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"श्री हनुमंत प्रकाश" के रचयिता, पेशे से व्यवसायी राप्ती नगर, गोरखपुर निवासी (मूल निवासी - बरवाँ बाबू पिपराईच हाटा मार्ग जनपद कुशीनगर) विजय प्रताप शाही को साहित्यिक के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु "विद्या वाचस्पति" मानद उपाधि से सम्मानित किया गया ।
नवोदय वैश्विक प्रज्ञान साहित्यिक मंच के छठें वार्षिकोत्सव दिनांक 04/11/2024 के शुभ अवसर पर नवोदय वैश्विक प्रज्ञान साहित्यिक मंच के संरक्षक एवं रजिस्टर्ड संस्था बजरंग लोक मानस कल्याण समिति गौरामाफी प्रतापगढ़ के प्रबंधक वर्ल्ड रिकॉर्डर, लाइफ टाइम अचीवर अनेकों संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के वार्ताकार , फॉरेन रिटर्न महाप्राज्ञ डॉ० यमुना शंकर पाण्डेय "प्रकाश" जी ने संस्थान के द्वारा आपको विद्या वाचस्पति मानद उपाधि राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया ।
श्री शाही जी को इस उपलब्धि के लिए डाॅ राजीव रंजन मिश्र एडवोकेट, डाॅ ओम प्रकाश मधुब्रत, राम रतन यादव, सुरेंद्र शर्मा सागर, सुधीर श्रीवास्तव, दयानंद त्रिपाठी, विरेन्द्र विक्रम सिंह, प्रतिभा सिंह, आदि साहित्यिकारों और अन्य क्षेत्रों से जुड़े अनेकानेक लोगों ने बधाई और शुभकामना दिया ।

vijaypshahi

હે પ્રભુ કણ કણમાં તારો વાસ છે.

rinalpatel7136

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alfha202141

दिल चाहे उनसे मिलना
गीत


हु। हु हु। हु। हु। हु हु


दिल चाहे उनसे मिलना
मगर पांव थके है
डगर है उल्झा

पूरी उम्र बीताई मैं ने
याद उसे कर कर के

मांगते हुए दुआ
उसके ही लिए मैं ने
खुद की खुशियां कम कर दिया

हा। हा। हा। हा हा


हा हु हु हु हु








दिल चाहता है उनसे मिलना
मगर लगता है
अब तकदीर में नहीं है लिखा
मेरा तेरा सफर एक सा



लड़खराते कदम से चला आया
तुझे ढूंढते बेखबर होकर
कोई भी डगर से चला आया

मैं चला आया

हु


मेरे हमसफर मगर तुम मुझे ना मिला जिंदगी में कभी
आखिरी सफर तक मैं चला आया

तेरे ही राह बस एक देखती आई मैं पूरी उम्र



उम्र गुजरी मालो की तरह तेरे नाम जप जप कर

हु। हुं हु। हु

उम्र गुजारी मेलो की तरह तेरे नाम जप जप कर




जब भी दुआएं के लिए हाथ फैलाया
बस तेरे लिए दुआ किया
उन दुआओं में भी सांस जितनी मिली
उससे भी ज्यादा तेरे नाम जपता रहा



हां सांसों की डोर छूटे इस बात कि मुझे गम नहीं


सांसों की डोर से भी ज्यादा संभाले हैं
मैं तेरी यादें
इन सांसों से भी ज्यादा मैं तेरी नाम जपे




हा। हा। हा हा।


अब मुझे माफ कर मेरी मौला
थक गई मैं
मेरा तू इंसाफ कर मेरी मौला





अभी इंतजार नहीं होता
अब उम्र बीते विताई नहीं जा रही
ऐ मेरे दिल सीने में तड़प रहा है
सांसे मेरी ठहेर रही है


हु। हु आ

सासे भी ठहर रही है

और अब इन ठेहरी हुई सांसों को
और इंतजार की मोहलत अब लगता है नहीं है



नहीं है नहीं है
ए मेरी अल्लाह क्या वह कहीं नहीं है


या तो वह मेरे इंतजार के काबिल ही नहीं है
क्या मैं ने बेकार गुजार दी अपनी जिंदगी


ए खुदा बता मुझे
मैं भटक गई इन राहों पे
आंखें बंद मेरी ऐ जगह मुझे


हु

एक ख्वाब में खामोशी से उमर बीते है

अल्हड़ पुरवाई जैसे मैं बेहती बेहती रह गए
अब ख्वाबों में ही अटकी मैं रह गई



सांस खुद घुट रही
आंखों के सामने सब धुंदली पड़ रही है



फिर भी दिल जिंदा है एक आस पे

ए खुदा अब नहीं होता मुझसे और इंतजार। रे

abhinisha

जीवन साथी

vijaypshahi

વરસાદ અને હું...
કૌશિક દવેના જયશ્રી કૃષ્ણ 🙏

kaushikdave4631

વરસાદની રમઝટ વચ્ચે...

