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सोचा दो चार पल सुकून के
चलो लेते हैं हम भी बीता
कमबख्त दिल हैं के पूछता हैं
बार बार बेबसी का हीं पता

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

कहीं फ्रिज खोला गया
मिला मृत प्राणी

हरे ड्रम को तोड़ा फोड़ा गया
मिला मृत प्राणी

फर्श खुदे
निकला मृत आदमी

झील तालाब कुआं
तैर रहा मृत आदमी

ये जीवित प्राणी कहां चला गया ?

कुछ देर चुप रहने के बाद
मैंने अपनी नब्ज टटोली
नतीजा.. वही
मृत प्राणी

ferojkhan.536289

“ज़िंदगी में कुछ फैसले ऐसे भी लेने पड़ते हैं,
जहाँ सही होकर भी हर रोज़ टूटना पड़ता है…
ना जीने की खुशी बचती है, ना मरने की हिम्मत,
बस अंदर ही अंदर घुट-घुट कर मरना पड़ता है…!”

ganeshkumar6818

— उजालों का सन्नाटा —

​"ये तन्हाइयाँ मार ही डालेंगी हमें एक दिन,
कम्बख़्त ये रात भी ढलने का नाम नहीं लेती।

ज़माने भर को बाँटते रहे जो उजाले कभी,
आज उनकी ही तक़दीर में शाम नहीं ढलती।"

-MASHAALLHA

mashaallhakhan600196

बात बढ़ी बगावत पे जा पहुँची
बगावत बढ़ी अदावत पे जा पहुंची

महज इतना ही कहा था सर न झुकायेगें
बात सर की सहादत पे जा पहुँची

बेजार था उनसे, मनाने को मुझको
निगाह उनकी शरारत पे जा पहुँची

सुबह हुआ जन्नत सा आगाज, शाम तक तबीयत कयामत तक जा पहुंची

बरसे हैं बादल, बाद मुददत के
आग बुझते-बुझते राहत पे जा पहुंची




अर्थ

अदावत= दुश्मन
सहादत= शहीद
बेज़ार = नाराज
आगाज= शुरूवात

ferojkhan.536289

☀️कुरडई ची भाजी

उन्हाळ्यात एक किलोच्या कुरडया घरी गव्हाचा चिक तयार करून केल्या होत्या
पांढऱ्या शुभ्र, नाजुक आणि चवदार झाल्या होत्या
नमुना म्हणुन मित्र मैत्रिणी शेजारी नातेवाईक यांना भरपुर वाटुन झाल्या
प्रत्येक सणाला तळून झाल्या
खुप चवदार झाल्या होत्या
जेव्हा डबा तळाशी आला तेव्हा लक्षात आले
कुरडई ची भाजी मात्र राहून गेली 😊😊
लगेच उरलेल्या कुरडई ची भाजी केली

☀️दोन तीन कुरडया घेऊन
भरपुर पाण्यात भिजत घातल्या
छान फुगल्या होत्या
दोन तास भिजल्यावर त्या हलक्या हाताने सोडवून घेतल्या
थोडे तुकडे केले
व त्यातील सर्व पाणी काढून टाकले
व त्या थोड्या पिळून घेतल्या

☀️मोहरी हिंग फोडणी करून
कढीलिंब मिरची व कांदा पारतून घेतला
एक छोटा टोमॅटो चिरुन टाकला
त्यावर या पिळून घेतलेल्या कुरडई टाकल्या

☀️थोडे परतुन किंचित हळद व मीठ घातले
झाकण ठेवून पाच सात मिनीटे वाफ दिली
लुसलुशीत भाजी तयार होती
वर थोडे कोथींबीर खोबरे पेरले..
ही भाजी नुसती खा नाहीतर पोळी अथवा ब्रेड सोबत खा.. मस्त लागते

jayvrishaligmailcom

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rajukumarchaudhary502010

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तुम कहाँ — ठंडी, शीतल-सी छाँव हो, प्रिय।
मैं कहाँ — कड़क-सी धूप हूँ, प्रिय।
तुम शीतल-सी छाँव में मन मोह लेती हो,
मैं कहाँ — कैसे छाँव देता हूँ, प्रिय।
तुम चलने वाली पवन-सी हो,
मैं ठहरा-सा सरोवर हूँ, प्रिय।
तुम पहाड़ों के बीच से निकलने वाली धार हो, प्रिय,
मैं कहाँ — समुद्र का ज्वार-भाटा हूँ, प्रिय।
तुम गले की ठंडक हो, प्रिय,
मैं कहाँ — गले की नमकीन प्यास हूँ, प्रिय।
तुम ठंडी रात की चाँदनी हो, प्रिय,
मैं कहाँ — गर्मी की धूप हूँ, प्रिय।
तुम महकों की राजकुमारी हो,
मैं कहाँ — शहरों का मुसाफ़िर हूँ, प्रिय।
-एस.टी.डी मौर्य ✍️
#stdmaurya

stdmaurya.392853

अपने दोनो कंधो पर  मैं,
अपने घरवालों की इज्जत का बोझ उठाती हूं।
शायद इसीलिए मैं  बेटी कहलाती हूं।

अपने पैरों में मैं
इनके सम्मान की बेड़ियां पाती हूं।
अपने दोनो कंधो पर  मैं,
अपने घरवालों की इज्जत का बोझ उठाती हूं।
शायद इसीलिए मैं  बेटी कहलाती हूं।

अपनी उमर के साथ साथ
मैं उनके‌ लिए और भी
कीमती हो जाती हूं
अगर हूं मैं सुंदर
तो उनके मन में
अनजाना डर बैठाती हूं।
शायद इसीलिए मैं बेटी कहलाती हूं।

