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🌸एक ख़ालीपन-सा था🌸

एक ख़ालीपन-सा था, कभी इस सफ़र में,
तुम मिले तो मुसाफ़िर भी हमसफ़र लगे।

वक़्त की बेरुख़ी का भी अजब दस्तूर है,
जो अपने थे, वही आज बेख़बर लगे।

जब से तोहमतों का धुँआ उठा मेरे नाम पर,
हर आईना, हर चेहरा मुझे मुख़्तसर लगे।

हमने तो निभाई थी रिश्तों की हर रस्म,
मगर उन्हें हमारे जज़्बात बेअसर लगे।

अब न शिकवा है, न कोई गिला ज़िंदगी से,
जो मिला, वही मुक़द्दर का हुनर लगे।

✍️ — बेनी सागर

benisagar

💯✅

monaghelani79gmailco

" अरे नकारात्मकता "
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अरे नकारात्मकता
शायद तुझको भान नहीं है,
इस जीवन में, सुन,
तेरा कोई स्थान नहीं है........।


बाग बगीचों में दिनदिन भर
ओल्हा पाती खेले,
गाँव, गली,  पौढ़ी, पगडंडी, 
काँटा, कूशा झेले,
गाय  चराए,    गोबर   फेंके,  
चारा पानी ढोए,
सिर के ऊपर, लहन लादकर, 
मुस्कुराहटें बोए,
सबको है मालूम
यहाँ कोई अनजान नहीं है....
इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है....।


भले नियति ने हमें,  हमेशा,
नंगे पाँव चलाया,
भले, चटकती दोपहरी ने, 
नंगी पीठ जलाया,
अरे,  भले ही अपने हिस्से,
सूखे मौसम आए, 
रोटी चटनी, गुण,अचार सब
चटखारे से खाए,
इन सब बातों में अपना
कोई अपमान नहीं है.....
इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है......।


बदरी बरखा शीत घाम सब
सम स्वभाव से काटे
दुख  विपत्ति भी,  हँसते हँसते, 
हाथों हाथों बाँटे
अपनी  जिद है,  चुनौतियों से,
टकराते रहने की,
कठिनाई को सोच समझकर
सुलझाने,सहने की,
यहाँ तनिक भी कुंठा का
आदान-प्रदान नहीं है....
इस जीवन में, सुन, तेरा कोई स्थान नहीं है.......।

