कम दो घंटे अतिरिक्त पढ़ाई करूँगा।
मैं शिकायत नहीं करूँगा।
मैं अपने डर को लिखूँगा, छुपाऊँगा नहीं।
वह जानता था यह आसान नहीं होगा।
लेकिन पहली बार उसे लगा वह भाग नहीं रहा।
कुछ दिनों में फर्क दिखने लगा।
उसकी दिनचर्या बदल रही थी।
उसकी चाल बदल रही थी।
उसकी आँखों में थोड़ी दृढ़ता आ रही थी।
राघव ने एक दिन कहा
“तू बदल गया है यार।”
अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया
“शायद मैं पहले असली नहीं था।”
लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी।
अंदर का डर अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था।
अभी भी रात में कभी-कभी उसे वही आवाज सुनाई देती
“अगर फिर से असफल हुआ तो?”
फर्क बस इतना था
अब वह उस आवाज से भागता नहीं था।
वह उसे सुनता था…
और फिर काम में लग जाता था।
उसे अभी नहीं पता था कि आगे और बड़ी परीक्षा आने वाली है।
अभी उसे गिरना भी था।
टूटना भी था।
लेकिन उस दिन, उस पाँच किलोमीटर की दौड़ के बाद,
एक चीज़ निश्चित हो चुकी थी
अर्जुन अब हार से डरने वाला लड़का नहीं रहा।
वह धीरे-धीरे अपने अंदर के योद्धा को जगा रहा था।
और हर योद्धा की कहानी एक हार से ही शुरू होती है