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वेदान्त 2.0 — अर्थम अध्याय ✧

अद्वैत: जहाँ कोई माध्यम नहीं
अद्वैत कोई मान्यता नहीं है।
अद्वैत कोई धर्म नहीं है।
अद्वैत कोई मार्ग नहीं है।
जैसे ही अद्वैत को धर्म बनाया गया — द्वैत जन्म लेता है।
जैसे ही अद्वैत को संस्था बनाया गया — पहचान जन्म लेती है।
और जहाँ पहचान है, वहाँ मुक्ति नहीं।

1. माध्यम की सीमा

मूर्ति, मंदिर, मंत्र, गुरु, भगवान —
ये सब साधन हो सकते हैं, पर अंतिम नहीं।
माध्यम हमेशा दो बनाता है:
साधक
साध्य
और जहाँ दो हैं, वहाँ यात्रा है।
जहाँ यात्रा है, वहाँ समय है।
जहाँ समय है, वहाँ जन्म–मृत्यु का चक्र है।

2. अद्वैत — बिना माध्यम

अद्वैत में कोई बीच नहीं रहता।
न पहुँचने वाला, न पहुँचने की जगह।
जब साधन गिर जाता है —
साधना स्वयं जीवन बन जाती है।
यहाँ कुछ पाने की कोशिश नहीं होती,
क्योंकि जो है वही पूर्ण है।

3. धर्म और अद्वैत

धर्म समाज का ढाँचा है।
अद्वैत अस्तित्व का अनुभव है।
जब कोई कहता है — “यह मेरा धर्म है”,
तब बीज बो दिया जाता है।
बीज → संस्था
संस्था → पहचान
पहचान → पुनः चक्र
अद्वैत बीज नहीं बनता,
क्योंकि उसमें “मेरा” नहीं बचता।

4. घोषणा का भ्रम

यदि बुद्ध धर्म घोषित करते —
तो बौद्ध मुक्ति नहीं, परंपरा बनता।
यदि महावीर धर्म घोषित करते —
तो अनुभव नहीं, व्यवस्था बनती।
सत्य घोषणा नहीं चाहता।
घोषणा मन चाहता है।

5. वेदान्त 2.0 की पुकार

आज संसार साधनों में खड़ा है —
गुरु, विचार, पहचान, डिजिटल धर्म।

वेदान्त 2.0 कहता है

कोई मध्यस्थ नहीं।
कोई मार्ग नहीं।
कोई अंतिम पहचान नहीं।
सीधा होना।
सीधा देखना।
सीधा होना ही अद्वैत है।

घोषणा — बंधन

घोषणा सत्य नहीं होती,
घोषणा मन की आवश्यकता होती है।
सत्य को घोषणा की जरूरत नहीं,
क्योंकि सत्य स्वयं प्रकट है।
घोषणा तब जन्म लेती है जब अनुभव को पकड़कर पहचान बना ली जाती है।

1. घोषणा क्यों बंधन है

जैसे ही कोई कहता है —
“यह मेरा मार्ग है”,
“यह मेरा धर्म है”,
“यही सत्य है” —
वहीं द्वैत खड़ा हो जाता है।
घोषणा करने वाला और घोषणा मानने वाला —
दो बन जाते हैं।
और जहाँ दो हैं, वहाँ अद्वैत नहीं।

2. घोषणा से धर्म, धर्म से चक्र

घोषणा बीज है।
बीज → परंपरा बनता है।
परंपरा → संस्था बनती है।
संस्था → पहचान बनती है।
पहचान ही पुनः जन्म का कारण है।
इसलिए घोषणा मुक्ति नहीं देती —
घोषणा चक्र को स्थिर करती है।

3. अनुभव और घोषणा का अंतर

अनुभव मौन है।
घोषणा शब्द है।
मौन में कोई कर्ता नहीं रहता।
शब्द में कर्ता छिपा रहता है।
जहाँ कर्ता है — वहाँ सूक्ष्म अहंकार जीवित है।

4. अद्वैत घोषणा से परे

अद्वैत को कहा नहीं जा सकता।
कहा गया अद्वैत — विचार बन जाता है।
अद्वैत न सिद्धांत है, न शिक्षा।
वह सीधा होना है — बिना बीच के।

5. वेदान्त 2.0 की दृष्टि
न घोषणा।
न संगठन।
न पहचान।
केवल देखना।
जब देखने वाला भी गिर जाए —
वहीं अद्वैत है।