@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही

vijaypshahi

प्रकृति महाकाव्य
भाग–1 : सृष्टि का प्रथम प्रभात
जब न समय का कोई बंधन था, न दिशाओं का कोई नाम,
जब मौन स्वयं ध्यान में लीन था, न था जीवन, न था धाम।
तब शून्य की असीम निस्तब्धता में, एक दिव्य स्पंदन जागा,
अनंत चेतना की पहली लहर ने सृष्टि का स्वर्णिम द्वार खोला।
उस प्रथम स्पंदन से जन्मी ज्योति, ज्योति से नव विश्वास हुआ,
विश्व-वृक्ष की पहली कोंपल फूटी, जीवन का मधुमास हुआ।
गगन ने फैलाई नीली चादर, धरती ने आँचल फैलाया,
प्रेमिल प्रकृति ने अपने कर से जग का प्रथम श्रृंगार सजाया।
अरुण किरण की प्रथम मुस्कान जब पूर्व दिशा से झाँकी थी,
ओस-बिंदुओं की प्रत्येक लड़ी मानो नभ से उतरी पाँखी थी।
हर तिनका स्वर्णिम दीप बना, हर पत्ता मोती-सा चमका,
मानो ईश्वर ने रंगों से नव सृष्टि का चित्र स्वयं रच डाला।
धीरे-धीरे मंद पवन ने जीवन-वीणा को छेड़ दिया,
सोए हुए उपवन के मन में नव उल्लास का भेद दिया।
फूलों ने खोलीं पंखुड़ियाँ, सुगंध बनी मधुमय भाषा,
भँवरों ने गाया प्रेम-गान, मुस्काई हर मधुर अभिलाषा।
नील गगन की असीम गोद में सूरज स्वर्ण-विभूषण पहने,
रश्मि-रथ पर आरूढ़ हुआ वह जग के तम को हरने।
उसके तेज से पर्वत जागे, नदियों ने कल-कल गान किया,
धरती माँ ने पुलकित होकर जीवन का अभिनंदन किया।
चिड़ियों के कोमल कंठों में जैसे वेदों की ऋचाएँ थीं,
कोयल की मधुर पुकारों में अनगिन मंगल-कामनाएँ थीं।
मोर-पंख पर इंद्रधनुष ने अपने सातों रंग सजाए,
प्रकृति ने अपने हर कण में सौंदर्य के दीप जलाए।
धरती बोली—"मैं जननी हूँ, सबको जीवन देना मेरा धर्म,
बीजों में भविष्य छिपा है, प्रेम ही मेरा शाश्वत कर्म।
जो मेरी गोद सँभालेंगे, मैं उनके सपनों को सींचूँगी,
जो मुझसे प्रेम निभाएँगे, मैं उनके जीवन में हरियाली बुनूँगी।"
सरिता बोली—"बहना सीखो, रुकना जीवन का पंथ नहीं,
पत्थर से टकराकर भी मुस्काना ही सच्चा संत नहीं।
मैं गिरि से सागर तक जाती, अपना सब कुछ अर्पण करती,
निस्वार्थ भाव से बहते-बहते, जग की हर प्यास स्वयं हरती।"
पर्वत बोला—"धैर्य धरो तुम, आँधी आए या तूफ़ान,
जो अपने आदर्शों पर टिके, वही कहलाता है महान।
ऊँचाई केवल शिखरों में नहीं, चरित्र की दृढ़ता में होती,
सच्ची विजय उसी की होती, जिसकी नीयत निर्मल होती।"
और तभी... क्षितिज के उस पार से एक नई कथा जन्म लेने लगी— वनों की, नदियों की, ऋतुओं की, जीवन की अनंत लय की...
और तभी क्षितिज की गोद से स्वर्णिम उषा मुस्काई, मानो स्वयं सृष्टि की जननी मंगल आरती गाने आई।
उसके चरणों की आहट पाकर सोया उपवन जाग उठा, हर पत्ती ने ताली बजाई, हर अंकुर नव अनुराग उठा।
अरुणिम आभा के आँचल ने धरती का श्रृंगार किया, हर तिनके को स्वर्णिम करके जीवन का सत्कार किया।
नभ ने नीली चादर ओढ़ी, सूरज ने मुस्कान बिखेरी, मंद पवन ने प्रेमिल स्वर में हर डाली पर वीणा छेड़ी।
दूब-दूब पर ओस की बूँदें मोती बनकर झिलमिलाईं, मानो नभ की अप्सराओं ने धरती पर माला बरसाई।
फूलों ने मुस्काकर बोला— "जीवन का संदेश यही, क्षणभर का यह सुंदर जीवन, प्रेम लुटाओ, द्वेष नहीं।"
गुलाब ने अपनी सुगंधों से मन का हर अँधियारा हर लिया, कमल ने कीचड़ में खिलकर पावन जीवन का अर्थ दिया।
चंपा, चमेली, पारिजात, हर पुष्प बना उपदेशक था, मौन खड़ा हर वृक्ष यहाँ मानो कोई महादेश था।
पीपल बोला—"श्वास बचाओ, मैं ही जीवन का आधार।" बरगद बोला—"जड़ से जुड़कर मिलता है सम्मान अपार।"
नीम हँसकर कहने लगा— "कड़वाहट भी औषधि होती, सत्य कभी-कभी कठोर सही, पर अंततः मंगल ही होती।"
उधर दूर हिमगिरि की चोटी रवि-किरणों से दमक रही थी, मानो योगी ध्यानमग्न होकर ईश्वर से बातें कर रही थी।
उसकी हिम-श्वेत पवित्रता में त्याग-तपस्या का था वास, उसकी निस्तब्धता सुनाती अनगिन युगों का इतिहास।
उसी हृदय से जन्मी सरिता कल-कल करती बह निकली, पत्थरों से टकराकर भी मुस्काती हुई आगे निकली।
उसने गाकर यही सुनाया— "रुकना मेरा धर्म नहीं, जो जीवन में चलते रहते, उनके लिए असंभव कुछ नहीं।"
मंद समीर बहती जाती, हर थके मन को सहलाती, बिना किसी प्रतिफल की आशा स्नेह-सुगंध लुटाती जाती।
कोयल की मधुरिम तानों से वन का कण-कण गूँज उठा, भँवरों के मृदु गुंजन से फूलों का मन भी झूम उठा।
मोर पंख फैलाकर बोला— "जब बादल का प्यार मिलेगा, सूखी धरती का हर कण भी फिर नवजीवन से भर जाएगा।"
प्रकृति का प्रत्येक कण जैसे जीवन का गुरुकुल बन बैठा, जो भी इसके पास ठहरा, ज्ञान का सागर वह ऐंठा नहीं, विनम्र होकर लौटता।
किन्तु... समय की धारा में कहीं एक नया अध्याय भी लिखा जा रहा था। जहाँ प्रकृति का यह अनुपम वैभव मानव की परीक्षा लेने वाला था...
सागर बोला मंद लहर से—"गहराई का मोल समझना,ऊपर उठती हर लहर सेअंतर का भी बोल समझना।

