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New bites

तेरी यादें तुझसे मिलने को मजबूर करती हैं... I
मेरी हसरते देहलीज पर तेरी रोज मरती हैं... II

deepakbundela7179

Bhairav Battalion 🪖 | India's New Light Commando Force

આ વખતના ૭૭ મા પ્રજાસત્તાક દિનની પરેડમાં કર્તવ્ય પથ પર સિંહ ગર્જના કરતી ભારતીય સેનાની એક નવી રેજિમેન્ટ કૂચ કરતી જોવા મળી હતી.આ નવી રેજિમેન્ટનું જેવું નામ છે એવું જ કાર્ય છે. તો ચાલો જાણીએ, ભૈરવ બટાલિયન વિશે; સાથે જાણીશું તેની રચના, ઉદેશ્ય, રોલ - મિશન વગેરે.

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શેર કરજો 🙏 જય હિન્દ, જય ભારત🫡🇮🇳

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mothiyavgmail.com3309

इलेक्ट्रॉन–नाभिक स्थिरता सिद्धांत

(सूत्रों के आधार पर पूर्ण व्याख्या)

1. प्रस्तावना

परमाणु के अंदर नाभिक (nucleus) धनात्मक आवेश (+Z) रखता है और इलेक्ट्रॉन ऋणात्मक आवेश (−e) रखते हैं। भौतिकी का मुख्य प्रश्न यह है कि इतने अधिक आकर्षण बल के बावजूद इलेक्ट्रॉन नाभिक में गिर क्यों नहीं जाता? इस सिद्धांत में इसका उत्तर केवल सूत्रों (सूत्‍रों) के माध्यम से दिया गया है।

2. नाभिक–इलेक्ट्रॉन के बीच बल (Fi)

नाभिक द्वारा i-th इलेक्ट्रॉन पर लगाया गया आकर्षण बल Coulomb नियम से दिया जाता है:



जहाँ:

Fi = i-th इलेक्ट्रॉन पर लगने वाला आकर्षण बल

K = Coulomb स्थिरांक

Z = नाभिक का आवेश (protons की संख्या)

e = इलेक्ट्रॉन का आवेश

rᵢ = i-th इलेक्ट्रॉन की नाभिक से दूरी

👉 यह बल हमेशा नाभिक की ओर होता है।

3. दूरी का प्रभाव (rᵢ का रोल)

सूत्र से स्पष्ट है:



अर्थात:

यदि rᵢ कम होता है → Fi बहुत अधिक बढ़ जाता है

यदि rᵢ अधिक होता है → Fi कम हो जाता है

यदि केवल यही बल कार्य करता, तो इलेक्ट्रॉन नाभिक में गिर जाना चाहिए था।

4. इलेक्ट्रॉन–इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण बल (Fᵢⱼ)

परमाणु में एक से अधिक इलेक्ट्रॉन होते हैं। प्रत्येक इलेक्ट्रॉन दूसरे इलेक्ट्रॉन को प्रतिकर्षित करता है:



जहाँ:

Fᵢⱼ = i-th और j-th इलेक्ट्रॉन के बीच प्रतिकर्षण बल

rᵢⱼ = दोनों इलेक्ट्रॉनों के बीच दूरी

j ≠ i = इलेक्ट्रॉन स्वयं अपने ऊपर बल नहीं लगाता

👉 यह बल नाभिक से बाहर की दिशा में कार्य करता है।

5. बलों का संतुलन (Force Balance)

i-th इलेक्ट्रॉन पर दो मुख्य प्रभाव होते हैं:

(A) अंदर की ओर बल



(B) बाहर की ओर प्रभाव

इलेक्ट्रॉन–इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण

इलेक्ट्रॉन की गति से उत्पन्न प्रभाव

जब:



तब इलेक्ट्रॉन एक निश्चित दूरी (rᵢ) पर स्थिर हो जाता है।

6. इलेक्ट्रॉन नाभिक में क्यों नहीं गिरता?

