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New bites

Self respect quotes

kattupayas.101947

Hello Dear Readers!

I am back with a new, exciting sci-fi NOVEL only for you all.

Into The Whispering Dark

In a world driven by data, what happens when the math stops making sense?
Set in 2098, Into The Whispering Dark follows Owen Anderson, an MIT prodigy who discovers a code that shouldn't exist. It’s a signal hidden beyond every digital system on Earth, leading him to the frozen silence of Antarctica.

This isn't just a sci-fi mystery; it’s a story about:
- The Human Spirit: Can imagination survive in an age of algorithms?
- Forbidden Science: What lies beneath the ice that humanity isn't ready for?
- The Cost of Truth: A journey of unfinished love and impossible choices.

Start Reading Today
If you enjoy hard science fiction, haunting mysteries, or stories that challenge our digital future, I’d love for you to check it out.

The Chapters are rolling out soon...
You can get the whole Novel on Amazon Kindle or Amazon Store.

I hope my Novels give you a good Time and you all like it.

vedvyas

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Into The Whispering Dark

In a world driven by data, what happens when the math stops making sense?
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This isn't just a sci-fi mystery; it’s a story about:
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vedvyas

कह दिया उसने – कब तक इलाज कराऊँगा,
काश कोई पूछे… ये बीमारी क्या मैंने खुद लिखी है अपनी किस्मत में कहीं?
इलाज मजबूरी है, कोई शौक नहीं मेरा,
तानों में दबकर भी जीना पड़ता है हर रोज़ सवेरा।
लाचार हूँ इसलिए हाथ फैलाना पड़ता है,
वरना किसी को भीख बनकर जीना अच्छा नहीं लगता है।

archanalekhikha

🎵 नया गीत: “संसार एक डेरा” 🎵
मुखड़ा (Chorus):
संसार त एउटा डेरा हो, बस केही पलको बास,
आज हाँसो, भोलि आँसु, यही जीवनको आस।
खाली हात आए थियौँ, खाली हात नै जानु छ,
दुःख–सुख सबै यहाँ, एकदिन छुट्नै जानु छ।
अन्तरा 1:
सुनौलो सपना बुन्छौँ, बालुवामा घरजस्तै,
समयको एक झोक्का, सब बगाइ लैजस्तै।
आज साथ छन् आफ्ना, भोलि याद मात्र बाँकी,
जन्म र मृत्युबीचको, यो सानो कथा साँकी।
मुखड़ा (Repeat):
संसार त एउटा डेरा हो, बस केही पलको बास,
आज हाँसो, भोलि आँसु, यही जीवनको आस।
अन्तरा 2:
धन, पद, अभिमान, सब यहीँ छुट्ने हो,
साँचो कर्म र माया, मात्र साथ जाने हो।
जो रोयो, जो हाँस्यो, सबै बराबर यहाँ,
माटोले बोलाउँदा, चुपचाप जानु पर्छ जहाँ।
ब्रिज:
किन त घमण्ड गर्छौ, दुई दिनको जिन्दगी,
माया बाँड, कर्म गर, यही हो साँचो बन्दगी।
मुखड़ा (Final):
संसार त एउटा डेरा हो, बस केही पलको बास,
नाम होइन कर्म बाँचोस्, बाँकी सब विनास।
अन्त (Outro):
आज छ सास, आज छ मौका, राम्रै गरौं काम,
भोलि के हुन्छ कसलाई थाहा, यही हो जीवनको नाम।https://youtube.com/@rajufilmyjunction?si=cCmXX87Yn7XPtluE

rajukumarchaudhary502010

बोलती नहीं, फिर भी लफ़्ज़ कहते हैं — वो ढमक है,
मेरा मौन भी बहुत सी बातें कहता है — वो ढमक है।

मैं टूटकर भी कभी बिखरी नहीं,
वक़्त के सामने खड़ी रहने वाली रहती है — वो ढमक है।

नज़रें झुकी हैं, मगर हिम्मत अब भी ज़िंदा है,
कम शब्दों में गहरा अर्थ बहता है — वो ढमक है।