जो जितना गंभीर बनेगा,उतना ही विशाल कहलाए,अहंकारों की नाव सदा हीमध्य भँवर में डूबती जाए।"

अंबर ने तब बाँहें फैलाकरधरती को आशीष दिया,सूरज ने स्वर्णिम किरणों सेजीवन का नव बीज दिया।

संध्या आई लाल चुनरियाधीरे-धीरे ओढ़े हुए,दिनभर के श्रम से थके गगन कोस्नेहिल स्पर्श से जोड़े हुए।

चंदा अपने रजत रथ परनभ के पथ से उतर पड़ा,तारों की दीपावली लेकररजनी का उत्सव निखर पड़ा।

जुगनू छोटे दीप बनाकरअँधियारे से युद्ध करें,संदेश यही संसार को दें—"छोटे होकर भी प्रकाश भरें।"

रात नहीं केवल अंधकार,वह तो चिंतन का आलय है,जो स्वयं से मिलने निकले,उसके लिए यही शिवालय है।

दूर किसी वन की निस्तब्धता मेंऋषियों का तप गूँज रहा था,वेदों का पावन उच्चारणपवन-पवन में घूम रहा था।

यज्ञाग्नि की उठती ज्वालाआकाशों को छू लेती थी,हर मंत्रध्वनि मानव-मन कीमलिनता को धो देती थी।

गौओँ की मधुर रंभाहट मेंममता का अमृत बहता था,निर्मल बालक की मुस्कानों मेंईश्वर स्वयं ही रहता था।

धरती का प्रत्येक कण तबतीर्थ समान पवित्र बना,हर वन, हर उपवन, हर सरितामानो देवालय चित्र बना।

प्रकृति केवल दृश्य न थी,वह चेतन का विस्तार बनी,कण-कण में परमात्मा कीअद्भुत, अमर झंकार बनी।

किन्तु समय कभी रुकता कब है?युग की धारा चलती जाती,नई सभ्यताओं के संग-संगनई कहानी जन्मी आती।

मानव आया बुद्धि लिए,स्वप्न लिए, विज्ञान लिए,पर उसके भीतर छिपा हुआलोभ भी था, अभिमान लिए।

जिस धरती ने जन्म दिया था,क्या वह उसका मान रखेगा?या अपने ही स्वार्थों मेंउसका हर वरदान हर लेगा?