यदि इलेक्ट्रॉन नाभिक के बहुत पास जाए:

rᵢ बहुत कम हो जाता है

Fi अत्यधिक बढ़ जाता है

ऊर्जा न्यूनतम से कम होने लगती है (जो संभव नहीं)

इसलिए प्रकृति एक न्यूनतम दूरी बनाए रखती है जहाँ बल संतुलित रहते हैं।

7. सिद्धांत का निष्कर्ष

इस सिद्धांत के अनुसार:

नाभिक इलेक्ट्रॉन को Fi बल से अपनी ओर खींचता है।

इलेक्ट्रॉन आपस में Fᵢⱼ बल से एक-दूसरे को दूर धकेलते हैं।

दूरी घटने पर आकर्षण बढ़ता है, पर बाहर की ओर प्रभाव भी बढ़ता है।

एक विशेष दूरी पर ये सभी प्रभाव संतुलित हो जाते हैं।

👉 इसी संतुलन के कारण इलेक्ट्रॉन नाभिक में नहीं गिरता और परमाणु स्थिर रहता है।

8. ऊर्जा की दृष्टि से व्याख्या (Energy Point of View)

इलेक्ट्रॉन की कुल ऊर्जा दो भागों से मिलकर बनती है:

(A) स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy)

नाभिक और इलेक्ट्रॉन के बीच स्थितिज ऊर्जा:



ऋणात्मक चिन्ह यह दर्शाता है कि यह आकर्षण बल की ऊर्जा है। जैसे-जैसे इलेक्ट्रॉन नाभिक के पास जाता है, स्थितिज ऊर्जा अधिक ऋणात्मक होती जाती है।

(B) गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy)

इलेक्ट्रॉन की गति के कारण उसमें गतिज ऊर्जा होती है:



जब इलेक्ट्रॉन नाभिक के पास जाता है, उसकी गति बढ़ती है और गतिज ऊर्जा भी बढ़ती है।

prabhjotsinghnagra003282

कविता: तुम होती

"काश तुम होती, मुझे समझ पाती,
मेरी खामोशी को पढ़ लेती।
काश तुम होती, मुझसे कहती,
दिल की बातों को नजर से सुनती।

मेरे बारे में थोड़ा जान लेती,
मेरी पीड़ा को पहचान लेती।
तुम तो समय हो, बहते हुए मिले ,
तुम्हें क्या फर्क पड़ता है, रुके या चले।

मैं तुम्हारे पीछे दौड़ रहा हूँ,
हर दिन खुद को भुला रहा हूँ।
अगर कभी तुम मेरे पीछे आती,
तो मेरी थकान मिट जाती।

यही है भाग-दौड़ का जीवन,
हर चेहरे के पीछे छिपा है एक सावन।
भीड़ में रहकर भी मैं तन्हा हूँ,
अपने ही साए से अनजान हूँ।

यार, मैं सच में अकेला हूँ,
बिना आवाज़ का सवाल हूँ।
कोई बस एक बार पूछे,
“कैसे हो?” — मन कहता है बहुत अच्छे ।"

पल्लव सान्याल

pallavsanyal205886

कविता:हे रात…

हे रात, तुम क्या जानती हो
तुम्हारी गोद में जागते सब ,
वे नींद में नहीं होते —वे अपने को
दफ़्न कर रहे होते हैं कब।

उनकी सीने में दुख का अथाह सागर,
उनकी धड़कन में जलती तेज लौ का अथाह डागर ,
हर साँस के साथ चलती उतरती
अनकही सी मौत को वो निहारती।

वे आसमान के चमकीले तारे नहीं हैं,
जो खुलकर चमक सकें,
वे बुझती-बुझती लौ हैं
जो काँपते-काँपते थम जाती हैं।

खुशियाँ कब की राख हुईं,
हँसी बस एक दिखावा हुई,
विनाश के उस मोड़ पर
खतम हुआ है उनका उस ठोर पर।

ज़िंदा लोग अँधेरे से डरते हैं,
उन्हें भोर का इंतज़ार रहते है,
पर जिनके भीतर सूरज मरते है,
वे हर पल अँधकार सहते है।

लाशों की कोई सुबह नहीं है,
न कोई नया खिलता सवेरा है,
उनके हिस्से में लिख दी गई
अनंत रात का एक डेरा है।

इसलिए हे रात, समझ लो तुम,
जो तुम्हारा हाथ कसके थामे हैं,
वे इस दुनिया में जीते नहीं हैं,
बस साँसों का बोझ उठाए रखते हैं।

चलते-फिरते साए हैं वे,
जिनमें जीवन की कोई आह नहीं है,
नाम भले ही इंसान का ये—
हक़ीक़त में साँस लेती वह लाश हैं।