कोई पूछे अगर इस शायरी के पीछे का नाम,
हल्की-सी मुस्कान से कह देना — वो ढमक है।
DHAMAK😂
(શાયરી)

heenagopiyani.493689

મંદિરમાં જઈએ ત્યારે દર્શન કેવી રીતે કરવા જોઈએ? શિવ, કૃષ્ણ, સાઈ બાબા ના દર્શન કરીએ ત્યારે મૂર્તિ દેખાય છે. શું આને સાચા દર્શન કર્યા કહેવાશે? આત્મજ્ઞાન પામવા અને ખરા દર્શન કરવા વચ્ચે શું સંબંધ રહેલો છે?

https://youtu.be/GZdmp2g6jRw

#spirituality #spiritualvideo #trending #trendingvideo #DadaBhagwanFoundation

dadabhagwan1150

शीर्षक: मखमली शिकन

शाम की रोशनी कमरे में इस तरह दाखिल हो रही थी जैसे कोई बिन बुलाया मेहमान दबे पाँव अंदर आ गया हो। हवा में मोगरे की महक और पुरानी किताबों की एक मिली-जुली गंध थी। देव ने खिड़की के पर्दे को थोड़ा और सरकाया, जिससे रोशनी की एक पतली लकीर प्रीति के चेहरे पर पड़ने लगी।
प्रीति ने अपनी पलकें झुका रखी थीं, जैसे वह रोशनी से नहीं, बल्कि देव की नज़रों से बच रही हो।
"तुम यहाँ क्यों हो, प्रीति?" देव की आवाज़ में एक अजीब सी खुरदराहट थी।
"शायद इसलिए क्योंकि मुझे कहीं और होने का बहाना नहीं मिला," प्रीति ने अपनी रेशमी साड़ी के पल्लू को उँगलियों में लपेटते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक कंपकंपी थी, जो शब्दों से कहीं ज़्यादा गहरा राज़ खोल रही थी।
"बहाने अक्सर सच को छुपाने के लिए बनाए जाते हैं, उसे ओढ़ने के लिए नहीं।" देव उसके करीब आया। उसके जूतों की आवाज़ लकड़ी के फर्श पर एक ताल पैदा कर रही थी।
प्रीति ने सिर उठाया। उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी जो राख होने से इनकार कर रही थी। "सच तो यह है कि तुम मुझसे डरते हो, देव। तुम्हें डर है कि अगर तुमने मुझे छुआ, तो तुम्हारी यह बनाई हुई संजीदगी बिखर जाएगी।"
देव मुस्कुराया, एक ठंडी और जानलेवा मुस्कान। "संजीदगी एक लिबास है, प्रीति। और लिबास उतारे जाने के लिए ही होते हैं।"
उसने अपना हाथ प्रीति के कंधे पर रखा। उसकी उँगलियों का स्पर्श प्रीति की त्वचा पर बिजली की तरह दौड़ा। प्रीति की सांसें तेज़ हो गईं, और उसने अपनी आँखें मूँद लीं।
"क्या तुम जानती हो कि तुम्हारी खामोशी कितनी शोर मचाती है?" देव ने उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया।
"तो फिर इसे चुप क्यों नहीं कर देते?" प्रीति ने पलटकर उसे चुनौती दी। उसकी साँसें देव के चेहरे से टकरा रही थीं।
देव ने अपनी पकड़ मज़बूत की और उसे दीवार से सटा दिया। "तुम शब्दों के जाल बुनना जानती हो, लेकिन शरीर झूठ नहीं बोलता।"
"तो फिर शरीर को ही बात करने दो," प्रीति ने धीरे से कहा, उसका हाथ देव की कमीज़ के बटनों पर ठहर गया था।