क्या वन फिर भी गान सुनाएँगे?क्या नदियाँ निर्मल बह पाएँगी?क्या पर्वत की गौरव-गाथाआने वाली पीढ़ी गाएगी?

इन प्रश्नों को हृदय में लेकरउषा मौन खड़ी रह जाती,पवन किसी अनजाने भय सेधीरे-धीरे सिसकन गाती।

पर आशा का दीप बुझा नहीं,विश्वास अभी भी जीवित था,क्योंकि हर नवजात शिशु की आँखों मेंप्रकृति का भविष्य लिखित था।

यदि मानव फिर प्रेम चुनेगा,वन फिर हरियाली ओढ़ेंगे,सूखी धरती के अधरों परमेघ अमृत की बूँदें छोड़ेंगे।

यही प्रथम प्रभात का व्रत था,यही सृष्टि का पहला गान,प्रकृति ही जीवन की जननी,प्रकृति ही मानव की पहचान

sandeepadventurestories

good morning 🌥️☔🌦️😊
Jay shree Krishna 🙏

nikitavinzuda6548

ग़ज़ल

🌸गुप्तगू🌸

नज़रे हटाकर मुझसे कुछ गुफ़्तगू आज कर,
तोड़कर सारे झिझक अपनी मुझसे भी तकिया कलाम कर।

मैं कौन सा भला तेरा दुश्मन हूँ, सच न सही बेफुजूल ही कुछ बात कर,
कैसी शर्म हया समेटी हो आँखों में, मन से न सही बेमन ही कुछ सवाल कर।

मैं भी कहाँ जानकार हूँ मोहब्बत के रस्मों का, कुछ मैं करूँ कुछ तू भी शुरुआत कर,
सिलसिला मोहब्बत का सुना है बातों से चलता है, कभी धूप कभी छाँव होने का एहसास कर।

क्यों हिचकिचाहट भरी है तेरे कदमों में, थोड़ा मैं चलूँ थोड़ा तू चलने को तैयार कर,
मंज़िल आ जायेगा करीब एक दिन सनम, धैर्य मै रखा हूँ थोड़ा तू भी इंतज़ार कर।

✍️बेनी सागर

benisagar

सुबह की हवा ने छूकर पूछा,
आज भी उसी का इंतज़ार है...?
मैंने मुस्कुराकर कहा—कुछ आदतें उम्र भर नहीं बदलतीं। 🌿💕

narayanmahajan.307843

my story🥹

gulaboo22

એક રાહ છે, જેનો નિર્ણય સમય કરશે…
અને એક પ્રેમ છે, જે મને વધુ શુદ્ધ બનાવે છે. 🤍

હું રાહમાં ખોવાઈ નહીં જાઉં,
હું પ્રેમ સાથે પણ મારા રસ્તે આગળ વધતી રહીશ. 🌸

મારો પ્રેમ સાચો હોઈ શકે છે,
પણ મારું જીવન પણ એટલું જ મૂલ્યવાન છે. ✨

divyadesaidivu2856gmail.com192901

ठंडी हवा के झोंके थे,साथ पहाड़ों के साए थे,
बैठी थी मैं आंगन में,
एक अजब सी चाहत साथ में।
नजर टिकी थी दूर कहीं,पर्वत के शिखर पर,
कोई खोई सी सोच रही,मैं रात भर,
बस रात भर।चांद की वो रोशनी थी,तारों का वो घेरा था
,उस ऊंचे से पर्वत पर
,मानो जादू का कोई डेरा था।मां से पूछा—
मां बोलो,क्या छुपा है उस शिखर पर?
मां हंसकर बोली—
कुछ भी नहीं,बस बर्फ जमी है वहां पर।
पर मन यह मेरा माना नहीं,
नजरें टिकी थीं शिखर पर,
व्याकुल होकर सोच रही
,आखिर क्या है उस शिखर पर?
अब मन में एक आस जगी है
,सपनों की एक प्यास जगी है,
उस आसमान को छूने की,
अब एक नई जिद लगी है।
हां, मुश्किल राहें पार कर
,मैं एक दिन जाऊंगी,जमाना देखेगा जब मैं,
अपने हौसलों का परचम,
उस शिखर पर लहराऊंगी!