पल्लव सान्याल

pallavsanyal205886

नींद आखिर ठहरेगी भी कैसे ?
सब मिलाकर दो ही तो करवटें हैं
एक यादों की तरफ,
एक उम्मीदों की तरफ।

anisroshan324329

શું કામ દુઃખી થવું ! શું કામ આપઘાત કરવો!! શું કામ ઝેર પીવું,શું કામ ડૂબી મરવું, શું કામ વીજળી હાર્યે બાથ અને શું કામ ખાવો પડે ગળે ફાંસો??
❤️
ધીરજ રાખ દોસ્ત થોડી ધીરજ રાખ,ધંધામાં ધ્યાન દે,રૂપિયા કમાઈ લે,તારા માટે પૂજા કરેં છે,પીપળાની!!!!કોઇ સુંદર છોકરી !!!
- વાત્સલ્ય
- वात्सल्य

savdanjimakwana3600

दोहा - श्री जी कनक प्रभा

कला जन्म से थी हुईं, जीवन की मुस्कान।
कनक प्रभा हो पथ चली, शासन माता जान।।

सूरजमल जिनके पिता, छोटी बाई मातु।
कनक बन गई एक दिन,सोना जैसी धातु।।

श्री तुलसी ने कला को, दिया नया था नाम।
कनक प्रभा की कीर्ति से, फैला नव पैगाम।।

तेरा पंथी साधिका, तुलसी दीक्षा पाय।
साध्वी प्रमुखा रूप में, पद को किया सुभाय।।

कनक प्रभा जी साधिका, बहुगुण की थीं खान।
जैन, भिक्षुणी, लेखिका, सन्यासी सम्मान।।

कनक प्रभा जी का हुआ, अमर जगत में नाम।
बिना मोह माया किया, रखे भाव निष्काम ।।

तुलसी कृतियों का किया, सदा आपने गान।
तनिक नहीं था आप में, लोभ, मोह अभिमान।।

सकल जगत में आपका, बड़ा मान सम्मान।
चरण वंदना सब करें, कृपा आपकी जान।।

शासन माता को करूँ, नमन जोड़ कर हाथ।
सूक्ष्म रूप में ही सही, रहो हमारे साथ।।

महिलाओं को कनक ने, नई दिखाई राह।
उन्नति पथ पर ले बढ़ें, ये थी उनकी चाह।।

साध्वी जी ने गढ़ दिया, एक नया प्रतिमान।
विविध पदों पर काम कर, रहीं सदा गतिमान।।

शासन माता कनक ने, पाया कउत्तम स्थान।
इक्यासी की उम्र में, जीशवन का अवसान।।

धन्य-धन्य जीवन हुआ, यश गाथा उत्कर्ष।
जिनसे प्राणी सीखते, क्या होता है हर्ष।।

तेरापंथी साध्वी, ऊँचा तव स्थान।
तीस वर्ष में मिल गया, साध्वी प्रमुखा मान।।

कनक प्रभा जी आपको, शत-शत बार प्रणाम।
जैन धर्म को आपने, दिया नया आयाम।।

महरौली में आपका, हुआ देह का त्याग।
जैन धर्म के लोग सब, मानें इसे प्रयाग।।

दिव्या पर करिए कृपा, कनक प्रभा जी आप।
और निधी का संग में, हरो शोक संताप।।

सुधीर श्रीवास्तव

sudhirsrivastava1309

"સંપત્તિ કે શક્તિ ગમે તેટલી હોય, પણ જો પરિવારનો સાથ ન હોય તો માણસ હારી જાય છે. એકતામાં જ સાચું સુખ અને વિજય છે. 🙏✨

parmarbhavesh.k

आज घर बहुत याद आ रहा है

आज घर बहुत याद आ रहा है,
बहुत ज़्यादा थक चुकी हूँ मैं।
दिल करता है सब छोड़कर
माँ-पापा के पास चली जाऊँ,
पर ज़िंदगी ने नहीं—
मैंने खुद
अपने रास्तों पर ताले लगा दिए।
खुशियों को टालते-टालते
खुद को ही रोक लिया।
सबका हाथ थामते-थामते
अपना हाथ
कब छूट गया,
पता ही नहीं चला।
सबके बारे में सोचते-सोचते
खुद को कहीं बहुत पीछे छोड़ आई हूँ।
हर रिश्ता बचाते-बचाते
अपने ही टूटने की आवाज़
अनसुनी कर दी।
माँ,
आज मैं मज़बूत नहीं हूँ,
बस खड़ी हूँ…
गिरने की इजाज़त भी
खुद को नहीं दी।
खुश रहने के लिए नहीं,
सिर्फ़ रिश्ते बचाने के लिए
हर दिन खुद से समझौता करती रही।
माँ,
आ जा मेरे पास…
मेरे बाल सँवार दे,
आज मुझसे ये भी नहीं हो पा रहा।
तेरी बेटी बहुत थक गई है माँ,
अब खुद को संभालने की ताक़त भी
टूटती जा रही है।
मज़बूत बनने की आदत में
रोने का हक़ खो दिया है मैंने।
आज सच में मुझसे नहीं हो पा रहा माँ…
बस एक बार गले लगा ले,
शायद इस बिखरे हुए दिल को
थोड़ा सा
घर जैसा सुकून
मिल जाए। 🌧️

rimababluworld226792

મારાં ઓચ્છવલાલ દાદા... એમનાં સારાં કાર્યો ની મહેક હજુ પણ ફેલાયલી છે.... 🙏

bhavnabhatt154654

फायकू - मकर संक्रांति
4-3-2 वर्ण (अंतिम पंक्ति - तुम्हारे लिए अनिवार्य)
*******
मकर संक्रांति का पर्व
है अति विशेष
तुम्हारे लिए।

