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"किसी रोज़"

किसी रोज़ मैं ख़ुद के सामने बैठूंगी।  
बिना फोन, बिना शोर, बिना किसी बहाने के।  
सामने दो कप रखूंगी  
एक मेरे लिए, एक उस "मैं" के लिए  
जो सालों से इंतज़ार कर रही है।

किसी रोज़ मैं अलमारी के सबसे निचले खाने से  
अपने अधूरे सपने निकालूंगी।  
धूल झाड़ूंगी, सिलवटें सीधी करूंगी।  
और उनसे पूछूंगी 
"अभी भी सांस है तुममें?  
चलो, फिर से कोशिश करते हैं।"

किसी रोज़ मैं टूटे हुए दर्पण के टुकड़े बीनूंगी।  
उंगली कटे तो कटे।  
हर टुकड़े में एक पुराना चेहरा दिखेगा।  
मैं सबको जोड़ूंगी।  
और आखिर में जो चेहरा बनेगा  
वो न खूबसूरत होगा, न बदसूरत।  
वो बस... असली होगा।

किसी रोज़ मैं नदी के किनारे जाकर  
पत्थर नहीं फेंकूंगी।  
बस बैठ जाऊंगी।  
और पानी से सीखूंगी  
कि कैसे बहते-बहते भी  
ख़ुद को साफ़ रखा जाता है।  
कैसे मुड़ना पड़ता है,  
पर रुकना नहीं पड़ता।

किसी रोज़ मैं अपने दुख को कुर्सी दूंगी।  
कहूंगी ….."बैठ।  
आज तुझे भी सुना जाएगा।"  
और शांति को कहूंगी 
"तू थोड़ा तेज़ बोल।  
इतने साल बाद आई है,  
आवाज़ तो सुनाई दे।"

किसी रोज़ मैं रात को देर तक जागूंगी।  
छत पर लेटकर तारे नहीं गिनूंगी।  
बस अंधेरे को देखूंगी।  
और अंधेरे से कहूंगी 
"तू बुरा नहीं है।  
तू ही तो है जो मुझे  
मेरे अंदर का उजाला दिखाता है।"

किसी रोज़ मैं माफ कर दूंगी।  
सबको नहीं।  
ख़ुद को।  
उन सब बार के लिए  
जब मैं गिरकर भी नहीं रोई,  
जब मैं टूटकर भी मुस्कुराई,  
जब मैं हारकर भी "मैं ठीक हूं" बोली।

क्योंकि किसी रोज़ ये समझ आएगा  
दुख अच्छा लगता है,  
क्योंकि वो झूठ नहीं बोलता।  
और शांति शोर लगती है,  
क्योंकि वो बहुत दिन बाद आती है।

किसी रोज़...  
मैं ख़ुद से मिल लूंगी।  
और उस दिन के बाद  
कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।
प्राची गुर्जर….

prachitanwar111

" દાવ જિંદગીના "

હાવ નોખા છે અને ભાવ નોખા છે.
માણસે માણસે સ્વભાવ નોખા છે.

માનતો હતો કે હું રમું છું જિંદગીથી,
પણ જિંદગીના અહીં દાવ નોખા છે.

બતાવી ના શક્યો હું દાગ આ પીઠના,
એક જ ખંજરના પણ ઘાવ નોખા છે.

કિનારે જે મળ્યાં હતાં, બસ મૃગજળ,
હવે સમજ્યો દરિયાના વહાવ નોખા છે.

સદા એ અમૃતની જેમ વરસતાં રહ્યાં,
પણ ભીતર છૂપા ઝેરના તાવ નોખા છે.

કરવા ગયો જ્યાં સચ્ચાઈનો ખુલાસો,
ત્યાં સમજાયું જૂઠાણાના રાવ નોખા છે.

ખરીદવા નીકળો તો ખબર પડે "વ્યોમ",
કે હરેક બસ્તીમાં વફાના ભાવ નોખા છે.