nandaniarya.arya

ममता गिरीश त्रिवेदी 🌹 की कविताएं ✍️

mamtagirishtrivedi740648

" જીવનમાં શોખ અને જુસ્સો એટલા હોવા જોઈએ કે દુઃખ પણ રોજ તમારી પ્રતીક્ષામાં બેસે "
-✍️ ગોપાલ🪈

saraiya80gmailcom

મોહમ્મદ રફી સાહેબની આજે 46 મી પુણ્ય તિથિ છે.

ગાયકી કે તેરે અંદાઝ નિરાલે થે
આવાઝગી કે તેરે સુર નિરાલે થે
હર કલાકાર કો ફીટ હો જાતી થી
આવાઝ તેરી
ક્યોંકિ ગીત મે તેરે જાદુ નિરાલે થે.

amiralidaredia175421

વ્યસન એટલે શું તેનો સાચો અર્થ સરળ ભાષામાં સમજવા માટે અહીં ક્લિક કરો: https://dbf.adalaj.org/OJbYwL6y

#addictions #addictionawareness #selfhelp #selfimprovement #dadabhagwanfoundation

dadabhagwan1150

मसकारा

इतवार बुझा-बुझा बीतता,

सोमवार नुकीला, धारदार।

आस्तीन चढ़ाए, श्वेत बरकरार,

थिरकती उंगलियां दिन बिताए।

भारी पत्थर उठाए, सजाए,

चेहरे पर तना एकल भाव जताए।

डटी हिम्मत सोखती, त्रुटि भुलाए,

जब टूटा मन खुले, अश्रु झर जाए।

मसकारा रिसता, उतरता सुख जाए,

एकल भाव शाखाओं सा फूट जाए।

स्नेह में बंधी कमजोर डोरी जुड़ जाए,

जब वह खुद पिघलकर दूजे में समाए।

चंद मोती लड़ियां बिखर जाए,

पूरा दफ्तर कमरे में समा जाए।

निशा थकान गलाए, पत्ता हरा होए,

पौ फटते ही सर्वत्र अतीत दोहराए।

इतवार बुझा-बुझा बीतता,

सोमवार नुकीला, धारदार।

©DSR

digvijaysinghrathore332439

ममता गिरीश त्रिवेदी 🌹 की कविताएं ✍️

mamtagirishtrivedi740648

ज़ालिम दुनियाँ किसी को कुछ
मनचाहा करने कहाँ देती हैं
करने की तो बात ही छोड़ दो
अरे चैन से मरने भी कहाँ देती हैं

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

यादों को तस्सब्बुर में आने दो
फिर से गम को सजा पाने दो

भटका रहा हूँ कबसे इन गलियों में
अब राहें मुकम्मल हो जाने दो
फिर से गम को सजा पाने दो

कौन है हमदर्द भला किसी का यहाँ
यह भरम भी अब तोड़ आने दो
फिर से गम को सजा पाने दो

भर आया है आँखों में हर सय का अक्स कतिल
अब बनकर आंसू बूंद- बूंद बह जाने दो
फिर से गम को सजा पाने दो

बुझ रही है सांसे तो करे क्या जीने की ख्वाहिश
हो मिलन तुमसे बस ऐेसी तलब जागाने दो
फिर से गम को सजा पाने दो

✍️बेनी सागर

benisagar

शीर्षक :- कुछ कर दिखाने का जुनून🏆🎉
(Part =1) comment for part 2
Especially for Neets, UPSC, CA, CS, etc students.