kaushikdave4631

U Trun एक पश्चाताप 🔥 थ्रीलर, सस्पेन्स आणि रोमँटिक असणारी ही कथा वाचा खाली दिलेल्या लिंक वर.👇👇👇

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juhi123

મિત્રો,
ફરી હાજર છું, આપ સમક્ષ મારી નવી રચના સાથે, આશા છે આપને પસંદ આવશે, જો કોઈ ત્રુટિ હોય કે સુધારા ની જરૂરિયાત હોય તો જરૂર જણાવજો.
અસ્તુ......

jiteshdattani024052

Omm shree laxmi narayanaya namaha

skptech

बारिश का सुहाना मोसम 🌧️🌨️🌦️🌈

juhi123

शुभ सकाळ 🙏

juhi123

“पक्की मिट्टी….”

मैं सोचती हूँ
समाज को इतनी जल्दी क्यों रहती है
कच्ची उम्रों को ब्याह देने की

शायद इसलिए
क्योंकि कच्ची मिट्टी को आकार देना आसान होता है
उसे जिस साँचे में रखो
वह वैसी ही ढल जाती है
जिधर मोड़ो
उधर मुड़ जाती है

जिसे अपना आकाश भी नहीं मालूम
वह पिंजरे को ही दुनिया समझ लेती है

मैं सोचती हूँ
समाज को लड़कियों के बड़े होने से नहीं
उनके पक जाने से डर लगता है
क्योंकि धूप में पकी हुई मिट्टी
हर हाथ का कहा नहीं मानती

वह जानती है
कि उसे घड़ा बनना है
दीया बनना है
या फिर यूँ ही मिट्टी बने रहना है

कच्ची मिट्टी को
जल्दी जल्दी सौंप दिया जाता है
किसी और के हाथों में
ताकि वह पूछ न सके
मैं कौन हूँ
मुझे क्या बनना है
और मैं किस दिशा में बहना चाहती हूँ

क्योंकि सवाल करती हुई लड़कियाँ
समाज को कभी पसंद नहीं आईं
उसे तो हमेशा
वैसी मिट्टी चाहिए थी
जो चाक पर चढ़ते ही
अपनी इच्छा भूल जाए

लेकिन मैंने देखा है
कुछ मिट्टियाँ देर तक धूप में पड़ी रहती हैं
बारिशें सहती हैं
आँधियाँ सहती हैं
टूटती हैं
बिखरती हैं
फिर भी पकी रहती हैं

और फिर एक दिन
कोई कुम्हार उन्हें छूकर देखता है
तो समझ जाता है
अब यह मिट्टी
किसी साँचे में नहीं ढलेगी
अब इसका आकार
यह खुद चुनेगी

शायद इसी बात से
समाज सबसे ज्यादा डरता है
उसे देर से होने वाले विवाह से नहीं
अपने बारे में सोचने लगी स्त्री से डर लगता है

क्योंकि जिस दिन एक स्त्री
अपनी धूप में पक जाती है
उस दिन वह किसी की बनाई हुई मूर्ति नहीं रहती
वह अपनी ही रचना बन जाती है

प्राची गुर्जर….

prachitanwar111

दिल की बात खामोशी के साथ ✨✨

deepikajoshiruhanidilse

🌿 कढीलिंब चटणी 🌿

🌿 साहित्य
पाच ते सहा डहाळी कढीलिंब
पाव वाटी तीळ
पाव वाटी भाजलेले शेंगदाणे
पाव वाटी कोरडे खोबर कीस
चमचाभर जीरे
चार पाच लसूण पाकळ्या
तिखट
मीठ चवीनुसार

🌿 कृती
कढीलिंब पाने थोडया तेलात कुरकुरत करून घ्यावी
त्यात कोरडे खोबरे कीस भाजून घ्यावा
कढीलिंब, कोरडे ,खोबरे ,कीस शेंगदाणे मिक्सर च्या भांड्यात घालून
त्यात बारीक तुकडे केलेला लसूण
तिखट मीठ जिरे घालून भरड चटणी करावी