सनातन संस्कृति का स्वर
सूर्य हुए उत्तरायण
तुम्हारे लिए।

स्नान, ध्यान, दान, मान,
खिचड़ी पर्व महान,
तुम्हारे लिए।

बदलती प्रकृति की आभा,
बसंत की दस्तक
तुम्हारे लिए।

रंग बिरंगे पतंगों से
सज गया आकाश
तुम्हारे लिए।

तिल गुड़ की महक
प्रकृति की मुस्कान
तुम्हारे लिए

माघ पूर्णिमा की तिथि
मकर संक्रांति विशेष
तुम्हारे लिए।

सात्विक संदेश लेकर आया
मकर संक्रांति पर्व
तुम्हारे लिए।

प्रकृति की सुंदरतम छटा
मुस्कान बिखेरती है
तुम्हारे लिए।

जप, तप, दान किया
गंगा स्नान भी
तुम्हारे लिए।

जीवन दर्शन समझ लिया,
अब हमने भी,
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

sudhirsrivastava1309

मांगना ही छोड़ दिया हमनें वक्त किसी से,
क्या पता उनके पास इनकार का भी वक्त न हो!!

deepakbundela7179

કુંપળ થઈ તારી આસપાસ રહું છું
તારા શ્વાસની લયમાં રોજ ખીલું છું
તારું એક સ્મિત શ્વાસનો આધાર બને
હૃદયમાં રંગોનું મેઘધનુષ રચાય છે

પવનની સૌમ્ય લહેર સાથે તું આવે છે
તારા સ્પર્શથી જીવન મારું મહેકે છે.
કુંપળની જેવી નાજૂક મારી લાગણી,
તારી હાજરીમાં જ મળે સાચી શાંતિ.

તારી આંખોમાં ઝળકે સપનાની દુનિયા,
જાણે તારાઓએ રચી હોય કોઈ દુનિયા
કુંપળ થઈ હું તારી નજીક ઝૂલું છું
તારા પ્રેમના બગીચામાં હંમેશાં રહું.

જ્યાં તું હોય ત્યાં મારું ઘર બને છે
તારા વિના આ જીવન અધૂરું લાગે.
કુંપળ થઈ હું તારા હૃદયને ચૂમું છું
તારી સાથે જીવનની ક્ષણ ગૂંથું છું