No Path. No Authority. Only Presence.-Vedanta 2.0 Life philosophy,

bhutaji

This story is True.
In late 2025, a Seattle-based artist and YouTuber known as Sunday Nobody documented the creation and sinking of a 3-meter (approx. 10-foot) bronze statue featuring the "Handsome Squidward" meme's face on the body of the ancient Greek Discobolus (Discus Thrower) statue.
Key Details of the Project:
* The Motive: The artist explicitly stated the goal was to "confuse future archaeologists" by leaving a high-quality, durable artifact that blends modern meme culture with classical antiquity.
* The Logistics: * The project reportedly cost around $25,000.
* The statue was cast in bronze, a material chosen specifically because it can survive underwater for over a thousand years.
* To ensure he wasn't committing an "environmental crime," the artist consulted a university archaeologist to confirm the materials wouldn't harm the marine ecosystem.
* The Location: The statue was submerged off the coast of Halkidiki, Greece, at a depth of about 9 meters (roughly 30 feet).
Context & Controversy:
While the stunt went viral for its "chaotic neutral" energy, it did spark a minor debate in the archaeological community. Some experts pointed out that intentionally planting "fake" artifacts can complicate future underwater heritage surveys, though most viewers saw it as a harmless, high-effort piece of performance art.

bkswanandlotustranslators

एक अनकही दास्तां तेरी और मेरी रह गई,
लबों तक आकर हर बात अधूरी रह गई।

नज़रों ने कह दिया जो ज़ुबां कह न सकी,
भीड़ में भी हमारी मुलाक़ात अधूरी रह गई।

वक़्त ने चाहा कि फ़ासले कुछ कम हों,
पर हर कोशिश के बाद दूरी रह गई।

तेरी ख़ामोशी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया,
मेरी हर शिकायत भी बेआवाज़ रह गई।

हम साथ थे, फिर भी साथ न हो पाए कभी,
क़िस्मत की लिखावट कुछ ऐसी रह गई।

नाम तेरा दिल ने हर दुआ में लिया,
मगर हर दुआ मुक़म्मल न हो सकी, अधूरी रह गई।

आज भी यादों में तेरी खुशबू बसती है,
इक अनकही दास्तां… जो तेरी और मेरी रह गई।

palewaleawantikagmail.com200557

🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__
कमाल है न तुम कहते हो कि बहुत
            छोटी है ये ज़िंदगी,

दो  पल  का  क़िस्सा, ज़रा  सी  ये    
                 कहानी है,

मगर  मैं  तो  ऊब   चुका  हूँ,  इस
         बे-मतलब के जीने से,

मेरे लिए तो ये हर सांस, एक भारी
              बोझ पुरानी है,

अजीब ज़िद है  इस  वक़्त का भी
जो गुज़रता नहीं बस सीने पर ठहर
             जाना जानता है,

थक चुका हूँ मैं खुद को ज़बरदस्ती
                  ढोते-ढोते,

थक गई हैं  आँखें  वही  मंज़र फिर
              से देखते-देखते,

जिसे तुम मुख़्तसर, कह कर डराते
               हो ज़ख़्मी को,

ज़ख़्मी उसे काट रहा है तिल-तिल
             कर जीते-जीते,

कमबख़्त ये ख़त्म होने का नाम ही
                 नहीं लेती,

ये शाम  ढलती  क्यों नहीं,  ये  रूह
             सोती क्यों नहीं,

अजीब मज़ाक है, सब कहते हैं कि
             वक़्त भाग रहा है,

पर मेरे आँगन  में तो ये  पाँव पसार
                 कर बैठा है,

अब और नहीं खिंचती ये थकी हुई
             साँसों की लकीरें,

ये  जर्जर  कश्ती  अब  बस  किसी
        अंधेरे किनारे लग जाए,

बहुत जी लिए, बहुत देख लिया ये
               तमाशा हमने,

अब तो  बस ये  साँस थमे, और ये
    सफ़र यहीं थम जाए…🥀🔥
╭─❀💔༻ 
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♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦
 #LoVeAaShiQ_SinGh
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loveguruaashiq.661810

सुना है तुम,हर पल का हिसाब लगाते हो
फिर भी मोहब्बत को इतना आजमाते हो!
-डॉ अनामिका-

rsinha9090gmailcom

The Path to Balance
2022: The Awakening – I identified my mistakes and faced my flaws.