✍...© વિનોદ. મો. સોલંકી "વ્યોમ"
જેટકો (જીઈબી), મુ. રાપર

omjay818

#Don 't answer it.
Coming Live Tomorrow.

soumyaasharrma755758

सदाशिव को जानने वाले mahavishnu Narayan को भुलाकर vishnu को याद रखते हैं और mahavishnu Narayan को जानने वाले सदाशिव को भुलाकर shiv को याद रखते इस तरह उनकी बात भी सही होती हैं और विरोधाभास रहता है

ahiran

સમય ને જોતા જોતા સમય નીકળી ગયો
હવે ખાલી પસ્તાવો રહી ગયો
કંઈક ન કર્યું...

rupex

આજનો સુવિચાર

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dadabhagwan1150

Radha Krishna jai jagannath

skptech

उम्र चालीस की

उम्र चालीस की
होती बड़ी खतरनाक
अकेला कर देती
सबके चेहरे दिखा देती
समझ कुछ ज्यादा आने लगती
बीमारियां सताने लगती
दुनिया भी बेगानी लगती
हाय उम्र ये चालीस की

अनेक शत्रु इस शरीर के
शुगर, थाइराइड, मोटापा
और तो और डिप्रेशन
मन को ना कुछ भी भाए
बिना बात के ही आंसू आए
चिड़चिड़ापन क्यूं बढ़ता जाए
बचपना जाता नहीं
समझदारी आती नहीं
बैरी जवानी जो

बिना पूछे खिसकी जाए
बुढ़ापा दस्तक देने आए
करे तो क्या करे हाय
इससे तो बच्चे ही अच्छे थे
सच से अनजान ही अच्छे थे
समझदारी ने तो रिश्ते छीन लिए
मुखौटे सबके उतर गए
कुछ अपने दिल से उतर गए
बड़ी मुश्किल है डगर
हाय उम्र ये चालीस की

---

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

drvandnasharma8596

यह कविता हमें याद दिलाती है कि जीवन के संघर्ष और प्रेम की परीक्षाएँ शाश्वत हैं। इतिहास खुद को दोहराता है, इसलिए हमें न तो सफलता पर अहंकार करना चाहिए, और न ही चुनौतियों से डरना चाहिए, बल्कि निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

vanshsingh118873

A Love In The Shadows by Princy Tiwari is now waiting for readers at The Landour Bookstore & Cafe, Mussoorie. Pick up your copy and let the mystery begin.

anand5870

दिल की बात खामोशी के साथ ✨✨

यदि आपको इसकी एक लाइन भी दिल से छू गई हो तो कमेंट में राधे-राधे जरूर लिखेगा और शेर और लाइक जरुर करेगा और फॉलो मोर

deepikajoshiruhanidilse

दिल की बात खामोशी के साथ ✨✨

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दिल की बात खामोशी के साथ ✨✨

deepikajoshiruhanidilse

"राष्ट्र प्रेम की गूंज"

जो राष्ट्र हमारा भू स्थल,
वो राष्ट्र हमारी शान हैं।
उस राष्ट्र से ही आन है,
वो राष्ट्र ही पहचान है।

जो राष्ट्र के अपने हो न सका,
वो राष्ट्र द्रोही कहलाएगा।
जिस भूमि पर जन्म लिया,
क्या घात उसी से कर जायेगा।

राष्ट्र प्रेमी ही यारों,
जग में सम्मान पाते हैं।
स्वराष्ट्र से घृणा करने वाले,
देश द्रोही कहलाते है।

राष्ट्र प्रेमी है हम यारों,
देश भक्त कहलाते हैं।
स्वराष्ट्र की रक्षा के खातिर,
हम प्राण त्याग कर जाते हैं।
हम प्राण त्याग कर जाते हैं।।