palewaleawantikagmail.com200557

प्यार, दर्द और संघर्ष: ज़िंदगी की सबसे सच्ची कहानी
ज़िंदगी कभी एक रंग में नहीं होती। यह कभी मुस्कुराती है, कभी रुलाती है, और कभी इतना थका देती है कि इंसान खुद से सवाल करने लगता है। इस पूरी यात्रा में तीन शब्द ऐसे हैं जो हर इंसान की कहानी में किसी न किसी मोड़ पर ज़रूर आते हैं— प्यार, दर्द और संघर्ष। ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, अलग नहीं। जहाँ प्यार होता है, वहाँ दर्द भी होता है, और जहाँ दर्द होता है, वहाँ संघर्ष अपने आप जन्म ले लेता है।
प्यार: जो अधूरा भी पूरा लगता है
प्यार एक एहसास है, जिसे शब्दों में बाँधना आसान नहीं। यह कभी किसी की मुस्कान में दिखता है, कभी किसी की खामोशी में। प्यार वो नहीं होता जो सिर्फ़ साथ रहने से साबित हो, बल्कि वो होता है जो दूरी में भी महसूस हो।
कभी-कभी प्यार बिना कहे हो जाता है। न कोई वादा, न कोई इज़हार—बस एक अपनापन, एक जुड़ाव। लेकिन यही प्यार जब सच्चा होता है, तो सबसे ज़्यादा तकलीफ़ भी देता है। क्योंकि सच्चे प्यार में उम्मीदें होती हैं, और उम्मीदें जब टूटती हैं, तो दर्द बन जाती हैं।
कुछ प्यार मुकम्मल होते हैं, तो कुछ अधूरे। लेकिन सच यह है कि अधूरे प्यार ज़्यादा याद रह जाते हैं। क्योंकि जो मिल गया, वह आदत बन जाता है, और जो नहीं मिला, वह कहानी।
दर्द: जो इंसान को भीतर से बदल देता है
दर्द हमेशा चीखकर नहीं आता। कई बार यह मुस्कान के पीछे छिपा होता है। लोग सोचते हैं कि जो हँसता है, वह खुश है—लेकिन अक्सर सबसे गहरे ज़ख्म वही लोग छिपाते हैं।
प्यार से मिला दर्द सबसे अलग होता है। यह शरीर को नहीं, आत्मा को चोट पहुँचाता है। यह रातों की नींद छीन लेता है, सवालों से भर देता है—
“क्या मेरी कमी थी?”
“क्या मैं काफ़ी नहीं था/थी?”
दर्द इंसान को तोड़ता भी है और बनाता भी है। शुरू में वह कमज़ोर करता है, लेकिन धीरे-धीरे वही दर्द इंसान को मज़बूत बना देता है। क्योंकि जब इंसान बहुत कुछ खो चुका होता है, तो फिर खोने का डर खत्म हो जाता है।
संघर्ष: खुद को साबित करने की लड़ाई
जहाँ दर्द होता है, वहीं से संघर्ष शुरू होता है। संघर्ष सिर्फ़ हालात से नहीं होता, बल्कि खुद से भी होता है। हर सुबह खुद को समझाना कि “आज भी उठना है”, “आज भी मुस्कुराना है”, “आज भी आगे बढ़ना है”—यही असली संघर्ष है।
संघर्ष में इंसान अकेला हो जाता है। भीड़ में होते हुए भी अकेला। क्योंकि हर कोई आपकी मुस्कान देखता है, आपकी लड़ाई नहीं। लोग आपकी सफलता की तालियाँ बजाते हैं, लेकिन आपके आँसू नहीं देखते।
संघर्ष सिखाता है कि ज़िंदगी किसी के लिए नहीं रुकती। चाहे दिल टूटा हो, चाहे सपने बिखरे हों—दुनिया अपनी रफ्तार से चलती रहती है। और इंसान को या तो उसके साथ चलना होता है, या पीछे छूट जाना होता है।
प्यार, दर्द और संघर्ष का रिश्ता
इन तीनों का रिश्ता बहुत गहरा है।
प्यार हमें किसी से जोड़ता है।
दर्द हमें खुद से मिलाता है।
और संघर्ष हमें मज़बूत बनाता है।
अगर प्यार न हो, तो दर्द का एहसास नहीं होगा।
अगर दर्द न हो, तो संघर्ष की ताक़त नहीं आएगी।
और अगर संघर्ष न हो, तो इंसान कभी खुद को पहचान नहीं पाएगा।
ज़िंदगी उन्हीं को आगे बढ़ाती है, जो टूटकर भी खड़े होना सीख जाते हैं। जो दर्द को अपनी कमजोरी नहीं, अपनी ताक़त बना लेते हैं।
अंत में
हर इंसान की कहानी अलग होती है, लेकिन भावनाएँ वही होती हैं। प्यार सबको होता है, दर्द सबको मिलता है, और संघर्ष हर किसी को करना पड़ता है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि कोई हार मान लेता है, और कोई आगे बढ़ जाता है।
अगर आज आपकी ज़िंदगी में दर्द है, संघर्ष है, तो घबराइए मत। यह इस बात का सबूत है कि आपने प्यार किया है, आपने महसूस किया है, आपने जिया है।
और यक़ीन मानिए—
संघर्ष के बाद जो इंसान बनता है, वह पहले से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत होता है

jhakajal

ई दै-ज्योतिर्मय साहित्य- -०१फेब्रुवारी२०२६ रविवार अंकात प्रकाशित कविता-
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वर्तमान
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चालतोय मी निरंतर
सावली कुठे दिसेना
भीषण एकाकी वाटेवर
सोबती कुणी भेटेना ।।

रस्ते सारे गजबजलेले
वाहने बेभान सुटलेले
जो तो आपल्या नादात
लुप्त झाला आपलेपणा ।।

बेगडी वैभवी जगात
बुजलेला साधा माणूस
तुच्छ नजरांचा झेलतो
उद्धटसा मुजोरपणा ।।

असे आहे वर्तमान हे
कालचे ते होते भले
बेभरोसी सारे उद्याला
होईल कसे,कोडे पडले ।।
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कवी अरुण वि.देशपांडे-पुणे
9850177342
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arunvdeshpande

🙏🙏सुप्रभात 🙏🙏
🌹 आपका दिन मंगलमय हो 🌹

sonishakya18273gmail.com308865