माँ के आँचल में जैसे पूरा संसार समाया है,
हर पीड़ा का उत्तर उसने मुस्काकर पाया है।
खुद धूप में जल जाती है बच्चों की छाँव बचाने को,
अपने आँसू पी लेती है उनके होंठ हँसाने को।
संकट चाहे जितना गहरा, माँ ढाल बन जाती है,
अपने बच्चों पर आए आँच तो दुनिया से लड़ जाती है।
उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’