2023: The Trial – I gained the experience of knowing what to pursue and what to leave behind.

2024: The Pivot – I didn't just learn; I took action and changed my ways.

2025: The Realization – I accepted that not everyone shares my heart or my nature.

2026: The Equilibrium – This is the year of Balance.

The Core Philosophy
"Do not love too fiercely, do not hate too deeply. Do not be overly sensitive to the world, and do not give until you are empty. Find the middle ground in all things. Remember: Not everyone is like you."

writerscaste

थोड़ा सा ऐटिट्यूड़ लगा देता है तुम्हारी सुंदरता में चार चाँद..
हद से बढ़कर ये एट्टीट्यूड़
सुंदरता में लगा देता है ग्रहण..

momosh99

केंद्र और परिधि: सच्ची आस्था की परीक्षा

भगवान का मतलब वह केंद्र है, हम उसकी परिधि हैं। केंद्र कभी परिवर्तन नहीं करता। जब हमने उस केंद्र को अपना भगवान या गुरु बना लिया, तभी सच्ची संभावना का द्वार खुलता है।

जिसने केंद्र को समझ लिया, उसे भगवान की फोटो, गुरु की तस्वीर, गीता के श्लोक या शास्त्रों के किसी प्रमाण की कोई जरूरत नहीं पड़ती। वह जानता है कि सत्य स्वयं प्रकाशमान है। लेकिन जो अभी तक केंद्र को पक्का नहीं कर पाया, वह निरंतर खोज में रहता है। वह बार-बार सबूत मांगता है, भीड़ से पुष्टि चाहता है।

इसीलिए सोशल मीडिया पर भगवान, गुरु, धर्म, शास्त्र और मंत्रों का इतना प्रचार होता है। लोग फोटो शेयर करते हैं, श्लोक पोस्ट करते हैं, क्योंकि उनके भीतर अपने केंद्र पर गहरी आस्था और विश्वास नहीं टिका है। वे दूसरों को मनाने की कोशिश करके खुद को मनाने की कोशिश करते हैं। जितने ज्यादा फॉलोअर्स, लाइक्स और शेयर होंगे, उतना ही उनका अपना केंद्र मजबूत साबित होगा — यही उनका प्रमाण बन जाता है।

देखिए ना, अपनी माँ, अपने बाप या अपनी पत्नी पर पूरा विश्वास हो तो क्या आप उन्हें साबित करने के लिए प्रचार करते हैं? नहीं। क्योंकि सच्चा विश्वास अंदर से आता है, बाहर से थोपा नहीं जा सकता।

जिस दिन आपके भीतर अपने भगवान, अपने धर्म, अपने गुरु, अपने मंत्र और अपने शास्त्र के प्रति अटूट श्रद्धा जाग जाएगी, उस दिन आपको कोई फोटो, कोई श्लोक या कोई धर्म का प्रचार करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। प्रचार दरअसल खालीपन का प्रमाण है। जो व्यक्ति प्रचार करता है, उसे खुद भी नहीं पता होता कि वह क्यों कर रहा है। वह बस भीतर के शून्य को आवाज देकर भरने की कोशिश कर रहा होता है।

व्यापार की तरह सोचिए। अगर दुकान अच्छी है और प्रोडक्ट उत्तम है, तो प्रचार की कोई जरूरत नहीं पड़ती — ग्राहक खुद आते हैं। लेकिन अगर प्रोडक्ट में खामी है या दुकान ठीक से नहीं चल रही, तब भारी-भरकम विज्ञापन और प्रचार की जरूरत पड़ती है।

आज सोशल मीडिया पर भगवान, धर्म, ईश्वर, गुरु, शास्त्र और मंत्रों का जो 24×7 प्रचार हो रहा है, वह इसी बात का संकेत है कि 99% लोगों के भीतर इन पर सच्चा विश्वास नहीं है। वे प्रचार कर रहे हैं क्योंकि उन्हें खुद पर, अपने केंद्र पर भरोसा नहीं है।

सच्चा साधक चुपचाप केंद्र में स्थित हो जाता है। वह प्रचार नहीं करता — वह उदाहरण बन जाता है।

जब आस्था अंदर से पक्की हो जाती है, तब बाहर का कोई प्रमाण, कोई लाइक, कोई शेयर, कोई फॉलोअर की जरूरत नहीं रहती।
वह केंद्र अटल रहता है — और परिधि स्वतः शांत हो जाती है।

bhutaji

લાગણી એ મનનો મીઠો સ્પર્શ,
નિઃશબ્દ હોવા છતાં કરે ઘણો હર્ષ.
આંખોમાં છુપાયેલી એક ભાષા,
જે કહે દિલની અનકહી આશા.