~ Poet :- Sp Singh

spsingh

दिल की बात खामोशी के साथ ✨✨

deepikajoshiruhanidilse

हां मैं हमारे अमर्यादित स्त्री
कविता


हां मैं समाज में बड़ी अमर्यादित स्त्री हूं

उन मर्यादित स्त्रियों की तरह मैं बिल्कुल भी नहीं हूं


क्योंकि मैं दिखावा नहीं करती
मैं बिल्कुल वैसी हूं
जैसी मैं हूं
मैं झूठ नहीं बोलता
मैं जी हजूरी नहीं करती

मैं नहीं करती और स्त्रियों की तरह बड़ों बुड़ो की सम्मान
बस इसलिए कि वह बड़े और बूढ़े हैं

मैं नहीं करती घर की वह सभी काम
जो बरसों से स्त्री के नाम मर्यादित होने के तौर पर
स्त्री पर एक बोझ सी लादी गई है




उन सभी की
अपने बड़ों की छोटो की ख्याल रखने की
जिम्मेदारियां उठाने की
तीन समय उनके लिए रोटियां पकाने की
24 घंटे उनके लिए ही जीने की


मैं नहीं कर सकती
क्योंकि मुझ में धैर्य नहीं है


मैं नहीं करती
मैं बेवाक सी स्त्री
वही करती हूं जो मेरा मन भाता है


मैं किसी के हिसाब से अपने समय नहीं देती
मेरा समय स्वयं बस मेरा है


उसे मैं अपनी जरूरत
और अपने हिसाब से ही खर्च करती हूं



हां मैं समाज में बहुत ही अमर्यादीत स्त्री हुं


क्योंकि मुझे मुखौटे पहनने का शौक नहीं
मैं वही शक्ल लेकर चलती हूं
जो मेरा है

मैं दूसरों की तरह नियंत्रण चेहरा नहीं बदलती
दिखाबा के लिए
मैं हद से ज्यादा अच्छी नहीं होती



कोई मेरी बात पर यकीन करें
बस सिर्फ इसलिए मैं मीठी बातें नहीं बोलती



मुझे फर्क नहीं पड़ता कोई साथ रहे या ना
बस किसी के साथ पाने के लिए
खुद को नहीं बदलती



मैं कभी जरूरत से ज्यादा अच्छी नहीं होती
मैं जैसी हूं
उसे समाज में अमर्यादीत कहते हैं


पर मेरा एक सवाल है अखिल मर्यादित होना क्या है
क्या खुद को मार कर
दूसरे के लिए सुख का कामना करना मर्यादित है



क्या खुद की ना सम्मान कर के
बड़ों की बातों की सम्मान रखना मर्यादित है

बस इसलिए कि वह बड़े हैं अपने हैं
चाहे उसके लिए खुद की सांस गिरवी क्यों न रखने पड़े



क्या मर्यादित उसे कहते हैं
जो मुंह पर अच्छे बनते हैं
और पीठ पीछे बुराई करते हैं



क्या मर्यादित होना इसे कहते हैं
जो किसी को ना नहीं कहते
चाहे उसके लिए खुद को दर्द क्यों ना हो



क्या मर्यादित उसे कहते हैं
समाज के हिसाब से जिंदगी गुजर दे
चाहे खुद को पता चल ही ना कि
वह कौन है
और क्यों जी रही है


अगर मर्यादित होना उसे कहते हैं
जो दूसरों के लिए
अपनी जिंदगी को बर्बाद कर दे


अपने होने ना होने की खबर जाने बिना
तो मै अमर्यादित स्त्री ही सही



और मुझे कोई शौक नहीं है
समाज के हिसाब से चलने की
और उनके नज़रों में मर्यादित पूर्व शांति स्त्री बनने की



मुझ में तूफान है अंगार है एक धधकती हुई ज्वाला है

जो शांत नहीं जो पूझा नही
वह ठहेर ठहेर कर ऊठती रहती है धधकते रहती है
वह खुद को ढूंढने के लिए
किसी भी हद तक गुजारना हरदम तैयार रहती है

हां मैं अमर्यादित स्त्री
क्योंकि मुझे खुद को थोड़ा और जानना है
और खुद ढुंढ कर पा कर
खुद को पूरी तरह खुद का ही कहना है