उस कमरे की शांति अब एक भारी तनाव में बदल चुकी थी। देव ने धीरे-धीरे प्रीति की साड़ी के पिन को ढीला किया। रेशमी कपड़ा सरक कर फर्श पर गिर गया, जैसे कोई रहस्य खुद-ब-खुद उजागर हो गया हो। प्रीति की त्वचा ढलती हुई धूप में सोने की तरह चमक रही थी।
"देव..." प्रीति के गले से एक दबी हुई आह निकली।
"शशश..." उसने उसकी बात को अपने होंठों से दबा दिया। यह चुंबन लंबा और प्यासा था, जिसमें बरसों की अधूरी इच्छाएं और सामाजिक बेड़ियाँ टूट रही थीं।
देव के हाथों ने प्रीति की कमर के घुमावों को इस तरह महसूस किया जैसे वह किसी कीमती नक्शे को पढ़ रहा हो। प्रीति ने अपनी उँगलियाँ देव के बालों में फँसा दीं, उसे और करीब खींचते हुए। कमरे की हवा गर्म हो गई थी, और हर स्पर्श एक नई कहानी लिख रहा था।
"तुम्हें लगता है कि यह सिर्फ एक रात की बात है?" प्रीति ने हाँफते हुए पूछा, जबकि देव के होंठ उसकी गर्दन के संवेदनशील हिस्से पर थे।
"यह रात की बात नहीं है, प्रीति। यह उस प्यास की बात है जो समंदर पीकर भी नहीं बुझती," देव ने उसे बाहों में भरकर बिस्तर की ओर ले जाते हुए कहा।
चादरों की सरसराहट और दोनों की मिली-जुली साँसों के बीच, वक्त जैसे ठहर गया था। देव का हर स्पर्श प्रीति के भीतर एक नया तूफान उठा रहा था। वह कोई साधारण मिलन नहीं था, बल्कि दो रूहों का एक-दूसरे में इस तरह घुल जाना था कि यह पहचानना मुश्किल हो जाए कि कौन कहाँ खत्म हो रहा है और कौन कहाँ से शुरू।
देव ने प्रीति के जिस्म पर उन जगहों को ढूँढा जिन्हें उसने खुद भी कभी नहीं छुआ था। प्रीति की सिसकारियां उस कमरे के सन्नाटे को तोड़ रही थीं, जो अब किसी संगीत की तरह लग रहा था।
"तुम... तुम बहुत बेरहम हो," प्रीति ने मदहोशी में कहा।
"और तुम बहुत खूबसूरत," देव ने उसके चेहरे को चूमते हुए जवाब दिया।
जैसे-जैसे रात गहराती गई, उनकी दूरियाँ मिटती गईं। पसीने की बूंदें उनकी त्वचा पर सितारों की तरह चमक रही थीं। हर हलचल में एक गहराई थी, हर हरकत में एक अर्थ। वे दोनों उस चरम सीमा की ओर बढ़ रहे थे जहाँ शब्द अर्थहीन हो जाते हैं और सिर्फ अहसास रह जाता है।
जब वह क्षण आया, तो कमरा एक गूँजती हुई खामोशी से भर गया। दोनों एक-दूसरे में लिपटे हुए, तेज़ साँसें लेते रहे, जैसे किसी लंबी दौड़ के बाद सुस्ता रहे हों।
अंधेरा अब पूरी तरह छा चुका था। प्रीति ने अपना सिर देव के सीने पर रख दिया। उसके दिल की धड़कन अभी भी तेज़ थी।
"अब क्या?" प्रीति ने धीरे से पूछा।
देव ने उसके माथे को चूमा और कहा, "अब बस यह शिकन है, प्रीति। जो चादर पर भी रहेगी, और शायद हमारी यादों पर भी।"
उसने प्रीति को अपने पास और सिकोड़ लिया। बाहर दुनिया वैसी ही थी, लेकिन उस कमरे के भीतर, एक पूरी कायनात बदल चुकी थी।