🌿 ही चटणी जास्त बारीक वाटून त्यांची पावडर करू नये
🌿 भरड वाटली असता चवीला जास्त चांगली लागते
फायबर चा ही लाभ होतो
व खाताना त्यात घातलेल्या प्रत्येक घटकाची चव जाणवते

🌿 ही चटणी
कोरडी
दही घालून
अथवा तेल घालून
कशीही छान लागते
पोळी भाकरी डोसा इडली वडे कोणत्याही पदार्था सोबत चांगलीं लागते
पंधरा दिवस चांगली टिकते

jayvrishaligmailcom

“माँ का बचपन ……”

एक दिन मैंने माँ से पूछा,  
"माँ... मैं कब बड़ी होऊंगी?"

माँ ने ऐसे देखा,  
जैसे मैंने उनकी सबसे प्यारी चीज़ माँग ली हो।

वो बोलीं,  
"काश मैं तेरी उम्र की घड़ी रोक देती।  
तू बस गिरती, रोती, और फिर हँस देती।"

मैंने कहा,  
"मैं बड़ी होकर तुम्हारी जैसी बनूंगी।"

माँ की उँगलियाँ रुक गईं।  
वो धीरे से बोलीं,  
"मेरी जैसी बनने की दुआ मत माँगना।  
मुझे बड़ा नहीं किया गया...  
बड़ा कर दिया गया।"

वो बोलीं,  
"लड़की का बचपन शोर नहीं करता।  
पहले गुड़िया छूटती है,  
फिर ज़िद,  
फिर हँसी।  
और एक दिन खुद को भी याद नहीं रहता  
कि आखिरी बार बिना वजह कब हँसी थी।"

मैंने पूछा,  
"क्या बड़ा होना इतना दुख देता है?"

माँ बोलीं,  
"नहीं।  
दुख उस दिन है  
जब तुम अपने अंदर की बच्ची की आवाज़ सुनना बंद कर दो।  
जब झूला बच्चों की चीज़ लगे,  
बारिश बीमारी लगे।"

आखिर में उन्होंने मुझे गले लगाया और कहा,  
"औरत बन जाना...  
पर इतनी मत बदलना  
कि तेरे भीतर की बच्ची  
तुझे पहचानना छोड़ दे।"
प्राची गुर्जर…….

prachitanwar111

🌅 good morning 🙏😊
have a nice day 🌺🌸

nikitavinzuda6548

what do you think

vanshsingh118873

"अनुभव"

अनुभव क्या होता है?  
पता नहीं।  
बस इतना जानती हूँ  
कि एक दिन के बाद  
दूसरा दिन पहले जैसा नहीं लगता।

चाँद से पूछो तो कहेगा  
"तारे रोज़ टूटते हैं  
मैं आदतन देखता रहता हूँ।"
पर कभी कुछ कहता नही। 

सूरज कहेगा  
"जलता हूँ  
ताकि किसी को अंधेरा न लगे।  
शाम को थक कर डूब जाता हूँ।  
लेकिन मुझे कोई पूछता भी नहीं।"

संगीत वाले से पूछो  
वो सुरों के बीच की खाली जगह दिखाएगा  
और कहेगा  
"यही सबसे ज़रूरी है।"

रंग कहेंगे  
"हम काले में भी हैं।  
बस तुम देखना नहीं चाहते।"

अनुभव कोई किताब नहीं  
जो पढ़ ली और समझ आ गई।  
अनुभव वो रात है  
जब तुम जागते रहो  
और सुबह पता चले  
कि तुम बदल गए हो।

अनुभव ये नहीं कि तुम गिरे और उठ गए  
अनुभव ये है कि गिरकर  
तुमने धूल झाड़ी  
और फिर से चल दिए  
बिना ये सोचे  
कि कोई देख रहा है या नहीं।

अनुभव के बाद आदमी  
ना समझदार होता है  
ना बेवकूफ।  
बस थोड़ा खाली हो जाता है।  
और उसी खालीपन में  
पहली बार उसे  
अपनी आवाज़ सुनाई देती है।
प्राची गुर्जर…..

prachitanwar111

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Bhagwan shiv ji ka ek aur jyotirlinga Malikaarjun jai Bholenath

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