हां मैं हुं आमर्यादित स्त्री

abhinisha

मुक्तक:-

ॠतुओं ने अब अपना अपना लक्षन खोया,
जीवन ने अपने भीतर का जीवन खोया,
नये दौर की नई हवाओं की संगत से,
प्रेरित होकर आँगन ने अपनापन खोया ।।

स्वरचित
@सर्वाधिकार सुरक्षित - डाॅ.विजय प्रताप शाही

vijaypshahi

सिंहसँग खेल्ने, वीर बालक बन्छ।
दुष्यन्त इन्द्रको युद्धमा मद्दत गर्छन्,
भरतलाई देखेर, सम्झना फर्किन्छन्।

अङ्गूठी फेला पर्छ, माछाबाट उद्धार,
दुष्यन्त रोइरहन्छन्, पश्चातापमा डुबेर।
मिलन हुन्छ स्वर्गमा, परिवार पूरा हुन्छ,
भरत भारतवर्षको राजा बन्छ, अमर हुन्छ।

अप्सराको प्रेमले सन्तान दिन्छ,
परीक्षाले सिकाउँछ, जीवनको रहस्य खोल्छ।
मेनका, रम्भा, उर्वशीको कथा,
मानव र दिव्य बीचको पुल बन्छ।


रम्भा मुक्त हुन्छिन्, श्वेत ऋषिको कृपाले,
ढुङ्गाबाट फर्किन्, स्वर्गको नृत्यमा।
उर्वशी पुरुरवाससँग छोटो मिलन गर्छिन्,
तर

rajukumarchaudhary502010

"करते होंगे लोग नशा सिगरेट और शराब का…
हमें तो नशा है कागज़, कलम और दवात का।"


"लोग ग़म भुलाने के लिए
शराब का सहारा लेते हैं…
हम ग़म को कागज़ पर उतार देते हैं।
उनका नशा बोतल में होता है,
हमारा नशा कलम और अल्फ़ाज़ में। ✍️🥀"

archanalekhikha

केशर आंब्याची वडी

घरचे आंबे संपले तरी आंबे खायची हौस कुठे संपते 😀 घरी केशर आंबा आणलाय
त्याची ही वडी केली
हा आंबा रंगाला नावाप्रमाणेच केशरी होता 🙂
व रसही पातळ होता
पण चवीला मात्र गोड होता

साहित्य
एक वाटी आंब्याचा रस
दोन वाटया ओले खोबरे
पाऊण वाटी साखर
दोन मोठे चमचे बारीक केलेली साखर
वेलदोडे पावडर
एक कप साई सकट दुध
दोन मोठे चमचे तूप

कृती
प्रथम एका थाळीला तूप लावून ठेवा
दूध साय व ओले खोबरे
मिक्सर मधून काढा
कढईत एक चमचा तूप व आंब्याचा रस घालुन थोडे परतून घ्या
रसाचा कच्चेपणा कमी होऊन त्यातील पाण्याचा अंश पण कमी होईल
आता त्यात मिक्सर मधून काढलेले खोबरे व पाऊण वाटी साखर घालून आटवत ठेवा
सतत हलवत रहा
नाहीतर मिश्रण करपू शकते
परत एक चमचा तूप घाला
वीस पंचवीस मिनिटांत मिश्रण आळून येईल
मिश्रण कढईच्या कडा सोडू लागले की
खाली काढून त्यात बारीक साखर घालून चांगले घोटून घ्या
वेलदोडे पावडर मिसळून तूप लावलेल्या थाळीत थापा
थोडे कोमट झाल्यावर चाकूने वडी पाडून
काजु तूकडे ,अथवा पिस्ता, काळी मनुका लावुन घ्या
दोन तासानंतर मिश्रण थंड झाल्यावर वड्या काढून घ्या
आकर्षक रंगाच्या या वड्या चवीष्ट लागतात

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