अपने दोनो कंधो पर  मैं,
अपने घरवालों की इज्जत का बोझ उठाती हूं।
शायद इसीलिए मैं  बेटी कहलाती हूं।

ना हो जो रंग रुप मेरा
तो भी उनकी चिंता बन जाती हूं।
शायद इसीलिए मैं बेटी कहलाती हूं।
सारे अरमान पूरे कर उनके
विदा हो कर मैं उन्हें छोड़ जाती हूं।
शायद इसीलिए मैं बेटी कहलाती हूं।

अपने दोनो कंधो पर  मैं,
अपने घरवालों की इज्जत का बोझ उठाती हूं।
शायद इसीलिए मैं  बेटी कहलाती हूं।

छोड़ जाने के बाद उनको मैं
जब अपने ढर को जाती हूं
तो खुद को उस घर में
अब मैं मेहमान पाती हूं।
अपने दोनो कंधो पर  मैं,
अपने घरवालों की इज्जत का बोझ उठाती हूं।
शायद इसीलिए मैं  बेटी कहलाती हूं।

शायद इसीलिए मैं बेटी कहलाती हूं।
शायद इसीलिए मैं बेटी कहलाती हूं।

vrinda1030gmail.com621948

joke

rammake323039

joke

rammake323039

some true words 🥹🥹.....

tejendragodara639990

भक्ति

girish1

તારે જો મોક્ષપંથ પર વિચરવું હોય તો 'તારે' કંઈ જ 'કરવાનું' નથી ને સંસારમાં ભટકવું હોય તો બધું જ 'કરવાનું' છે.. - દાદા ભગવાન

વધુ માહિતી માટે અહીં ક્લિક કરો: https://dbf.adalaj.org/37HAQuzK

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dadabhagwan1150

— ज़िंदगी का फलसफा —

कभी-कभी सच कहने से ज़्यादा, सच को सुनना अच्छा है,
तूफ़ान में आगे बढ़ने से बेहतर, खुद को रोकना अच्छा है।

हर बाज़ी जीतना ही ज़िंदगी का नाम नहीं होता,
भलाई जिसमें छुपी हो, वो हार मान लेना अच्छा है।

जहाँ दवा भी असर न करे किसी दर्द-ए-दिल पर,
वहाँ होंठों पर एक छोटी सी मुस्कान रख लेना अच्छा है।

-MASHAALLHA

mashaallhakhan600196

Good Morning 🌄

harshparmar8722

कोई तो पहुंचा दे
मेरे दिल का यह पैग़ाम
याद तुझे कोई कर रहा हैं
ए दोस्त लेकर तेरा नाम

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

कहानी पछतावा से भरी हुई
कविता

कहानी में एक कहानी है
एक पछतावे से भरी हुई व्यक्ति की

पछतावे से भरी हुई दोनों की
अकेलेपन से पैदा हुए हुए दर्द की

उन सपनों की जो कहानी पूरी नहीं हुई



कहानी में एक कहानी है एक हवा की
यादों की भूली हुई वादों की
उन दिनों की जब आंखें तुम्हें देखे हुए थकते नहीं थे
उस वक्त की जब तुम्हारे सिवा मुझे कोई और भाता नहीं था


पर कहानी एक कहानी ही बनकर रह गई
वक्त किसी का सगा नहीं होता
और यह वक्त कहानी की तरह बीत गई


बीते हुए वह दोनों में शायद कुछ नहीं चाहिए था
तुम्हारे सिवा


पर अब ऐसा नहीं है
मुझे सब कुछ चाहिए
मैं भूल गई तुम्हें देखना
और नजर फेर कर
तुमसे दूर कहीं देखा तो
देखा मैं तुम्हारे साथ भी तो पूरा नहीं हूं


और पूरी होने की तलाश में
मैं निकल परी अल्हार पुरवाई बनकर दौड़ते हुए
फूलों के बादियो से शहर की तरफ

जहां वह फूलों की वादियां नहीं है
वह एहसास नहीं है
वह सुकून नहीं है


यहां बस राहों पर बिखरे हुए कांटे हैं
दर्द है गम है अकेलापन है
और पछताते हुए मैं


अब सोचती काश रुक जाती
मैं वहां फिर से नजरे घूमते हुए तुम्हें देखती
और फूलों की तरफ मुस्कुराती
और तुम्हारे साथ ही मुकम्मल होने की कोशिश करती


पर मैं वहां तुझ में खुद को पा रही थी
मुझ में खुद को नहीं देख पाई
इसीलिए भागना पड़ा

फूलों के बादीयो से निकाल कर
कांटों से फस्ते पत्थरों से टकराते हुए
लाहु लुहान पैरों के साथ


तब तलक भागति रही
जब तलक मैं खुद को खुद में नहीं देखा



कहानी यही है
हम बीते दिनों के पछतावे में हमेशा कैद हो जाते हैं
और आखरी समय में हम खुद को दोख नहीं पाते


और यही तो पछतावा है
हम तब भी खुद के नहीं थे
और आखिरी समय पर भी खुद के नहीं हुए
बस आंखें बंद करते हुए
तुम्हारे चेहरा नजरों के सामने था

abhinisha

Good Night 🌉

harshparmar8722

_Mohiniwrites

neelamshah6821

बचपन

ना देख मुझे यूँ तमन्नाई नजर से
अभी कहाँ है उमर मेरे दिल लगाने की

जवानी

ना देख मुझे यूँ तमन्नाई नजर से
अभी बहुत बाकी है उमर मेरे दिल लगाने की

बुढ़ापा

ना देख यूं मुझे यूँ तमन्नाई नजर से
अब कहाँ बाकी रही उमर मेरे दिल लगाने की

ferojkhan.536289