urmivala940395

जरूरी नही है कि सब जगह तारीफ हो मेरी,
मेरे कुछ लोग है जो मुझसे किनारा करते है,
कुछ समझदार है जो जुबा पर ले आते है बात,
और कुछ बस मुस्कुराकर बहाना करते हैं.

mashaallhakhan600196

शिवाजी जयंती (19 फरवरी )
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मराठा साम्राज्य के संस्थापक महान योद्धा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज की आज जयंती है। उनकी देशभक्ति और वीरता को बड़े सम्मान के साथ याद किया जाता है। शिवाजी महाराज की जयंती पर सादर नमन करते हुए प्रस्तुत है शिवाजी महाराज और गुरु रामदास जी की एक कहानी 🙏🙏

शिवाजी- रामदास
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बहुत समय पहले की बात है शिवाजी महाराज रामदास जी के पास विद्या अभ्यास करते थे। एक दिन शिवाजी महाराज ने गजानंद नाम के लड़के को उठाकर पटक दिया। इस कार्य को देखकर गुरु रामदास शिवाजी से अप्रसन्न हुए । उन्होंने शिवाजी महाराज को बुलाकर कहा कि, "आज मैं तुमसे अप्रसन्न हूँ क्योंकि तुमने गजानन को पटक दिया है उसे चोट पहुँची है।" शिवाजी महाराज ने कहा कि, "गुरु जी , इसमें मेरा क्या दोष है? आप ने ही सिखाया है कि निर्बलों की रक्षा करनी चाहिए। गजानंद कमजोर बाल गोपाल को बुरे शब्द कह रहा था । बेचारे बाल गोपाल रो रहे थे । इसमें मेरा क्या अपराध है?" तब रामदास जी ने कहा कि पाठशाला में सब की रक्षा का भार मेरे ऊपर है। तुम्हें गजानंद को सजा देने का अधिकार नहीं है , यह अनुचित बात है। शिवाजी महाराज ने गुरु रामदास से माफी माँगी और भविष्य में ऐसा कार्य न करने की प्रतिज्ञा की। इस पर गुरु रामदास ने कहा कि, "मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। मुझे तुमसे बड़ी आशाएँ हैं कि तुम देश की सेवा के लिए तन , मन, धन, कुर्बान करोगे। सारा जीवन देश के लिए अर्पण करोगे।" यह सुनकर शिवाजी महाराज ने गुरु के चरण छू कर प्रतिज्ञा की कि , "मैं जीवन भर अपना सब कुछ देश के लिए अर्पण करुँगा ।" यह सुनकर रामदास जी खुश हुए और उसे अपनी शुभकामनाएँ दी।

शिवाजी महाराज ने जीवन पर्यंत इस प्रतिज्ञा का पालन किया और अपना सर्वस्व देश पर न्यौछावर कर दिया।

संकलन/ प्रस्तुति
आभा दवे
मुंबई

daveabha6

🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 न┤_★__
तुम अक्सर पूछती हो न कि क्या
       अहमियत है तुम्हारी.?

तो सुनो मैं एक सूखा हुआ शजर
था, जिसे  अपनी  ही छाँव से डर
                लगता था,

मेरी जड़ों में खारापन था और रूह
   में सिर्फ़ एक ख़ामोश पतझड़,

फिर तुमने छुआ  और मेरी रगों में
     लहू नहीं, वसंत दौड़ने लगी,

तुम मेरी अहमियत मत पूछो, तुम
बस  ये  देखो  कि,  तुम्हारी   एक
                 छुअन ने,

मेरे  अंदर के  उस  मरे हुए इंसान
  को फिर से ज़िंदा कर दिया है,

तुम वो नमी हो, जिसके  बिना मैं
              रेत हो जाता,

तुम वो  रोशनी हो, जिसके बिना
     मेरा हर रास्ता अँधेरा था,

जब तुम पूछती हो कि मैं कौन हूँ
        तो मुझे लगता है कि,

तुम अपनी  ही दी हुई  साँसों का
         हिसाब माँग रही हो,

तुम सिर्फ़ मोहब्बत नहीं हो, तुम
वो वजह हो जिसने मुझे ख़ुद से
              मिलवाया है,