a9560

प्यार की तड़प

शहर की भीड़भाड़ वाली उस शाम में, 'द ओल्ड कैफ़े' की खिड़की वाली मेज पर कबीर बैठा था। सामने वाली कुर्सी खाली थी, लेकिन वहां रखी ठंडी हो चुकी कॉफी बता रही थी कि कोई उम्मीद अभी बाकी है। तभी दरवाज़े की घंटी बजी और मीरा अंदर आई। उसके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था, जैसे तूफ़ान के थमने के बाद की शांति।
"देर हो गई," मीरा ने बैठते हुए कहा। उसकी आवाज़ में कोई माफ़ी नहीं थी, बस एक तथ्य था।
कबीर ने उसे गौर से देखा। "देर अक्सर रास्तों की वजह से नहीं, इरादों की वजह से होती है, मीरा।"
मीरा ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर उसकी आँखें कहीं और थीं। "इरादे तो मौसम की तरह होते हैं, कबीर। बदलते रहते हैं। तुम यहाँ कब से हो?"
"शायद पिछले तीन सालों से। बस आज कुर्सी पर बैठकर इंतज़ार कर रहा हूँ।"
"इतनी लंबी तड़प सेहत के लिए अच्छी नहीं होती," मीरा ने वेटर को इशारा करते हुए कहा।
"तड़प सेहत के लिए नहीं, रूह के लिए होती है। जो सुकून में है, वह ज़िंदा तो है, पर शायद जागृत नहीं।" कबीर के शब्दों में एक धार थी।
"तो तुम जाग रहे हो?"
"मैं उस आग को महसूस कर रहा हूँ जो बुझने से इनकार कर रही है। तुम्हें क्या लगा? तुम शहर छोड़ दोगी, खत लिखना बंद कर दोगी, और सब खत्म हो जाएगा?"
मीरा ने अपनी उंगलियों से मेज पर एक काल्पनिक लकीर खींची। "खत्म तो कुछ भी नहीं होता। बस प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। मेरी ज़िम्मेदारी अब किसी और के प्रति है।"
"ज़िम्मेदारी या समझौता?"
मीरा की आँखों में चमक आई। "क्या दोनों में कोई फर्क है? समाज जिसे समझौता कहता है, उसे निभाने वाला इंसान उसे अपनी जीत समझता है।"
"यह तुम्हारी दार्शनिक बातें मुझे बहला नहीं पाएंगी। तुम्हारी आँखों के नीचे जो काले घेरे हैं, वे रातों की नींद की नहीं, उस तड़प की गवाही दे रहे हैं जिसे तुम दबाने की कोशिश कर रही हो।"
"तुम बहुत ज़्यादा पढ़ लेते हो, कबीर। कभी-कभी पन्ने सादे रहने देने चाहिए।"
"सादे पन्ने ही सबसे ज्यादा शोर करते हैं, मीरा। बताओ, क्या वह तुम्हें वैसे देखता है जैसे मैं देखता था?"
मीरा चुप रही। कैफ़े में बज रहा हल्का संगीत अचानक भारी लगने लगा।
"वह मुझे 'देखता' है, कबीर। उसे मेरी रूह की परवाह नहीं, उसे बस मेरे साथ की ज़रूरत है। और दुनिया में 'साथ' होना ही काफी माना जाता है।"
"तुम्हारे लिए काफी है?"
"मेरे पास विकल्प क्या है?" मीरा की आवाज़ थोड़ी लड़खड़ाई।
कबीर अपनी जगह से थोड़ा आगे झुका। "विकल्प हमेशा होता है। बस हिम्मत की कमी होती है। तड़प का मतलब यह नहीं कि हम दूर हैं, तड़प का मतलब यह है कि हम पास होकर भी वो नहीं कह पा रहे जो दिल में है।"
"कहने से क्या बदल जाएगा? दीवारें नहीं गिरेंगी।"
"कम से कम हवा तो अंदर आएगी।"
तभी मीरा के फोन की घंटी बजी। उसने स्क्रीन देखी—'घर'। उसने फोन काट दिया।
"तुम्हारी चुप्पी का अर्थ गहरा है," कबीर ने तंज किया। "तुम भाग रही हो, लेकिन पैर वहीं जमे हुए हैं।"
"कबीर, प्रेम कोई कविता नहीं है जिसे जब चाहे सुधार लिया जाए। यह एक कड़वा सच है जिसे निगलना पड़ता है।"
"मैंने तो इसे अमृत समझा था।"
"तभी तो आज तुम्हारी प्यास इतनी गहरी है," मीरा ने खड़े होते हुए कहा। "तुम्हें प्यास से प्यार हो गया है, मुझसे नहीं।"
कबीर भी खड़ा हो गया। "प्यास ही तो अस्तित्व का प्रमाण है। जिस दिन तड़प खत्म हो जाएगी, उस दिन कबीर भी मर जाएगा।"
"तो फिर जलते रहो। शायद इसी में तुम्हारी मुक्ति है।"
मीरा मुड़ी और दरवाज़े की तरफ बढ़ गई। कबीर वहीं खड़ा रहा। उसने मीरा को हाथ पकड़कर रोकने की कोशिश नहीं की, क्योंकि उसे पता था कि शरीर को रोकने से रूह की तड़प और बढ़ जाती है।
दरवाज़ा बंद हुआ। बाहर बारिश शुरू हो गई थी। कबीर ने खिड़की के बाहर देखा। मीरा छाता खोल चुकी थी, लेकिन उसका एक कंधा बारिश में भीग रहा था—बिल्कुल वैसे ही जैसे उसकी ज़िंदगी का एक हिस्सा हमेशा अधूरा रहने वाला था।
कबीर ने वेटर को बुलाया। "एक और कॉफी। इस बार थोड़ी और कड़वी।"
वेटर ने हैरान होकर पूछा, "अकेले के लिए सर?"
कबीर मुस्कुराया, "नहीं, इस तड़प के साथ पीने के लिए। यह आज रात मेरे साथ ही ठहरेगी।"
बाहर की सड़कें अब पानी से लबालब थीं, लेकिन कबीर के अंदर की आग ठंडी होने का नाम नहीं ले रही थी। तड़प का अंत मिलन नहीं, बल्कि उस दर्द को गले लगा लेना था जो अब उसकी पहचान बन चुका था।