संघर्षों का पहाड़ टूटा,
फिर भी हार ना माना था।
धरती पर बोझ ना बनकर,
कुछ करने को जो ठाना था।
भीड़ में ना घुलकर हमने,
अलग निखरना चाहा था।
कठिनाई सामने आती रही,
फिर भी हार ना माना था।

ashuashu858439

Radhe Krishna

skptech

*"शिक्षा - जीवन का उजाला"*

कागज़ और कलम से रिश्ता जोड़े,
वो नाम है *शिक्षा* प्यारी।
अंधेरों को चीर कर निकले,
ज्ञान की वो उज्ज्वल तारी।

माँ की गोद पहली पाठशाला,
गुरु का आशीष पहला मंत्र।
"अ से अनार" से शुरू होकर,
"ज्ञ से ज्ञान" तक का ये तंत्र।

पंछी को मिले दो पंख जैसे,
वैसे ही इंसान को दो आँखें।
एक आँख से देखे संसार,
दूसरी से पढ़े किताबों की भाषा।

*शिक्षा* नहीं पूछती जात-पात,
*शिक्षा* नहीं देखती अमीर-गरीब।
झोपड़ी में बैठा लड़का भी,
बन सकता है देश का नसीब।

देखो सावित्री बाई फुले को,
जिन्होंने जलाया ज्ञान का दीप।
काँटे चुभे, पत्थर लगे,
फिर भी न मानीं हार, न कीं चूक।

देखो अब्दुल कलाम को,
मिसाइल मैन से राष्ट्रपति बने।
छोटे से रामेश्वरम से उठकर,
पूरे विश्व में नाम रोशन किए।

ये कमाल किसका है dear?
बस *शिक्षा* का, बस *ज्ञान* का।
जो झुक कर सीखता है,
वही एक दिन आसमान छूता है।

*शिक्षा* है राधा का प्रेम,
जो मीरा को भक्ति सिखाए।
*शिक्षा* है कृष्ण की गीता,
जो अर्जुन को कर्म का रास्ता दिखाए।

*शिक्षा* है माँ आदिशक्ति,
जो अज्ञान के राक्षस को मारे।
*शिक्षा* है जगन्नाथ की रसोई,
जहाँ सबको बराबर प्रसाद मिले।

आज मोबाइल का ज़माना है,
ऑनलाइन क्लास, डिजिटल ज्ञान।
पर गुरु का मान वही है,
विद्यार्थी का सम्मान वही है।

किताबें दोस्त बन जाती हैं,
लाइब्रेरी मंदिर लगती है।
हर सवाल का जवाब मिलता,
हर समस्या का हल दिखती है।

पर अफसोस, कुछ लोग आज भी,
गमंड में डूबे रहते हैं।
पढ़े-लिखे होकर भी,
दूसरों को छोटा समझते हैं।

अरे मूर्ख! *शिक्षा* का मतलब ही यही,
कि विनम्र बनो, सेवा करो।
जैसे नदी झुकती है तभी,
सागर तक पहुँच पाती है।

पेड़ जितना फलदार होता,
उतना ही झुक जाता है।
इंसान जितना ज्ञानी होता,
उतना ही विनम्र हो जाता है।

इसलिए dear, पढ़ो, लिखो, सीखो,
रुको मत, थको मत।
हर दिन एक नया सबक,
हर रात एक नया संकल्प।

देश तभी आगे बढ़ेगा,
जब हर बच्चा स्कूल जाएगा।
बेटी भी पढ़ेगी, बेटा भी पढ़ेगा,
तभी भारत विश्व गुरु कहलाएगा।

*शिक्षा* है वो हथियार,
जिससे गरीबी मिटती है।
*शिक्षा* है वो दवा,
जिससे कुरीति कटती है।

आओ प्रण लें आज हम,
ज्ञान का दीप जलाएँगे।
अपने लिए, अपने घर के लिए,
और पूरे समाज के लिए।

क्योंकि अंत में यही सच है:
*"सा विद्या या विमुक्तये"*
अर्थात - *वही विद्या है जो मुक्ति दिलाए*।

*जय जगन्नाथ* 🙏🌼
*राधे राधे* 🦚

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skptech

પાણી /જળ

eshahajola

जयभीम

sureshbansode