अब  कभी  मत  पूछना  अपनी
जगह, क्योंकि आइना चेहरा तो
           दिखा सकता है,

पर वो रूह नहीं जो तुम्हारी रूह
    में घुल चुकी है...😌🫶❤️
╭─❀💔༻ 
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#Zakhmi -E-Zubani..✍🏼
#LoVeAaShiQ_SinGh
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loveguruaashiq.661810

थोड़ी देर के लिए ही सही, मेरे पास बैठ
ये लम्हा उधार ले ले, मेरे पास बैठ
शब्द थक गए हैं चलकर, ख़ामोशी बोल उठे
दिल को ज़रा सुला दे, मेरे पास बैठ
तू आए तो मौसम भी अपना रंग बदल ले
ये शाम सँवार दे, मेरे पास बैठ
ना वादों की ज़िद रख, ना कल की बात कर
आज को ही जीने दे, मेरे पास बैठ
आँखों में जो बचा है, वो सच कह जाए
झूठ से थोड़ी दूरी रख, मेरे पास बैठ
मैं दर्द कहूँ या हँसी—तू सुन ले बस इतना
मेरी हर बात समझ, मेरे पास बैठ

palewaleawantikagmail.com200557

आँखों से दूर हुआ पर दिल से ना हुआ दूर..
कोई काम तो मोहन तूने ढंग से किया होता..

momosh99

हम पुरानी सोच के हैं

आजकल प्रेम को
आज़ादी का नाम दिया जाता है।
प्रेमी बनना, फिर प्रेम छोड़ देना,
और बाद में किसी और का पति या पत्नी बन जाना —
इसे ही आधुनिक सोच कहा जाता है।
पर हम पुरानी सोच के हैं।
और इस पर हमें कोई शर्म नहीं।
हमने प्रेम के नाम पर
कभी अपने शरीर को
किसी की वस्तु नहीं बनने दिया।
न किसी को अधिकार दिया,
न किसी को छूने दिया —
सिवाय उस इंसान के
जो हमारा होने वाला पति होगा।
प्रेम करना गलत नहीं है,
लेकिन प्रेम के नाम पर
मर्यादा खो देना
हमें स्वीकार नहीं।
आज कहा जाता है —
“पहले प्रेमी बनो,
फिर पति या पत्नी बन जाना।”
लेकिन किसी का हक़ मारकर
अपना सुख बनाना
हमारी संस्कारों में नहीं।

हम अपने धर्म के मार्ग से नहीं हटेंगे
अगर हमारा होने वाला पति
या हम, उसकी होने वाली पत्नी—
कभी प्रेम के नाम पर
किसी और से जुड़ाव रख चुके हों,
तो वह उनका कर्म है।
उसे वे स्वयं सँभालेंगे,
या उसी का फल झेलेंगे।
हम किसी के अतीत पर
फैसला सुनाने नहीं बैठे।
हर इंसान अपने कर्मों का
खुद उत्तरदायी होता है।
लेकिन एक बात बिल्कुल साफ़ है—
हम अपने धर्म के मार्ग से नहीं हटेंगे।
प्रेम के नाम पर
गलत कदम उठाना
हमारी सोच नहीं।
किसी का अधिकार छीनकर
अपना घर बसाना
हमें स्वीकार नहीं।
आज अगर इसे
“पुरानी सोच” कहा जाता है,
तो कहते रहो।
कम से कम इतना सुकून तो है कि
हमने अपनी मर्यादा,
अपना आत्मसम्मान
और अपना धर्म
कभी नहीं छोड़ा।
अच्छा जीवनसाथी
न लव मैरिज से तय होता है,
न अरेंज मैरिज से।
सब कुछ परिस्थितियों,
कर्मों और भाग्य का खेल है।
हम अपने हिस्से का
धर्म पूरी निष्ठा से निभाएँगे।
बाक़ी, हर किसी को
अपने कर्मों का उत्तर
खुद देना होगा।

archanalekhikha

Do you know that you do not have to forget, you just have to remain in the present? Forgetting is a burden. You cannot forget even if you want to, and besides, the more you try to forget something, the more you will remember it.

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dadabhagwan1150

જય શ્રી કૃષ્ણ

thakorpushpabensorabji9973

har har mahadev

rs1961948gmail.com080109

whenever I feel isolated.I imagine more and I think more. that didn't happened and that won't be done tooo.My imaginary world is different to this world.yep good night guysssss.

itzmeakki