a9560

🦋... SuNo ┤_★__
{{ प्रेम एक इबादत }}

मोह के कच्चे धागों से, जब रूह
          ये आजाद होती है,

तभी तो सच्चे प्रेम की, असल में
          बुनियाद होती है,

ये महज़ जज़्बात नहीं, ये तो एक
            पावन पूजा है,

इस  इबादत के  सिवा, न कोई
           मज़हब दूजा है,

इस प्रेम में तड़प तो हो, पर पाने
         की कोई ज़िद न हो,

जहाँ बंदिशें न हों कोई, और न
            ही कोई हद हो,

ये वो  दरिया है  जिसका, कोई
         किनारा नहीं होता,

प्रेम में डूबा  हुआ शख्स, कभी
          बेचारा नहीं होता,

न ये ‘Gender, को  देखे, न ये
        अपना-पराया जाने,

ये तो बस रूह की भाषा, और
     निस्वार्थ होना पहचाने,

कभी ये दोस्त की हँसी में, सुकून
         बनकर झलकता है,

तो कभी ये माँ की ममता में अटूट
           बनकर बहता है,

पिता के उस भरोसे में भी, ये प्रेम
           ही तो शामिल है,

भाई-बहन के रिश्तों की ये प्रेम ही
              तो मंज़िल है,

बड़ा ही  खूबसूरत सा, ये रूहानी
                एहसास है,

बिना  स्वार्थ के जो किया जाए
    वही सबसे खास है…❤️

🌹 राधे  राधे 🌹
#Ꮆᴏᴏᴅ_𝕄𝗼𝗥𝗻𝕚𝗡𝕘
╭─❀💔༻ 
╨──────────━❥
♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦
#motivatforself 😊°☜
╨──────────━❥

loveguruaashiq.661810

साहूकार का कर्ज

धूल और धूप से सनी दोपहर में विमल का कच्चा आंगन किसी पुरानी अदालत जैसा लग रहा था। लाला जगत नारायण, जिनके कुर्ते की सफेदी उनकी नीयत के बिल्कुल उलट थी, नीम की छांव में बिछी चारपाई पर ऐसे बैठे थे जैसे पूरा गांव उनकी जागीर हो।
"विमल, समय रेत की तरह हाथ से फिसलता है। और ब्याज? वह तो हवा की तरह है, जो दिखती नहीं पर दम घोंट देती है," लाला ने अपनी उंगलियों में फंसी सोने की अंगूठी घुमाते हुए कहा।
विमल ने अपनी फटी हुई कमीज का कोना मरोड़ा। "लाला, फसल इस बार सिर्फ मिट्टी बनकर रह गई। उम्मीद थी कि..."
"उम्मीदें पेट नहीं भरतीं, जवान," लाला ने बीच में ही टोक दिया। "बैंक कागज मांगता है, और मैं? मैं बस भरोसा मांगता हूं। लेकिन भरोसा भी अब कर्ज के नीचे दब गया है।"
विमल की पत्नी, सुजाता, दरवाजे की ओट से सुन रही थी। वह बाहर आई, आँखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी चमक थी। "लाला जी, भरोसा तो हमने किया था। उस दिन जब आपने कहा था कि ये पैसे हमारी बेटी की शादी के लिए नहीं, हमारे भविष्य के लिए हैं। क्या कर्ज सिर्फ पैसों का होता है?"
लाला ने एक ठंडी मुस्कान बिखेरी। "बेटी, दुनिया गणित पर चलती है, जज्बात पर नहीं। हिसाब बराबर करना ही धर्म है।"
तभी विमल का छोटा भाई, आर्यन, जो शहर से लौटा था, आंगन में दाखिल हुआ। उसने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ लिफाफा निकाला। "हिसाब ही करना है न लाला? लीजिए, ये आपके मूल और ब्याज की पहली किस्त।"
लाला की भौहें तन गईं। "शहर ने तुम्हें चालाकी सिखा दी है, आर्यन। पर याद रखना, कागजों पर स्याही मेरी है।"
"स्याही आपकी हो सकती है, पर पसीना हमारा है," आर्यन ने तीखे स्वर में कहा। "आप कर्ज देते हैं ताकि इंसान कभी खड़ा न हो सके। आप चाहते हैं कि हम आपकी परछाईं में जिएं।"
विमल घबरा गया। "आर्यन, तमीज से बात कर। लाला ने हमारी मदद की थी।"
"मदद?" आर्यन हंसा, पर उस हंसी में कड़वाहट थी। "भाई, यह मदद नहीं, निवेश था। लाला जानते थे कि बारिश नहीं होगी। वे जानते थे कि आप चुका नहीं पाएंगे, और फिर वे इस जमीन को अपनी हवेली का हिस्सा बना लेंगे। क्या मैं गलत कह रहा हूं, लाला जी?"
आंगन में सन्नाटा पसर गया। लाला जगत नारायण ने अपना चश्मा साफ किया और विमल की ओर देखा। "तुम्हारा भाई बहुत बोलता है, विमल। पर क्या यह जानता है कि जिस लिफाफे को यह 'आजादी' समझ रहा है, वह सिर्फ एक नई जंजीर की शुरुआत है?"
सुजाता ने हस्तक्षेप किया, "कैसे?"
"क्योंकि," लाला उठे और विमल के कंधे पर हाथ रखा, "कर्ज सिर्फ रुपयों का नहीं होता। जो इज्जत मैंने इस गांव में तुम्हें बख्शी, उसका ब्याज कैसे चुकाओगे? लोग कहेंगे कि विमल का भाई चोरी करके लाया या भीख मांगकर। तुम्हारी रीढ़ की हड्डी तो मैंने उसी दिन तोड़ दी थी जब तुमने पहली बार मेरे सामने हाथ फैलाए थे।"
विमल का सिर झुक गया। उसे अहसास हुआ कि लाला सही थे। पैसे चुकाए जा सकते थे, पर वह अहसान? वह नजरें जो अब कभी लाला से नहीं मिल पाएंगी?
"मैं पैसे वापस ले जाऊंगा," लाला ने लिफाफे को छुए बिना कहा। "कल आना। कागजात तैयार मिलेंगे। लेकिन विमल, याद रखना, जब तुम आजाद हो जाओगे, तो तुम सबसे ज्यादा अकेले होगे। क्योंकि गुलाम को कम से कम मालिक का साथ तो मिलता है, आजाद आदमी को खुद का बोझ खुद उठाना पड़ता है।"
लाला अपनी लाठी टेकते हुए बाहर निकल गए। पीछे छोड़ गए एक ऐसा आंगन जहां कर्ज खत्म हो चुका था, पर बोझ पहले से ज्यादा महसूस हो रहा था।
आर्यन ने लिफाफा मेज पर पटक दिया। "भाई, हम अब किसी के कर्जदार नहीं हैं।"
विमल ने अपनी खाली हथेलियों को देखा और धीमी आवाज में बोला, "पैसे दे दिए आर्यन, पर क्या हम वाकई आजाद हुए? या अब हम उस खालीपन के कर्जदार हो गए जो लाला ने हमारे अंदर छोड़ दिया है?"
धूप ढल रही थी, और उस घर की दीवारों पर परछाइयां लंबी होती जा रही थीं—बिल्कुल उस कर्ज की तरह, जो कागज पर तो मिट गया था, पर रूह पर अपनी लिखावट छोड़ गया

a9560

" ઊડી ગયું પંખી ટહુકીને "

જનારાં તો ચાલ્યાં ગયાં અમને એકલાં મૂકીને.
ને અમે ભોગવ્યો એકાંતવાસ એમનું નામ ઘૂંટીને.

સતત મહેસૂસ થયા કરે ટેરવે, સ્પંદન સ્પર્શનાં!
અનિમેષ નજરે દેખું છું, બસ એ જ અંગુઠીને.

એકલતા શું છે? એ, એ ડાળને જઈને પૂછો!
ઊડી ગયું છે પંખી જ્યાંથી, હમણાં ટહુકીને.

પ્રેમ, પ્યાર, વ્હાલનો મતલબ એ શું જાણશે?
જે, કરે છે દોસ્તી તો પણ કરે છે પૂછી પૂછીને.

કાંગરાય ખરવા લાગ્યા આજ એ કિલ્લાના,
ઉભો 'તો તવારીખે ક્યારેક જે ગગનચુંબીને.

જખમો પ્રણયનાં રૂઝાતાં નથી હવે તો કોઈ,
સ્મિત પણ લઈ ગયાં છે જતાં જતાં લૂંટીને.

ડામ પ્રણયનાં કંઈક એવા લાગ્યા છે "વ્યોમ"
કે લાગણી પણ દર્શાવાય છે હવે ફૂંકી ફૂંકીને.

✍...© વિનોદ. મો. સોલંકી "વ્યોમ"
જેટકો (જીઈબી), મુ. રાપર

omjay818

जो हमारे साथ अच्छा करते हैं,
उनका शुक्रिया।
जो हमारे साथ अच्छा नहीं कर रहे हैं, उनका?
उनका भी शुक्रिया करना है।
उनका शुक्रिया हम इसलिए करते हैं, क्योंकि उनके हमारे जीवन में आने की वजह से हमारा अहंकार घटता है, आत्मा की शक्ति बढ़ती है।
हम उनकी वजह से झुकते हैं,
झुकते हैं और झुकते हैं।
वो झुकें या नहीं झुकें,
उनकी वजह से हमारी शक्ति बहुत बढ़ जाती है।
उनकी वजह से हमारे अंदर क्षमा करने की ताकत आती जाती है। उनकी वजह से हमारे अंदर दूसरों के व्यवहार में भी स्टेबल रहने की ताकत आती जाती है।
उनका तो सबसे ज्यादा शुक्रिया करना चाहिए।
सबसे ज्यादा शुक्रिया करना चाहिए। थैंक यू, थैंक यू।
आप करते जाओ,
मैं राइट करते जाओ तो मेरी ताकत क्या होती जाएगी?
बढ़ती जाएगी।
अगर हमारे सब महिमा ही करते रह गए,
तो तो पता ही नहीं चलेगा,
किसी दिन अहंकार ही न बढ़ जाए।

ganeshkumar6818

બેઠો છું, કારણ ના પૂછો,
મૌન છું, ભારણ ના પૂછો,

મૌહ નથી, ત્યાગ ના પૂછો,
કાચો છું, તારણ ના પૂછો,

વાક નથી, સત્ય ના પૂછો,
સાદો છું, પ્રમાણ ના પૂછો,

સ્મિત નથી, વાત ના પૂછો,
ઉભો છું, ખબર ના પૂછો,

બોલું છું, અર્થ ના પૂછો,
શબ્દો છું, ઉંડાણ ના પૂછો.

મનોજ નાવડીયા

manojnavadiya7402

🙏🙏सुप्रभात 🙏🙏
🌹 आपका दिन मंगलमय हो 🌹

sonishakya18273gmail.com308865

Good morning friends.. it's another cloudy day. stay chill

kattupayas.101947

​"प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम"🩷 पढ़िए "सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए क्या प्यार की बलि देना ज़रूरी है?" पर समय का पहिया घूमता है और हिसाब बराबर करने के लिए वापस आता है।

leoleo315756

पढ़िए मेरी नयी रचना
मायाजाल 🖤
(The Professional Brides)

"मीठी बातों का ज़हर और लालच का फंदा—यही है इन शातिर दुल्हनों का गंदा धंधा।" 🐍

leoleo315756

એકાંત...!!

થાક્યો છું, હવે વિસામો શોધું છું,
મળે બે ઘડી, તો હવે એકાંત શોધું છું !

હાર્યો છું, હવે નવો રસ્તો શોધું છું,
મળે બે ક્ષણ, તો થોડી હિંમત શોધું છું !

ભૂલ્યો છું, હવે જવાબો શોધું છું,
મળે બે પળ, તો થોડું સત્ય શોધું છું !

રડ્યો છું, હવે સવાલો શોધું છું,
મળે બે ઘડી, તો એ લાગણી શોધું છું !

અચળ છું, હવે રહસ્યો શોધું છું,
મળે બે પહોર, તો થોડો સંયમ શોધું છું !

આ ભાગદોડ ભરી દુનિયામાં
હવે એકાંત શોધું છું !!

ashachiragmodi1221